बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा जगत में इन दिनों नियम-कानूनों को ताक पर रखकर की जा रही नियुक्तियों ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों में ‘विश्वविद्यालय अधिनियम 1973’ के प्रावधानों का खुला उल्लंघन करते हुए अपात्र व्यक्तियों को कुलसचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया जा रहा है। आलम यह है कि इन नियुक्तियों के कारण विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता खतरे में है और कुलपति महज ‘पत्थर की मूरत’ बनकर रह गए हैं।
नियमों की अनदेखी और अवैध प्रभार
विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 के अनुसार, कुलसचिव की नियुक्ति के स्पष्ट मानक हैं। इसके बावजूद, अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय (बिलासपुर), नंद कुमार कौशिक विश्वविद्यालय (रायगढ़) और सुंदरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय बिलासपुर में सहायक प्राध्यापकों को बिना प्रतिनियुक्ति प्रक्रिया के सीधे कुलसचिव का प्रभार दे दिया गया है।
वित्तीय अनियमितता
अटल बिहारी वाजपेयी यूनिवर्सिटी में प्रभारी कुलसचिव द्वारा स्वयं ही अपना वेतन आहरित करने का मामला सामने आया है, जिस पर पूर्व में वित्त अधिकारी ने आपत्ति भी जताई थी।
दागदार छवि
बिलासपुर में कार्यरत प्रभारी कुलसचिव का पिछला रिकॉर्ड भी विवादों में रहा है। छेड़छाड़ और अनुशासनहीनता के मामलों के बावजूद उन्हें यह अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है।
छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय दुर्ग में नियुक्ति को लेकर दबाव
छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय में भी स्थिति चिंताजनक है। सूत्रों के अनुसार, वहां एक ऐसे प्रोफेसर (रामनारायण खरे) को कुलसचिव नियुक्त करने की तैयारी है, जिनके विरुद्ध स्वयं विश्वविद्यालय ने ही एफआईआर और विभागीय जांच दर्ज कराई है। नियमत: इसके लिए कुलपति की अनापत्ति अनिवार्य है, लेकिन इसे प्राप्त करने के लिए कुलपति पर ‘अतिरिक्त दबाव’ बनाया जा रहा है।
खैरागढ़ की ‘आयरन लेडी’ ने दिखाया रास्ता
जहां एक ओर कई कुलपति मौन हैं, वहीं खैरागढ़ विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर लवली शर्मा ने मिसाल पेश की है। उन्होंने नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रभारी कुलसचिव डॉ. सौमित्र तिवारी को 25 कारण बताओ नोटिस जारी किए और अंततः उन्हें पद से कार्यमुक्त करवाया। शिक्षा जगत में उनके इस कड़े रुख की सराहना हो रही है।
क्यों लाचार हैं कुलपति ?
विश्वविद्यालय एक स्वशासी संस्था है, जिसका प्रशासनिक प्रमुख कुलपति होता है। लेकिन वर्तमान में स्थिति इसके विपरीत है। पिछले दो वर्षों से नियुक्तियों में कुलपति की अनुशंसा और अनापत्ति की परंपरा को दरकिनार कर दिया गया है।
संस्थानों को वित्तीय हानि
इन ‘तथाकथित’ कुलसचिवों की मनमानी के कारण पीएम-उषा योजना के तहत मिला करोड़ों का अनुदान बिना उपयोग के वापस चला गया।
अवैध वसूली के आरोप
सूत्रों के अनुसार, निजी महाविद्यालयों की संबद्धता और परीक्षा केंद्र निर्धारण में इन प्रभारी कुलसचिवों द्वारा भारी अवैध वसूली की खबरें भी आ रही हैं।कुलमिलाकर इन अनियमितताओं और भ्रष्ट्र कार्रवाइयों पर उच्च शिक्षा विभाग की चुप्पी और शासन द्वारा नियमों की अनदेखी ने विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक माहौल को दूषित कर दिया है। सरगुजा विश्वविद्यालय, जहाँ प्रतिनियुक्ति के नियमों का पालन हुआ है, वह आज एक अपवाद बनकर रह गया है। यदि समय रहते इन अवैध नियुक्तियों पर रोक नहीं लगी, तो राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी।