एनसीईआरटी कक्षा 8 की पाठ्यपुस्तक-क्या बच्चों को संस्थागत कमियों के बारे में बताना पारदर्शिता है या संस्थागत अविश्वास का बीजारोपण?
एनसीईआरटी की कक्षा 8 की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार अध्याय ने जवाबदेही, संस्थागत गरिमा,किशोर मनोविज्ञान और डिजिटल युग की चुनौतियों पर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत में दशकों से मलाईदार मंत्रालय और मलाईदार पद मलाईदार एरिया जैसे शब्द राजनीतिक और प्रशासनिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। संसद से लेकर विधानसभा विधान परिषद और पंचायत समिति के चुनाव तक में हमेशा ऐसा सुनने में मिलता है जिससे आम जनमानस में यह धारणा गहरी है कि सरकारी ठेकों से लेकर राजस्व कार्यालयों तक,भ्रष्टाचार एक संरचनात्मक समस्या के रूप में मौजूद है। चुनावी मंचों पर 40-50 प्रतिशत कमीशन की चर्चाएँ,पटवारी से लेकर उच्च अधिकारियों तक चाय-पानी के बिना काम न होने की शिकायतें,ये सब सार्वजनिक संवाद का हिस्सा रहे हैं। ऐसे वातावरण में जब कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार शीर्षक से अध्याय जोड़ा गया,तो बहस का स्वर अचानक तीखा हो गया। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि अब प्रश्न यह उठाता है कि यदि भ्रष्टाचार एक व्यापक सामाजिक -प्रशासनिक समस्या है, तो पाठ्यपुस्तक में केवल न्यायपालिका का ही उल्लेख क्यों? क्या यह चयनात्मक प्रस्तुति है?क्या यह संस्थागत संतुलन के विरुद्ध है?और सबसे महत्वपूर्ण,इसकी जवाबदेही किसकी है? इस अध्याय पर आपत्ति जताते हुए वरिष्ठ नेता कपिल सिबल ने सार्वजनिक रूप से प्रश्न उठाया कि यदि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का उल्लेख किया जा सकता है, तो फिर राजनेताओं,मंत्रियों, लोकसेवकों और जांच एजेंसियों का नाम क्यों नहीं? उनका तर्क यह था कि भ्रष्टाचार किसी एक संस्था तक सीमित नहीं है; यह एक व्यापक प्रशासनिक- सामाजिक समस्या है। इसलिए यदि शैक्षणिक ईमानदारी के नाम पर किसी एक स्तंभ का उल्लेख हो,तो अन्य स्तंभों का भी समान रूप से संदर्भ होना चाहिए। इस कथन ने बहस को संस्थागत मर्यादा बनाम पारदर्शिता के प्रश्न में बदल दिया। क्या बच्चों को संस्थागत कमियों के बारे में बताना पारदर्शिता है या संस्थागत अविश्वास का बीजारोपण?मामले ने तब गंभीर रूप लिया जब भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने स्वतःसंज्ञान लेकर सुनवाई प्रारंभ की।प्रधानन्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसे अत्यंत गंभीर माना और कहा कि न्यायपालिका लोकतंत्र का संवैधानिक स्तंभ है; यदि पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से यह संदेश जाए कि यह स्तंभ ही संदिग्ध है, तो उसके दूरगामी परिणाम होंगे। न्यायालय ने एनसीईआरटी निदेशक और शिक्षा सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी किया तथा स्पष्ट किया कि केवल माफी पर्याप्त नहीं होगी;जवाबदेही तय करनी होगी। न्यायालय की टिप्पणी क़ि यह न्यायपालिका पर पहली गोली चलाने जैसा है,संकेत देती है कि अदालत ने इसे संस्थागत गरिमा पर प्रत्यक्ष प्रहार के रूप में देखा। न्यायालय ने यह भी प्रश्न उठाया कि जब पुस्तक बाजार और डिजिटल मंचों पर उपलब्ध है,तो बाद में उसे वापस लेना कितनी प्रभावी कार्यवाही होगी। डिजिटल युग में सामग्री एक बार प्रसारित हो जाने के बाद उसे पूर्णतःहटाना लगभग असंभव होता है।इसलिए अदालत ने निर्देश दिया कि हार्ड कॉपी और डिजिटल दोनों स्वरूपों को तत्काल हटाया जाए तथा समन्वित कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

साथियों बात अगर हम शैक्षणिक प्रक्रिया और निर्णय की संरचना इसको समझने की करें तो,एनसीईआरटी की आंतरिक प्रक्रिया के अनुसार पाठ्यपुस्तक समिति के सदस्य प्रस्तावों की समीक्षा करते हैं,चर्चा करते हैं,और अंततः अंतिम स्वीकृति निदेशक के स्तर पर होती है। समिति सुझाव देती है,पर अंतिम निर्णय निदेशक के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे में प्रश्न उठता है,क्या इसअध्याय को शामिल करते समय पर्याप्त विमर्श हुआ क्या कानूनी सलाह ली गई? क्या सामग्री की भाषा और प्रस्तुति संतुलित थी? यदि नहीं,तो यह संस्थागत प्रक्रिया में किस स्तर की चूक है एनसीईआरटी ने बाद में प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि वह न्यायपालिका का सम्मान करता है और यह सामग्री अनजाने में हुई गलती थी। उसने अध्याय को पुनर्लेखन और हटाने का निर्णय भी घोषित किया। किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल खेद प्रकट करना पर्याप्त नहीं;जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान और उत्तरदायित्व सुनिश्चित करनाअत्यंत आवश्यक है।
साथियों बात अगर हम किशोर मनोविज्ञान और संस्थागत विश्वास इसको समझने की करें तो यह बहस केवल संवैधानिक या राजनीतिक नहीं है; इसका मनोवैज्ञानिक आयाम भी गहरा है।कक्षा 8 के विद्यार्थी प्रायः 13-14 वर्ष की आयु के होते हैं,एक ऐसी अवस्था जहाँ बौद्धिक जिज्ञासा प्रबल होती है,परंतु विश्लेषणात्मक संतुलन अभी विकसित हो रहा होता है। डिजिटल युग में सूचनाओं की बाढ़,सोशल मीडिया की त्वरित प्रतिक्रियाएँ और प्रतिस्पर्धात्मक दबाव उनके मानसिक संसार को प्रभावित करते हैं। यदि उन्हें बिना संदर्भ,बिना संतुलित विवेचन के यह बताया जाए कि न्यायपालिका भ्रष्ट है या वहां पेंडिंग केसों की संख्या बहुत अधिक है , तो यह संदेश संस्थागत अविश्वास के रूप में ग्रहण हो सकता है।हाल ही में दिल्ली के तिलक नगर में नाबालिगों द्वारा एक किशोर की हत्या की घटना ने समाज को झकझोर दिया। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़ों में भी किशोर अपराधों में वृद्धि दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मत है कि हिंसक डिजिटल सामग्री, संवाद की कमी और भावनात्मक असंतुलन इसके कारण हैं। ऐसे वातावरण में यदि शैक्षणिक सामग्री संस्थाओं के प्रति अविश्वास को पुष्ट करे, तो यह सामाजिक संरचना पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। न्यायपालिका, जो अंतिम न्याय का प्रतीक है,यदि छात्रों के मन में संदिग्ध बने, तो लोकतांत्रिक आस्था कमजोर हो सकती है।
साथियों बात अगर हम पारदर्शिता बनाम संस्थागत गरिमा इसको समझने की करें तो, यहाँ मूल प्रश्न है,क्या छात्रों को संस्थागत कमियों के बारे में पढ़ाना गलत है? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नागरिक शिक्षा में संस्थागत आलोचना का स्थान होता है।अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के कई देशों में पाठ्यक्रम में न्यायिक त्रुटियों, ऐतिहासिक गलत निर्णयों और सुधार आंदोलनों का उल्लेख होता है। परंतु वहाँ प्रस्तुति संतुलित होती है,समस्या के साथ सुधार की प्रक्रिया,जवाबदेही की व्यवस्था और संस्थागत आत्म-सुधार की क्षमता को भी रेखांकित किया जाता है। यदि किसी अध्याय में केवल न्यायपालिका में भ्रष्टाचार शीर्षक हो और संदर्भ, उदाहरण सुधारात्मक तंत्र, न्यायिक सक्रियता,पारदर्शिता उपायों का उल्लेख न हो, तो यह एकतरफा चित्र प्रस्तुत कर सकता है। यही वह बिंदु है जहाँ आलोचना और संस्थागत गरिमा का संतुलन आवश्यक है।
साथियों बात अगर हम जवाबदेही का दायरा इसको समझने की करें,सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि जिम्मेदारी तय होगी।प्रश्न यह है कि क्या यह केवल संपादकीय त्रुटि है या नीति-स्तर का निर्णय? यदि समिति ने सुझाव दिया और निदेशक ने स्वीकृति दी, तो क्या मंत्रालय स्तर पर भी समीक्षा हुई? क्या कानूनी परामर्श लिया गया?क्या विशेषज्ञों, शिक्षाशास्त्रियों मनोवैज्ञानिकों संवैधानिक विद्वानों,से राय ली गई?लोकतंत्र मेंजवाबदेही बहुस्तरीय होती है। यदि पाठ्यपुस्तक में त्रुटि है,तो उसे सुधारना आवश्यक है; परंतु यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में ऐसी संवेदनशील विषयवस्तु संतुलित, तथ्यात्मक और संदर्भयुक्त होन्यायपालिका की प्रतिक्रिया और संस्थागत संदेश प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणी कि हम तब तक शांत नहीं बैठेंगे जब तक संतुष्ट नहीं हो जाते इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका अपनी संस्थागत साख को लेकर सजग है। अदालत ने अवमानना की संभावना भी जताई। यह संदेश केवल एनसीईआरटी को नहीं, बल्कि व्यापक शैक्षणिक तंत्र को भी है कि संवैधानिक संस्थाओं के चित्रण में सावधानी अनिवार्य है।
साथियों बात अगर हम डिजिटल युग की चुनौती को समझने की करें तो, आज सामग्री केवल कागज पर नहीं रहती; वह सोशल मीडिया, पीडीएफ, ब्लॉग और वीडियो के माध्यम से अनंत रूपों में फैलती है। ऐसे में किसी अध्याय को “वापस लेना” प्रतीकात्मक हो सकता है, पर पूर्ण नियंत्रण असंभव है।अतः समाधान केवल हटाने में नहीं, बल्कि सही संदर्भ और संतुलन प्रदान करने में है।आगे का मार्ग इस विवाद से तीन प्रमुख सबक उभरते हैं। पहला, शैक्षणिक सामग्री में संवैधानिक संस्थाओं का चित्रण संतुलित,तथ्यपरक और सुधार- उन्मुख होना चाहिए। दूसरा, किशोर मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर भाषा और प्रस्तुति तय होनी चाहिए। तीसरा, जवाबदेही स्पष्ट और पारदर्शी होनी चाहिए,चाहे वह समिति स्तर पर हो,निदेशक स्तर पर या मंत्रालय स्तर पर।भ्रष्टाचार पर विमर्श आवश्यक है; यह लोकतांत्रिक स्वास्थ्य का संकेत है। परंतु विमर्श का स्वर ऐसा हो जो सुधार की दिशा दिखाए, न कि अविश्वास की दीवार खड़ी करे। यदि छात्रों को यह सिखाया जाए कि न्यायपालिका में चुनौतियाँ रही हैं, परंतु सुधार के तंत्र, पारदर्शिता उपाय और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता भी है, तो यह संतुलित शिक्षा होगी।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि एनसीईआरटी की कक्षा 8 की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार अध्याय ने एक व्यापक राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया है जवाबदेही,संस्थागत गरिमा, किशोर मनोविज्ञान और डिजिटल युग की चुनौतियों पर। सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान यह दर्शाता है कि संवैधानिक संस्थाएँ अपनी प्रतिष्ठा को लेकर सजग हैं। राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ यह संकेत देती हैं कि भ्रष्टाचार का प्रश्न बहु- आयामी है। अंततः यह प्रकरण केवल एक अध्याय का नहीं, बल्कि उस संतुलन का है जो लोकतंत्र में आलोचना और सम्मान के बीच होना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य प्रश्न पूछना सिखाना है,पर साथ हीसंस्थागत विश्वास और संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करना भी है। यदि इस विवाद से भविष्य में अधिक परिपक्व, संतुलित और उत्तरदायी शैक्षणिक नीति विकसित होती है, तो यह लोकतंत्र के लिए सकारात्मक परिणाम
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425