डिजिटल युग,कृत्रिम बुद्धिमत्ता और युवा मानसिक स्वास्थ्य- वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत की स्थिति का समग्र विश्लेषण
भारतीय युवाओं के मेंटल हेल्थ को लेकर बढ़ी चिंता- प्रश्न तकनीक बनाम मानव का नहीं, बल्कि संतुलन का है,डिजिटल युग में रहकर डिजिटल अनुशासन विकसित करना ही समाधान है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर वर्तमान डिजिटल युग में प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने मानव जीवन को अभूतपूर्व गति, सुविधा और वैश्विक संपर्क प्रदान किया है।ओपनएआई, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों द्वारा विकसित एआई उपकरणों ने शिक्षा,स्वास्थ्य, वित्त, प्रशासन और व्यक्तिगत जीवन के निर्णयों तक में गहरी पैठ बना ली है।भारत जैसे युवा देश में यह प्रभाव और भी व्यापक है,जहाँ डिजिटल क्रांति ने स्मार्टफोन और इंटरनेट को जनसामान्य तक पहुँचा दिया है।किंतु इसी परिवर्तनशील परिदृश्य में एक गंभीर प्रश्न उभर रहा है,क्या अत्यधिक डिजिटल निर्भरता और शॉर्ट वीडियो संस्कृति हमारे युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है?मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहता हूं कि भारतीय चिंतन परंपरा में कहा गया है“अति सर्वत्र वर्जयेत्।” यह केवल नैतिक उपदेश नहीं,बल्कि संतुलित जीवन का वैज्ञानिक सिद्धांत है।इसका भावार्थ है जब तकनीक, साधन से अधिक उद्देश्य बन जाती है, तब उसके दुष्प्रभाव स्पष्ट होने लगते हैं।हाल ही में 26 फरवरी 2026 को जर्मनी से जारी ग्लोबल माइंड हेल्थ रिपोर्ट 2025 ने इसी चिंता को तथ्यात्मक आधार दिया है।यह रिपोर्ट स्पेन लेबस के ग्लोबल माइंड प्रोजेक्ट के अंतर्गत तैयार की गई है। विश्व के 84 देशों के 10 लाख से अधिकप्रतिभागियों के डेटा पर आधारित इस अध्ययन में 78,093 भारतीयों को शामिल किया गया,जिनमें 29,594 प्रतिभागी 18-34 वर्ष आयु वर्ग के थे और 24,088 प्रतिभागी 55 वर्ष से अधिक आयु के थे। रिपोर्ट के अनुसार 18 से 34 वर्ष के भारतीय युवा मानसिक स्वास्थ्य के मानकों पर 84 देशों में 60वें स्थान पर हैं। उनका माइंड हेल्थ क्वोशेंट स्कोर मात्र 33 दर्ज किया गया, जबकि 55 वर्ष से अधिक आयु वर्ग का स्कोर 96 रहा और वे वैश्विक रैंकिंग में 49वें स्थान पर रहे। यह पीढ़ीगत अंतर केवल सांख्यिकीय नहीं,बल्कि सामाजिक संरचना में गहरे परिवर्तन का संकेत है।यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने 2017 में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम लागू किया था,जोमानसिक रोगियों के अधिकारों की रक्षा करता है। परंतु जमीनी स्तर पर जागरूकता और संसाधनों की कमी के कारण इसका प्रभाव सीमित रहा है।

मनोचिकित्सकों की उपलब्धता प्रति लाख जनसंख्या के अनुपात में अत्यंत कम है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों की तुलना में भारत में मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की संख्या अपर्याप्त है।भारत यदि इस चुनौती को गंभीरता से लेकर समग्र रणनीति अपनाता है, तो भविष्य में वैश्विक रैंकिंग में सुधार संभव है। मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत सुख- शांति का विषय नहीं,बल्कि राष्ट्र की सामूहिक चेतना और प्रगति का आधार है। इसलिए 2025 की यह रिपोर्ट केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि नीति-निर्माताओं, शिक्षकों, अभिभावकों और युवाओं,सभी के लिए एक साझा आह्वान है कि मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाए और स्वस्थ, संतुलित तथा सशक्त युवा पीढ़ी का सटीकता से निर्माण किया जाए।
साथियों बात अगर हम एमएचक्यू स्कोर को समझने की करें तो यह एक समग्र सूचकांक है,जो व्यक्ति की भावनात्मक स्थिरता,सामाजिक अनुकूलन, ध्यान क्षमता, आत्मनियंत्रण, तनाव से उबरने की क्षमता और जीवन प्रबंधन कौशल को मापता है।जब युवा वर्ग का स्कोर बुजुर्गों की तुलना में लगभग एक-तिहाई रह जाता है, तो यह स्पष्ट करता है कि नई पीढ़ी केवल चिंता या अवसाद से ही नहीं जूझ रही,बल्कि उसकी मूल मनोवैज्ञानिक क्षमताएँ भी कमजोर पड़ रही हैं।रिपोर्ट की प्रमुख वैज्ञानिक और संस्थापक ने स्पष्ट कहा है कि समस्या केवल डिप्रेशन या एंग्जायटी तक सीमित नहीं है;युवाओं में भावनाओं को नियंत्रित करने, ध्यान केंद्रित रखने, स्थिर रिश्ते बनाने और तनाव से उबरने की आधारभूत क्षमता प्रभावित हो रही है।
साथियों बात अगर हम डिजिटल एक्सपोज़र इस गिरावट के प्रमुख कारणों में से एक माना गया है इसको समझने की करें तो,भारत में पहली बार स्मार्टफोन उपयोग की औसत आयु 16.5 वर्ष दर्ज की गई है।किशोरावस्थामस्तिष्क विकास का संवेदनशील चरण होता है,जहाँ न्यूरल नेटवर्क तेजी से विकसित होते हैं। ऐसे समय में निरंतर शॉर्ट वीडियो,रील्स और त्वरित डोपामिन आधारित कंटेंट मस्तिष्क को तत्काल संतुष्टि का आदी बना देता है।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 98 हजार लोगों पर किए गए 71 अध्ययनों के विश्लेषण में पाया गया कि अत्यधिक शॉर्ट वीडियो देखने से ध्यान क्षमता घटती है, आत्मनियंत्रण कम होता है और तनाव व चिंता बढ़ सकती है। हर कुछ सेकंड में बदलता दृश्य और ध्वनि उत्तेजना मस्तिष्क की प्राकृतिक एकाग्रता प्रणाली को बाधित करती है, जिससे पढ़ाई, शोध, पुस्तक पठन और गहन चिंतन जैसे कार्य कठिन प्रतीत होने लगते हैं। भारत स्मार्टफोन एक्सपोज़र के मामले में 84 देशों में 71वें स्थान पर है, किंतु यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि इंटरनेट उपयोग करने वाले 18-34 आयु वर्ग के वैश्विक 41 प्रतिशत युवा गंभीर मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। यह संकेत देता है कि समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है; विकसित और विकासशील दोनों प्रकार के देशों के युवा इससे जूझ रहे हैं। उदाहरणस्वरूप, इस अध्ययन में घाना प्रथम स्थान पर रहा, जबकि विश्व हैप्पीनेस इंडेक्स में शीर्ष पर रहने वाला फिनलैंड 18–34 आयु वर्ग में 40वें स्थान पर रहा। इससे स्पष्ट है कि आर्थिक समृद्धि मानसिक स्वास्थ्य की बिलकुल गारंटी नहीं है।

साथियों बात अगर हम रिपोर्ट में खानपान को भी एक महत्वपूर्ण कारक माना गया है इसको समझने की करें तो,18-34 वर्ष के 44 प्रतिशत भारतीय युवा नियमित रूप से अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन करते हैं,जबकि 55 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में यह आंकड़ा केवल 11 प्रतिशत है। पिछले 15 वर्षों में भारत अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के लिए विश्व के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल हुआ है।उच्च शर्करा,सोडियम और कृत्रिम तत्वों से भरपूर भोजन केवल मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग ही नहीं बढ़ाते, बल्कि आंत-मस्तिष्क अक्ष को प्रभावित कर मानसिक असंतुलन की संभावना भी बढ़ाते हैं।वैज्ञानिक अध्ययनों में यह पाया गया है कि पोषण और मानसिक स्वास्थ्य के बीच सीधा संबंध है; संतुलित आहार भावनात्मक स्थिरता को बढ़ाता है। पारिवारिक जुड़ाव इस परिदृश्य में सुरक्षा कवच की भूमिका निभाता है। रिपोर्ट के अनुसार 18-34 आयु वर्ग के 64 प्रतिशत युवाओं ने स्वयं को परिवार के निकट बताया,जबकि 55 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में यह आंकड़ा 78 प्रतिशत रहा। पारिवारिक करीबी के मामले में भारत दोनों आयु वर्गों में 28वें स्थान पर है। भारतीय समाज की पारंपरिक संयुक्त परिवार व्यवस्था,आध्यात्मिकता और सामुदायिक संस्कृति अभी भी मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक है, किंतु नगरीकरण, प्रवासन और डिजिटल जीवन शैली के कारण इसमें भीगिरावट देखी जा रही है। जब सामाजिक समर्थन तंत्र कमजोर होता है, तो व्यक्ति का भावनात्मक प्रतिरोधक तंत्र भी कमजोर पड़ता है।
साथियों अब हमें यह समझना आवश्यक है कि डिजिटल प्रौद्योगिकी स्वयं समस्या नहीं है;उसका अनियंत्रित और असंतुलित उपयोग समस्या बनता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षा में वैयक्तिकृत शिक्षण, स्वास्थ्य में रोग निदान, कृषि में उत्पादकता वृद्धि और प्रशासन में पारदर्शिता ला सकती है। किंतु यदि हर निर्णय, हर प्रश्न और हरजिज्ञासा का उत्तर केवल एआई से प्राप्त किया जाए, तो मानव मस्तिष्क की विश्लेषणात्मक औरसृजनात्मक क्षमता कुंठित हो सकती है। जब बच्चे और युवा बिना स्वयं विचार किए समाधान खोजने लगते हैं, तो उनका तार्किक कौशल और आत्मविश्वास प्रभावित हो सकता है। तकनीक सहायक बने, विकल्प नहीं,यह सिद्धांत अपनाना आवश्यक है।वैश्विक संदर्भ में देखा जाए तो विकसित देशों के युवा भी मानसिक स्वास्थ्य संकट से जूझ रहे हैं। आर्थिक प्रगति, प्रतिस्पर्धी शिक्षा प्रणाली, नौकरी का दबाव और सामाजिक तुलना ने युवाओं पर अदृश्य मानसिक बोझ डाला है। सोशल मीडिया पर आदर्श जीवनशैली का प्रदर्शन आत्मसम्मान को प्रभावित करता है। निरंतर तुलना की संस्कृति व्यक्ति को यह महसूस कराती है कि वह पर्याप्त नहीं है। इससे आत्ममूल्यांकन नकारात्मक होता है और चिंता बढ़ती है। इस संदर्भ में डिजिटल साक्षरता केवल तकनीकी ज्ञान तक सीमित नहीं,बल्कि भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक जागरूकता तक विस्तारित होनी चाहिए।
साथियों बात अगर हम भारत के लिए यह रिपोर्टचेतावनी के साथ अवसर भी प्रस्तुत करती है इसको समझने की करें तो, एक ओर युवा आबादी देश की जनसांख्यिकीय शक्ति है,दूसरी ओर यदि उनकी मानसिक सेहत कमजोर होती है तो उत्पादकता, नवाचार और सामाजिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है। नीति-निर्माताओं को स्कूल स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा, डिजिटल उपयोग की समय- सीमा, खेल-कूद और कला गतिविधियों को प्रोत्साहन, तथा पोषण संबंधी जागरूकता अभियानों को प्राथमिकता देनी चाहिए। परिवारों को भी संवाद, साझा समय और डिजिटल डिटॉक्स जैसे उपाय अपनाने होंगे।कानूनी दृष्टि से यह रिपोर्ट कोई औपचारिक सरकारी नीति दस्तावेज नहीं है,बल्कि शोध- आधारित सार्वजनिक रिपोर्ट है। इसकी वैज्ञानिक मान्यता पर विशेषज्ञों के बीच मतभेद हो सकते हैं; कुछ इसे व्यापक और उपयोगी डेटा-संग्रह मानते हैं, तो कुछ इसकी पद्धति पर प्रश्न उठाते हैं। फिर भी, इतने बड़े वैश्विक नमूने पर आधारित निष्कर्षों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। नीति निर्माण में इसे संकेतक के रूप में लिया जा सकता है, न कि अंतिम सत्य के रूप में।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि प्रश्न तकनीक बनाम मानव का नहीं,बल्कि संतुलन का है। डिजिटल युग में रहकर डिजिटल अनुशासन विकसित करना ही समाधान है। यदि युवा वर्ग समय-प्रबंधन,आत्मनियंत्रण, नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और पारिवारिक संवाद को प्राथमिकता दे,तो तकनीक उनके विकास का साधन बन सकती है। समाज, परिवार, शैक्षणिक संस्थान और सरकार सभी को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव बुद्धिमत्ता की पूरक बने, प्रतिस्थापक नहीं।“अति सर्वत्र वर्जयेत्” का शाश्वत संदेश आज पहले से अधिक प्रासंगिक है। डिजिटल क्रांति मानव सभ्यता की उपलब्धि है, किंतु मानसिक संतुलन और मानवीय संबंध ही उसके स्थायी आधार हैं। यदि हम संतुलन, संयम और विवेक के साथ तकनीक का उपयोग करें, तो युवा पीढ़ी न केवल मानसिक रूप से सशक्त होगी, बल्कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भी अग्रणी बनेगी। यही इस वैश्विक रिपोर्ट का मूल संदेश और भारत के लिए मार्गदर्शन है।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425