न्यूज़ पोर्टल के नाम पर कार्ड बाँटने का खेल, पत्रकारिता बनी कमीशन का धंधा
विशेष रिपोर्ट | मीडिया डेस्क
सुरजपुर – छत्तीसगढ़
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पहचानी जाने वाली पत्रकारिता आज एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। पत्रकारिता की सेवा और निष्पक्षता के नाम पर अब कुछ न्यूज़ पोर्टलों द्वारा खुलेआम पद, प्रेस कार्ड और पहचान पत्र बाँटकर पत्रकार तैयार किए जा रहे हैं, वह भी तय मासिक लक्ष्य और आर्थिक शर्तों के साथ। यह स्थिति न केवल पत्रकारिता की आत्मा पर चोट है, बल्कि पूरे मीडिया जगत की साख को भी नुकसान पहुँचा रही है।
सूत्रों के अनुसार, Famous TV न्यूज़ पोर्टल के नाम से पत्रकारों को जोड़ने का एक ऑफ़र सोशल मीडिया और व्हाट्सएप के माध्यम से प्रसारित किया जा रहा है, जिसमें तहसील संवाददाता से लेकर राज्य संवाददाता तक के पदों की घोषणा की गई है। इस तथाकथित भर्ती में योग्यता और पत्रकारिता के मूल्यों से अधिक ज़ोर विज्ञापन, कमीशन और मासिक टारगेट पर दिया जा रहा है।
पद के साथ शर्तें, पत्रकार नहीं एजेंट बनाए जा रहे
जारी ऑफ़र में हर पद के साथ यह स्पष्ट किया गया है कि संबंधित व्यक्ति को हर माह न्यूनतम ₹4000 का विज्ञापन और कम से कम 4 समाचार स्टोरी देना अनिवार्य होगा। सवाल यह उठता है कि जब खबरें घटनाओं से नहीं, बल्कि टारगेट से तय होंगी, तो निष्पक्ष पत्रकारिता कैसे संभव होगी? मीडिया विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी व्यवस्था पत्रकार को स्वतंत्र रिपोर्टर नहीं, बल्कि कमीशन आधारित विज्ञापन एजेंट में बदल देती है।
प्रेस कार्ड का खुला वितरण, पहचान की आड़ में दबाव
सूत्र बताते हैं कि इस न्यूज़ पोर्टल के नाम पर जुड़े लोगों को आई-कार्ड, अथॉरिटी लेटर, माइक आईडी, वाहन स्टीकर जैसी सामग्री आसानी से उपलब्ध कराई जा रही है। वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि जब प्रेस कार्ड बाँटना ही सदस्यता या नियुक्ति का मुख्य आधार बन जाए, तो इससे फर्जी पत्रकारों और असामाजिक तत्वों को भी संरक्षण मिलने लगता है। इसका सीधा असर प्रशासनिक कार्यवाही और आम जनता के भरोसे पर पड़ता है।

न्यूज़ पोर्टल की भूमिका पर उठते सवाल
इस पूरे मामले ने Famous TV न्यूज़ पोर्टल की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। क्या पोर्टल प्रबंधन इस तरह की गतिविधियों से अवगत है, या फिर उसके नाम का इस्तेमाल कर कोई नेटवर्क पत्रकारों से वसूली का खेल खेल रहा है? अब तक इस विषय में पोर्टल की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है, जिससे संदेह और गहराता जा रहा है।
ईमानदार पत्रकार सबसे बड़ा शिकार
इस तरह की व्यवस्थाओं का सबसे अधिक नुकसान उन पत्रकारों को हो रहा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद ज़मीनी सच्चाई सामने लाने का प्रयास करते हैं। फर्जी कार्डधारियों और टारगेट आधारित पत्रकारिता के कारण सच्चे पत्रकार भी संदेह की निगाह से देखे जाने लगे हैं, जिससे पेशे की गरिमा लगातार गिर रही है।
जांच और नियंत्रण ज़रूरी
मीडिया संगठनों और वरिष्ठ पत्रकारों का स्पष्ट मानना है कि यदि समय रहते न्यूज़ पोर्टलों की मान्यता, प्रेस कार्ड जारी करने की प्रक्रिया तथा पत्रकारों पर थोपी जा रही आर्थिक शर्तों की गहन और निष्पक्ष जांच नहीं की गई, तो पत्रकारिता धीरे-धीरे कार्ड, कमीशन और मासिक वसूली का संगठित धंधा बनकर रह जाएगी।
आज आवश्यकता है सख़्त नियंत्रण, पारदर्शी व्यवस्था और जवाबदेही तय करने की—क्योंकि जब पत्रकार कार्ड से बनेंगे, तो सच की कीमत आखिर कौन चुकाएगा?