राजनैतिक व्यंग्य-समागम
1. विष्णु नागर
फंस गया बेचारा, गरीब का बेटा, चारों तरफ़ से, बल्कि ऊपर और नीचे से भी! जब भी संकट आता है, गरीब के इस बेटे पर ही आता है, जो बेचारा इतना गरीब है, इतना ज्यादा गरीब है कि दिन में बारह बार की बजाय छह बार ही कपड़े बदल पाता है! गरीबी है ही ऐसी भयंकर चीज और आखिर गरीब के बेटे की गरीबी है, तो फिर अकल्पनीय तो होगी ही!
पहले ट्रंप ने गरीब के इस बेटे को ‘माई डियर फ्रेंड’, ‘माय ग्रेटेस्ट फ्रेंड’ कहकर खूब छकाया। बार-बार उल्लू बनाया।हर तरफ से इसे फींचा। पचास से ज्यादा बार कहा कि व्यापार का लालच देकर मैंने भारत-पाकिस्तान के बीच लड़ाई रुकवाई है। गरीब का बेटा, बेचारा इतना गरीब है, इतना अधिक गरीब है कि इससे इंकार नहीं कर पाया, जवाब नहीं दे पाया, क्योंकि इसके मुंह में उस समय चालीस हजार रुपए किलो का मशरूम भरा हुआ था।कभी ऐसा भी हुआ कि जब वह मोरिंगा (सहजन) के पराठे खा रहा था, तब ट्रंप ने ऐसी बेहूदा बात कही! पराठे खाता या जवाब देता! वैसे भी झूठा, झूठे को कैसे कहता कि तू झूठा है और कहता तो मानता भी कौन, इसलिए वह पराठे और अचार का स्वाद लेता रहा! कभी वह सबसे महंगा मियाज़ाकी आम चूस रहा था, तब ट्रंप ने ऐसा कहा। इस आम को चूसने का आनंद ही और है! उसे चूसना छोड़कर डंकेवाला ऐसे लफड़े में क्यों पड़ता! आम की बेकद्री क्यों करता, आम की बेइज्ज़ती देश की बेइज्ज़ती होती, भारतीय संस्कृति की यानी हिंदू संस्कृति की बेकद्री होती! गरीब के बेटे ने ट्रंप को जवाब न देकर आम चूस कर खाना बेहतर समझा! बेशक आम का रस उसके कुर्ते पर टपकता रहा, मगर इससे क्या! वह चूसता रहा, चूसता रहा, चूसते-चूसते बोला नहीं जाता! कहा नहीं जाता कुछ! बिलकुल नहीं! सच में भी नहीं! ज़बान स्वाद लेने में रम गई, तो रम गई! कभी ऐसा भी हुआ कि ट्रंप ने जब बदतमीजी की, तब वह पांचवीं बार ड्रेस बदल रहा था! गरीब का बच्चा है तो पूरा का पूरा संस्कारी! कपड़े बदलना छोड़कर जवाब कैसे देता? फिर ट्रंप उम्र में उससे बड़ा भी है, अमीर भी है, अमीर देश का राष्ट्रपति भी है! भारतीय संस्कृति कहती है कि अपने बुजुर्ग कुछ भी कहे, पलटकर जवाब नहीं दिया जाता! इसलिए गरीब के बेटे ने उत्तर नहीं दिया! इस तरह संस्कृति की लाज रखी!

फिर उसी ट्रंप ने टैरिफ पर भी महीनों तंग किया। गज़ब ही किया, भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया! गरीब का बेटा, बेचारा तब भी बोल नहीं पाया, क्योंकि वह उस समय योग का भोग कर रहा था! ट्रंप की तरह वह खाली नहीं बैठा था, जो सुबह-शाम बोलता ही रहता है, क्योंकि वह न आम चूस कर खाता है, न काट कर खाना जानता है। बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद! गरीब का बेटा है , इसलिए स्वाद का महत्व जानता है!
वह चुप रहा। इधर-उधर देखता-झांकता रहा, जिधर देखना था, उधर उसने जानबूझकर नहीं देखा। जिधर मुंह खोलना था, उधर नहीं खोला, विपरीत दिशा में खोला।ट्रेन को हरी झंडी दिखाने के अवसर पर आंय-बांय-शांय बोलने के लिए खोला — वह भी टेलीप्रॉंप्टर सामने रखकर! सुनते हैं कि वह जब कभी ट्रंप से बात करता है, तो भी टेलीप्रॉन्पटर सामने ही रखकर करता है। अब तो गरीब के बेटे का टेलीप्रॉंप्टर इतना होशियार हो गया है कि वह खुद ही गरीब के बेटे की ओर से जवाब दे देता है!
ट्रंप के आने से पहले, जो टैरिफ साढ़े तीन से घटकर 2.93 फीसदी रह गया था, उसे 18 प्रतिशत करवाकर इसने अपने वजन से भी मोटी फूलमाला पहनीं। ताली बजवाई। अपनों से मनवाया कि देखा, मैं था, तो मामला 18 प्रतिशत पर निबट गया! कोई और होता तो उसकी टें बोल जाती! उसने यह छुपाया कि भारत से 18 प्रतिशत टैरिफ वसूल करनेवाला ट्रंप गरीब के बेटे से यह कबूल करवा चुका है कि उसके देश के माल पर वह एक प्रतिशत भी टैरिफ नहीं देगा और यह वायदा भी ले लिया कि भारत, रूस से तेल नहीं खरीदेगा, अमेरिका से ही खरीदेगा! गरीब का बेटा इधर-उधर करने की कोशिश करेगा, दायें-बांये करवट लेने की कोशिश करेगा, तो ट्रंपवा बारह बजाना भी जानता है, जबकि गरीब का बेटा ग्यारह तक बजवाने को तैयार है। ज़्यादा मजबूरी हो, तो वह साढ़े ग्यारह भी बजवा सकता है, मगर वह बारह बजवाने से बचना चाहता है। मगर क्या करे, आखिर वह है तो गरीब का ही बेटा! ट्रंप बारह बजाएगा, तो बारह बजवा लेगा!
इस बीच गरीब का बेटा जमीन पर औंधी पड़ी अपनी इमेज को उठाने की कोशिश करता रहा। इमेज उठ पाती, इससे पहले ही उसका नाम एपस्टीन फाइल में आ गया।मौज-मजे की दुनिया के सरदार के साथ उसका नाम जुड़ गया। विदेशी के साथ कई देसी ऐपस्टीन फाइलें भी सोशल मीडिया पर खुलने लगीं। इधर ये फ़ाइलें खुली पड़ी थीं, उधर पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल नवराणे की किताब का अंश सामने आ गया, जिससे पता चला कि जब देश की सीमा की तरफ चीनी सेना बढ़ती आ रही थी, तब गरीब के बेटे की गरीबी इतनी बढ़ गई थी कि उसे समझ में नहीं आया कि मुकाबला करने को कहे या कहे कि छोड़ो यार अपना पड़ोसी है, कुछ जमीन कब्जा भी ले, तो क्या फर्क पड़ता है! संसद में इस पर सवाल उठे, तो रक्षामंत्री और गृहमंत्री पूछते पाये गए कि वह किताब है कहां, किताब है कहां, जिसमें यह सब लिखा है! गरीब के बेटे को पता नहीं था कि यह किताब तब आनलाइन बिक रही थी! अगले दिन किताब संसद में और संसद से बाहर भी सामने आ गई! गरीब का बेटा फिर फंस गया। इतना परेशान हो गया कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने के लिए लोकसभा में आने से डर गया कि कहीं वह किताब उसे न थमा दी जाए! लोगों ने उसे कायर कहा, भगोड़ा कहा, मगर वह भागने से नहीं डरा!निर्भय होकर भागा! गरीब के बेटे को अमीर के बेटे ने फंसा दिया था। उधर यूजीसी वाले मामले में गरीब के बेटे की सुबह शाम-आरती उतारने वाले सवर्ण भक्त उससे नाराज़ हो गए। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नाराज़गी दूर करने की कोशिश की, मगर गरीब के बेटे से वे फिर भी खुश नहीं हुए! सारा किये-धरे पर पानी फिर गया। उधर गरीब के बेटे के अमीर दोस्त अडानी पर धोखाधड़ी का जो मामला अमेरिका में सुस्त पड़ा था, वह गरमा गया। गरीब के किसी बेटे ने एकसाथ इतनी मुसीबतें कभी न सुनी होंगी, न झेली होंगी। उसका सब गुड़ गोबर हुआ जा रहा है। जिन रामलला को गरीब का बेटा ऊंगली पकड़कर राममंदिर लाया था, जिसने इतना महान काम पांच सौ साल बाद किया था, वे रामलला भी उसके काम नहीं आए। केदारनाथ और कन्याकुमारी में कैमरे की गवाही में की गई तपस्या भी काम नहीं आई। तपस्या में कमी आखिर रह गई! जिसने करोड़ों फूंक कर देवता समान अपनी छवि बनाई थी, वह काम न आई। गोदी मीडिया की गोद में भी आराम नहीं मिला! चित्र-विचित्र भेस में मंदिर-मंदिर जाने से पुण्य की इतनी कमाई नहीं हुई! रंग-बिरंगे साफे पहनना भी काम न आया! गली -गली में गुंडे छोड़ना भी काम न आया! झूठ बोलो, बार-बार झूठ बोलो, ज़ोर-ज़ोर से झूठ बोलो, जिस भी विषय पर झूठ बोल सको, बोलो, कांग्रेस को कहे, गरीब के बेटे के ये सुवचन भी काम न आए! पौने बारह साल में दस हजार बार स्व-मुखारविंद से झूठ-दर-झूठ बोलना भी काम नहीं आया! चौकीदारी भी काम नहीं आई। अडानी-अंबानी का साया भी काम न आया। यहां तक कि नान-बायोलॉजिकल होना भी काम न आया! व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के एमए, पीएचडी भी काम नहीं आए! आईटी सेल काम नहीं आया! गुजरात के नरसंहार के अपराधियों को जज बदलकर बचाना काम न आया! हिंदू हृदय सम्राट होना तक काम न आया!
उधर पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल के चुनाव सर पर हैं और इधर शिराजा बिखर रहा है। अब चुनाव आयोग का, एसआईआर का भरोसा है। सीबीआई-ईडी भी कितने काम आ पाएगी, मालूम नहीं। हिंदू मुस्लिम भी लगता है, काम नहीं आएगा! वंदे मातरम कितना काम आता है, यह देखना बाकी है। झोला तैयार है, शायद उसे उठाकर चल देना काम आ जाए!
(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। वर्तमान में जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)
2. थैंक यू, मोदी जी! आप उस दिन संसद में नहीं आए : राजेंद्र शर्मा
भाई हम तो बिड़ला जी से सहमत हैं, पूरी तरह से। कौन से बिड़ला जी? बिड़ला हाउस वाले बिड़ला जी नहीं, नागपुरिया कुनबे वाले बिरला जी। लोकसभा की ऊंची कुर्सी वाले बिड़ला जी। बिड़ला जी ने दिल की गहराई से कहा — थैंक यू मोदी जी! थैंक यू मोदी जी, सलाह का मान रखने के लिए। थैंक यू मोदी जी, स्पीकर की सलाह मानकर, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस का जवाब देने के लिए लोकसभा में नहीं आने के लिए।
मोदी जी अगर बिड़ला जी की सलाह सुनकर भी नहीं मानते और अपने भाषण के लिए तय टाइम पर लोकसभा में पहुंच जाते तो? अघट घट जाता, अघट। विपक्षी सांसदों ने जाने क्या ‘‘अप्रत्याशित’’ कर दिया होता। संसद की गरिमा, लोकसभा की परंपराओं और जनतंत्र की इज्जत तक, सब को विपक्षियों ने तार-तार कर दिया होता। पर मोदी जी की कृपा से ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।
मोदी जी ने संसद की गरिमा, लोकसभा की परंपराओं और संसद की इज्जत का बाल भी बांका नहीं होने दिया। मोदी जी ने खुद ही न आकर, इन सारे खतरों को और वास्तव में विपक्षी षडयंत्रों को ध्वस्त कर के रख दिया। न मोदी जी लोकसभा में आए और न विपक्षी वह अघट घटा पाए, जिसे घटाने का मोदी विरोधी विपक्ष का षडयंत्र था।
यह कोई न भूले कि बिड़ला साहब को विपक्षी षडयंत्र की पक्की जानकारी थी। उन्होंने खुद अपने मुंह से कहा और इधर-उधर नहीं, खुद लोकसभा में अपने ऊंचे आसन पर बैठकर कहा कि उन्हें ‘‘पुख्ता’’ जानकारी मिली थी। और लोकसभा में जो दृश्य उन्होंने देखे थे, जिस तरह विपक्षी सांसद विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, जिस तरह एक-दो नहीं पूरी तीन-तीन महिला सांसद, संसद के वेल में जाकर विरोध जता रही थीं, उससे उनकी जानकारियों की पुष्टि होती थी। ये महिला सांसद जहां थीं, वहां से प्रधानमंत्री का आसन जरा-सी ही दूरी पर तो था। ये सांसद आसानी से प्रधानमंत्री को उनके आसन पर घेर सकती थीं। कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता था, बल्कि कुछ भी अप्रत्याशित करने की विपक्ष की तैयारी थी। पर मोदी जी और बिड़ला जी ने मिलकर, इस पूरे के पूरे षडयंत्र को ही विफल कर दिया। मोदी जी आए ही नहीं। जब बाबा ही नहीं आए, तो घंटा कैसे बजता!
पर बिड़ला जी के साथ-साथ मोदी जी का थैंक यू करना तो दूर रहा, उल्टे विपक्ष वाले इसका शोर मचा रहे हैं कि मोदी जी सवालों से डर कर भाग गए! बिड़ला जी ने संसद की परंपरा और डेमोक्रेसी वगैरह को बचाने के लिए भरी लोकसभा में मोदी जी का थैंक यू भी कर दिया, तब भी विपक्ष वाले भाग गए, भाग गए की रट लगाए हुए हैं। यह विपक्ष वालों की थेथरई को ही दिखाता है।
लोकसभा वाला षडयंत्र विफल हो गया, तब भी बेशर्मी से पीएम मोदी को बदनाम करने का षडयंत्र चलाए जा रहे हैं। कह रहे हैं कि मोदी जी की छप्पन इंची छाती, कोरे प्रचार की चीज थी। नरवणे की फैसले की मांग से लेकर, एप्स्टीन फाइल और ट्रंप डील तक, जब भी नपने का सवाल आया, मिस्टर 56 इंच दुम दबाकर भाग गए। पर यह सब भी विपक्षी षडयंत्र ही है — भारत के पीएम की छाती को छोटा कर के दिखाने का षडयंत्र।
विपक्षियों को यह हजम ही नहीं हो रहा है कि मोदी जी भारत को विश्व गुरु के आसन पर बैठाने से पहले ही, विश्व मल्ल के आसन पर कब्जा भी जमा चुके हैं। छप्पन इंची छाती का, बाकी ग्रहों की तो हम नहीं कहते, पर दुनिया भर के नेताओं में तो और कोई दावेदार है नहीं।
और विरोधी जो बार-बार इसकी दलील दे रहे हैं कि तीनों महिला सांसद तो निहत्थी थीं, पिन से लेकर आलपिन तक उनके पास तो कुछ भी नहीं था, उनसे सैकड़ों भक्त सांसदों के बीच प्रधानमंत्री को क्या खतरा हो सकता था, उसका क्या? पर इस दलील में क्या वाकई कोई दम है? मोदी जी की गद्दी की सबसे बड़ी रक्षक, तेलुगू देशम के प्रवक्ता ने सत्तापक्ष की ओर से एकदम सही बताया है। महिला सांसदों के पास कोई हथियार न होने से क्या हुआ, उनके पास दांत तो थे। दांत भी थोड़े नहीं, एक-एक के करीब बत्तीस। सब मिलाकर सौ के करीब दांत। जरा सोचिए, अगर सौ दांतों से प्रधानमंत्री को काटा गया होता, तो क्या होता? माना कि यह भी किसी-न-किसी तरह का विश्व रिकार्ड होता, पर राष्ट्र पर जो संकट आ जाता, उसका क्या होता? बिड़ला जी को आइंदा सांसदों के दांतों के खतरे से पीएम की हिफाजत का भी कुछ तो इंतज़ाम करना ही होगा।
वैसे यही क्यों माना जाए कि प्रधानमंत्री पर संसद में महिला सांसदों के दांत हमले का ही खतरा था? बिड़ला जी ने कब कहा कि दांत हमले का ही खतरा था? उनकी पुख्ता जानकारी तो प्रधानमंत्री के साथ कुछ भी ‘‘अप्रत्याशित’’ घट सकने की थी! सिर्फ दांत हमला ही क्यों, प्रधानमंत्री पर किताब हमला भी तो हो सकता था। क्या राहुल गांधी ने अपनी ओर से चाहे शेखी बघारते हुए ही सही, खुद ही सार्वजनिक रूप से इसका इशारा नहीं कर दिया था? क्या राहुल गांधी ने नरवाणे की किताब दिखाते हुए कहा नहीं था कि प्रधानमंत्री सदन में आएंगे, तो वह उन्हें नरवाणे की किताब देंगे! क्या यह प्रधानमंत्री के लिए अप्रत्याशित नहीं होता? रक्षामंत्री ने कहा कि नरवाणे की किताब है ही नहीं, गृहमंत्री ने कहा कि किताब है ही नहीं, प्रधानमंत्री ने कहा कि किताब है ही नहीं, फिर भी किताब का वह भूत प्रधानमंत्री के हाथों में! सोचा है इसका नतीजा? साफ है कि राहुल का किताब ‘‘देना’’ सिर्फ शाब्दिक अर्थ में देना नहीं था। उसके खतरनाक अर्थ संकेत थे। थैंक यू मोदी जी इस संकट से देश को बचाने के लिए और थैंक यू बिड़ला जी, प्रधानमंत्री को इस संकट से देश को बचाने का रास्ता दिखाने के लिए।
और यह सवाल करना तो विरोधियों की सरासर कठहुज्जती है कि अगर बिड़ला जी को सदन में मोदी जी के साथ कुछ अघट घटने की पुख्ता जानकारी थी, तो उन्होंने यह जानकारी, सुरक्षा के उपाय करने के लिए सरकार के अधिकारियों के साथ साझा क्यों नहीं की और प्रधानमंत्री को मौके से ही गायब हो जाने की सलाह क्यों दी? और जानकारी अगर पुख्ता थी, तो इस जानकारी पर अब षडयंत्र के विफल हो जाने के बाद क्या कार्रवाई की जा रही है? लेकिन, ऐसे सवाल ही अनुचित हैं। बिड़ला जी सभी सांसदों के संरक्षक हैं और ऊपर से संस्कारी हैं ; संसद की बात यानी उनके घर की बात और घर के मुखिया होने के नाते उन्हें घर की बात घर में ही निपटाना खूब आता है। पीएम के साथ अप्रत्याशित घट सकता था, नहीं घटा और षडयंत्र करने वालों को चेतावनी भी मिल गयी, सांप भी मर गया और लाठी भी मर गयी। अमृतकाल में भला और क्या चाहिए?
बस हमें बिड़ला जी से एक ही बात की शिकायत है। उन्होंने अपनी ओर से तो मोदी जी का थैंक यू किया, पर इतना तो काफी नहीं था। वह कम से कम 140 करोड़ भारतीयों की ओर से तो मोदी जी का थैंक यू कर ही सकते थे। मोदी जी ने कितने बड़े संकट से देश को बचा लिया। और विश्व को भी। आखिरकार, मोदी जी को किसी ने काट-वाट लिया होता, तो पूरी दुनिया उलट-पलट हो सकती थी। ट्रंप ने वैसे ही युद्ध रुकवाने के नाम पर, कई नये युद्ध छिड़वा दिए हैं। विश्व युद्ध भी छिड़ सकता था। इसलिए, 600 करोड़ पृथ्वी वासियों की ओर से थैंक यू भी हो जाता तो कोई गलत बात नहीं होती। खैर! बिड़ला जी के ही थैंक यू में सब का थैंक यू शामिल माना जाए। फिर, फिर थैंक यू मोदी जी!
(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)