2047 के तेज़ विकास पथ पर चलते भारत के लिए अब विकास बनाम पर्यावरण नहीं, बल्कि विकास के साथ पर्यावरण का मॉडल अपनाना अनिवार्य हो गया है
मौजूदा वन कानून और पर्यावरणीय स्वीकृति प्रक्रियाएँ अपर्याप्त हैं?एक सख्त, स्पष्ट और जवाबदेह ट्रीप्रोटेक्शन एक्ट 2026 की आवश्यकता है, जो विशेष रूप से वृक्षों की सुरक्षा पर केंद्रित हो -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत जब स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे करने की ओर बढ़ रहा है,तब विजन 2047 के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर विकास को अभूतपूर्व गति दी जा रही है। एक्सप्रेसवे, रेलवे कॉरिडोर, औद्योगिक क्लस्टर,स्मार्ट सिटी, सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाएँ हर क्षेत्र में निर्माण कार्य तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन इस तेज़ विकास की कीमत अक्सर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, प्राकृतिक पारिस्थितिकी के विघटन और मानव जीवन पर पड़ने वाले दीर्घकालिक दुष्प्रभावों के रूप में चुकानी पड़ रही है।इसी तेज़ विकास की दौड़ में यदि प्राकृतिक संसाधनों, विशेषकर वृक्षों और जैव विविधता कीअनदेखी की जाती है,तो यह विकास दीर्घकाल में आत्मघाती सिद्ध हो सकता है।विश्व स्तर पर यह स्वीकार किया जा चुका है कि विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा करना एक पुरानी और असफल सोच है; आज आवश्यकता है संतुलन, सह- अस्तित्व और उत्तरदायी नीति निर्माण की।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में,जहाँ जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पहले से ही स्पष्ट हैं अत्यधिक गर्मी,सूखा, बाढ़ और मरुस्थलीकरण, वहाँ वृक्षों की कटाई केवल पर्यावरणीय क्षति नहीं, बल्कि मानव जीवन, आजीविका और सामाजिक स्थिरता पर सीधा प्रहार है।इस संदर्भ में यह स्पष्ट होता जा रहा है कि मौजूदा वन कानून, पर्यावरणीय स्वीकृति और क्षतिपूरक वनीकरण की व्यवस्थाएँ ज़मीनी स्तर पर पर्याप्त प्रभावी सिद्ध नहीं हो रहीं।सवाल सिर्फ पेड़ों का नहीं, पेड़ केवल लकड़ी या बाधा नहीं हैं,वे जलवायु संतुलन,भूजल संरक्षण,जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य के मूल स्तंभ हैं।जब सड़क या परियोजना के नाम पर हजारों पेड़ काटे जाते हैं, तो उसका प्रभाव केवल स्थानीय नहीं, बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर पड़ता है। हीटवेव,जल संकट रेगिस्तानीकरण और जैव विविधता का क्षरण,ये सभी उसी असंतुलित विकास की देन हैं।यही कारण है कि ट्री प्रोटेक्शन एक्ट 2026 जैसी सशक्त और समर्पित विधायी पहल अब समय की अनिवार्य माँग बन चुकी है।अब यह स्पष्ट हो चुका है कि मौजूदा वन कानून और पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रियाएँ पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए एक सख्त, स्पष्ट और जवाबदेह ट्री प्रोटेक्शन एक्ट 2026 की आवश्यकता है, जो:बिना वैकल्पिक योजना के पेड़ कटाई को दंडनीय अपराध घोषित करे,हर बड़े विकास प्रोजेक्ट में ट्री ऑडिट और ट्री इम्पैक्ट असेसमेंट अनिवार्य बनाए एक पेड़ काटो = दस पेड़ लगाओ से आगे बढ़कर पेड़ के जीवित रहने की कानूनी जिम्मेदारी तय करे शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में हेरिटेज और देशी वृक्षों को विशेष संरक्षण दे स्थानीय समुदायों और ग्राम सभाओं को निर्णय प्रक्रिया में भागीदार बनाए, पश्चिमी राजस्थान और खेजड़ी: विकास के सामने प्रकृति की संभवततः आवाज़ है।

साथियों बात अगर हम पश्चिमी राजस्थान का खेजड़ी बचाओ आंदोलन: विकास बनाम जीवन का सवाल इसको समझने की करें तो,पश्चिमी राजस्थान, विशेषकर बीकानेर और थार मरुस्थल क्षेत्र,में सोलर परियोजनाओं के लिए हो रही खेजड़ी के पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या नवीकरणीय ऊर्जा के नाम पर भी प्रकृति के साथ अन्याय स्वीकार्य है। सोलर ऊर्जा निस्संदेह स्वच्छ और भविष्य की ऊर्जा है,किंतु यदि इसके लिए स्थानीय पारिस्थितिकी पारंपरिक ज्ञान और जीवनदायी वृक्षों को नष्ट किया जाए,तो यह हरित विकास नहीं बल्कि हरित विडंबना कहला सकता है,इसी पृष्ठभूमि में खेजड़ी बचाओ आंदोलन ने जन्म लिया, जो अब केवल एक स्थानीय विरोध नहीं,बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक बनता जा रहा है। यह आंदोलन बताता है कि विकास परियोजनाएँ केवल आंकड़ों और मेगावाट में नहीं आँकी जा सकतीं;उन्हें मानव, संस्कृति औरप्रकृति के साथ उनके संबंधों के संदर्भ में भी परखा जाना चाहिए।सोलर प्रोजेक्ट्स और पर्यावरणीय विरोधाभास
यह एक बढ़ीविडंबना है कि जिन सोलर प्रोजेक्ट्स को जलवायु परिवर्तन के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, वही यदि स्थानीय पर्यावरण को नष्ट करें, तो उनका नैतिक आधार कमजोर हो जाता है।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब यह स्वीकार किया जा रहा है कि रिन्यूअबले एनर्जी प्रोजेक्ट्स को भी इंविरोंमेन्टल एंड सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट के कठोर मानकों से गुजरना चाहिए।पश्चिमी राजस्थान का आंदोलन इसी वैश्विक विमर्श का हिस्सा है, जो यह सवाल उठाता है कि क्या ग्रीन एनर्जी के नाम पर ग्रीन कवर को खत्म किया जा सकता है?

साथियों बात अगर हम 1730 का खेजड़ली बलिदान: विश्व के शुरुआती पर्यावरण आंदोलनों में एक अमर अध्याय इसको समझने की करें तो,खेजड़ी बचाओ आंदोलन की आत्मा 1730 के खेजड़ली बलिदान में निहित है, जहाँ अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों ने खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे।उनका अमर वाक्य सिर सांटे रूंख रहे, तो भी सस्तो जाण आज भी पर्यावरणीय संघर्षों के लिए प्रेरणास्रोत है।यह घटना केवल भारतीय इतिहास का नहीं,बल्कि वैश्विक पर्यावरण आंदोलन के इतिहास का भी एक मील का पत्थर है। इसे दुनिया के सबसे शुरुआती संगठित पर्यावरण आंदोलनों में गिना जाता है और 1970 के दशक के चिपको आंदोलन की वैचारिक प्रेरणा माना जाता है। खेजड़ली का यह बलिदान बताता है कि जब राज्य सत्ता और संसाधन-दोहन आमने- सामने हों, तब नैतिक साहस और सामुदायिक एकजुटता इतिहास की दिशा बदल सकती है।खेजड़ी: केवल एक पेड़ नहीं, मरुस्थल की जीवनरेखाखेजड़ी पश्चिमी राजस्थान की पारिस्थितिकी का आधार है। यह पेड़ न केवल मिट्टी के कटाव को रोकता है, बल्कि भूजल संरक्षण, पशुपालन, कृषि और जैव विविधता में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सूखे और कठोर जलवायु में भी खेजड़ी जीवन का संबल है। यही कारण है कि इसे राजस्थान का राज्य वृक्ष घोषित किया गया है।अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण अध्ययन बताते हैं कि शुष्क और अर्ध- शुष्क क्षेत्रों में ऐसे देशज वृक्षों की कटाई मरुस्थलीकरण को तेज़ करती है, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और गहरे होते हैं।इसलिए खेजड़ी की रक्षा केवल स्थानीय या सांस्कृतिक मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी है।
साथियों बातें अगर हम ट्री प्रोटेक्शन एक्ट 2026: समय की अनिवार्य आवश्यकता को समझने की करें तो अब यह स्पष्ट हो चुका है कि मौजूदा वन कानून और पर्यावरणीय स्वीकृति प्रक्रियाएँ पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए एक सख्त, स्पष्ट और जवाबदेह ट्री प्रोटेक्शन एक्ट 2026 की आवश्यकता है, जो विशेष रूप से वृक्षों की सुरक्षा पर केंद्रित हो। इस प्रस्तावित कानून के अंतर्गत:एक बिना वैकल्पिक योजना के पेड़ कटाई को दंडनीय अपराध घोषित किया जाए।हर कटे हुए पेड़ के बदले उससे अधिक संख्या में, उसी पारिस्थितिकी क्षेत्र में वृक्षारोपण अनिवार्य हो।केवल रोपण नहीं, बल्कि पेड़ों के जीवित रहने की कानूनी जिम्मेदारी तय की जाए।स्थानीय समुदायों को निर्णय-प्रक्रिया में वैधानिक भागीदारी दी जाए।परियोजना स्वीकृति में सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को भी मानदंड बनाया जाए।यह कानून विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम सिद्ध हो सकता है।लोकतंत्र, सहभागिता और पर्यावरणीय न्यायखेजड़ी बचाओ आंदोलन यह स्पष्ट करता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी नीति का विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सहभागिता का प्रश्न है। जब स्थानीय समुदाय, किसान, महिलाएँ और युवा एकजुट होकर प्रकृति के लिए खड़े होते हैं, तब वह आंदोलन केवल विरोध नहीं, बल्कि सतत विकास का जीवंत मॉडल बन जाता है।
साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय स्तरपर इसको समझने की करें तो अब एनवायरमेंटल डेमोक्रेसी की अवधारणा को महत्व दिया जा रहा है,जिसमें जनता को प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े निर्णयों में निर्णायक भूमिका मिलती है। पश्चिमी राजस्थान का यह आंदोलन इसी वैश्विक सोच का भारतीय संस्करण है।भारत का भविष्य केवल चौड़ी सड़कों और ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि जीवित नदियों, सुरक्षित जंगलों और संरक्षित पेड़ों से तय होगा।अब समय आ गया है कि ट्री प्रोटेक्शन एक्ट 2026 जैसे सशक्त कानून के माध्यम से विकास और पर्यावरण के बीच वास्तविक संतुलन स्थापित किया जाए। क्योंकि पेड़ बचेंगे तभी जीवन बचेगा, और जीवन बचेगा तभी विकास टिकाऊ होगा।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि विकास का भविष्य संतुलन में है,बलिदान में नहीं,विजन 2047 का भारत तभी वास्तव में विकसित कहलाएगा, जब उसकी प्रगति प्रकृति के विनाश पर नहीं,बल्कि उसके संरक्षण पर आधारित होगी। खेजड़ी बचाओ आंदोलन हमें याद दिलाता है कि विकास का रास्ता पेड़ों को काटकर नहीं, बल्कि उन्हें बचाकर भी बनाया जा सकता है।अब समय आ गया है कि नीति-निर्माता, उद्योग और समाज मिलकर यह स्वीकार करें कि वृक्ष केवल बाधा नहीं, बल्कि भविष्य की नींव हैं। ट्री प्रोटेक्शन एक्ट 2026 केवल एक कानून नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी का प्रतीक होना चाहिए।

-संकलनकर्ता लेखक-कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318