वैश्विक दूध उत्पादन में भारत क़ी लगभग 25 प्रतिशत हिस्सेदारी -उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि के बावजूद गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगे?
दूध में पानी,डिटर्जेंट, यूरिया, स्टार्च या सिंथेटिक रसायन मिलाना न केवल आर्थिक धोखाधड़ी है बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम- शासन प्रशासन को तुरंत एक्शन मोड में आने की ज़रूरत -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर वर्तमान डिजिटल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में जहां एक ओर डेटा एनालिटिक्स, ब्लॉकचेन ट्रेसबिलिटी और स्मार्ट सप्लाई चेन जैसी तकनीकें विकसित हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर खाद्य पदार्थों में मिलावट का संकट भी समानांतर रूप से बढ़ता दिखाई दे रहा है।यह विरोधाभास विशेष रूप से भारत जैसे विशाल उपभोक्ता बाजार में अधिक स्पष्ट है।त्योहारों का मौसममें विशेषकर होली के त्योहार से शुरू हो जाता है,मिठाइयाँ,घी खोआ और दूध की मांग को कई गुना बढ़ा देता है। ऐसे समय में खाद्य सुरक्षा नियामक संस्था भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण द्वारा राज्यों को मिलावट रोकने हेतु सख्त निगरानी के निर्देश जारी करना इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है। हाल ही में कुछ दिनों पूर्व जारी की गई एफएसएसएआई की मिल्क सर्विलांस रिपोर्ट में चौंकाने वाले निष्कर्ष आए है जिससे शासन प्रशासन को एक्शन लेना जरूरी हो गया है। हालिया मिल्क सर्विलांस रिपोर्ट 2025-26 में यह सामने आया कि लगभग 33 से 38 प्रतिशत दूध के नमूने गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे।इनमें पानी,डिटर्जेंट,यूरिया, न्यूट्रलाइज़र और अन्य रासायनिक तत्वों की मिलावट पाई गई। कुछ पैकेटबंद दूध के नमूनों में कोलिफॉर्म बैक्टीरिया और टोटल प्लेट काउंट स्वीकार्य सीमा से कई गुना अधिक दर्ज किया गया। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि यह केवल गुणवत्ता का प्रश्न नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए प्रत्यक्ष खतरा है। दूध, जो बच्चों, बुजुर्गों और रोगियों के लिए पोषण का प्रमुख स्रोत है, यदि संदूषित हो जाए तो इसका प्रभाव दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में सामने आ सकता है। रिपोर्ट में क्षेत्रीय असमानता भी दर्ज की गई है।

उत्तर भारत सबसे अधिक प्रभावित इसको समझने की करें तो रिपोर्ट के अनुसार उत्तर भारत में 47 प्रतिशत नमूने मानकों में विफल पाए गए, जो इसे सबसे असुरक्षित क्षेत्र बनाता है। इंडियन जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन की एक ताजा स्टडी में 330 नमूनों की जांच की गई, जिसमें से 70.6 प्रतिशत में गंभीर मिलावट पाईगई। मिलावट के मुख्य कारक इस प्रकार हैं:पानी:193 नमूनों में मात्रा बढ़ाने के लिए पानी मिलाया गया।डिटर्जेंट (23.9 प्रतिशत ):झाग बनाने और दूध को गाढ़ा दिखाने के लिए।यूरिया (9.1प्रतिशत ):फैट और प्रोटीन की मात्रा को कृत्रिम रूप से बढ़ाने के लिए।विशेषज्ञों का कहना है कि कोलीफॉर्म और डिटर्जेंट युक्त दूध पीने से पेट में संक्रमण, किडनी की बीमारी और दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।उपभोक्ताओं को सलाह दी जाती है कि वे दूध खरीदने से पहले ब्रांड की लेटेस्ट लैब रिपोर्ट और एफएसएसएआई मार्क की जांच जरूर करें।पश्चिम भारत में यह आंकड़ा 23 प्रतिशत,दक्षिण भारत में 18 प्रतिशत और पूर्वी भारत में 13 प्रतिशत रहा।उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े दुग्ध उत्पादक राज्यों में मिलावट की घटनाओं ने चिंता बढ़ा दी है,जबकि तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिणी राज्यों में भी उल्लेखनीय मामलों की पुष्टि हुई।यह क्षेत्रीय असमानता संकेत देती है कि निगरानी, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन और प्रवर्तन क्षमता में बहुत मात्रा में अंतर है।
साथियों बात अगर हम भारत: विश्व का सबसे बहुत बड़ा दूध उत्पादक फिर भी संकटग्रस्त इसको समझने की करें तो सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2025 में भारत का कुल दूध उत्पादन 24.8 करोड़ टन तक पहुंच गया है। पिछले 11 वर्षों में उत्पादन में 69.4 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है। प्रति व्यक्ति उपलब्धता 485 ग्राम प्रतिदिन हो गई है, जो वैश्विक औसत (लगभग 328 ग्राम) से कहीं अधिक है। भारत वैश्विक दूध उत्पादन में लगभग 25 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है। परंतु विडंबना यह है कि उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि के बावजूद गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मात्रा की दौड़ में गुणवत्ता नियंत्रण तंत्र पीछे छूट गया है।हाल ही में ट्रस्टिफाइड नामक स्वतंत्र लैब टेस्टिंग प्लेटफॉर्म की रिपोर्ट में दावा किया गया कि कुछ प्रतिष्ठित पैकेज्ड दूध ब्रांड्स में कोलिफॉर्म बैक्टीरिया निर्धारित सीमा से 98 गुना तक अधिक पाया गया। इस खुलासे ने उपभोक्ताओं के विश्वास को झटका दिया है। डिजिटल युग में जहां उपभोक्ता जागरूकता सोशल मीडिया के माध्यम से तीव्रता से फैलती है,ऐसे खुलासे कंपनियों की ब्रांड वैल्यू और बाजार हिस्सेदारी को गहरा व भारी मात्रा में नुकसान पहुंचा सकते हैं।

साथियों बात अगर हम दूध में मिलावट: केवल धोखाधड़ी नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य पर हमला इसको समझने की करें तो,दूध में पानी, डिटर्जेंट, यूरिया, स्टार्च या सिंथेटिक रसायन मिलाना न केवल आर्थिक धोखाधड़ी है बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम है। यूरिया और डिटर्जेंट जैसे तत्व गुर्दे, लीवर और पाचन तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।कोलिफॉर्म बैक्टीरिया की उपस्थिति जलजनित रोगों और फूड पॉइजनिंग का संकेत देती है। बच्चों में यह संक्रमण, डायरिया और दीर्घकालिक कुपोषण का कारण बन सकता है।कानूनी ढांचा: कड़े प्रावधान, कमजोर क्रियान्वयन भारत में दूध मिलावट एक गंभीर दंडनीय अपराध है। फ़ूड सेफ्टी एंड स्टैण्डर्ड्स एक्ट की धारा 59 के तहत असुरक्षित भोजन के लिए छह वर्ष तक की सजा और पांच लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है; मृत्यु होने पर आजीवन कारावास और न्यूनतम दस लाख रुपये जुर्माना लगाया जा सकता है। धारा 51 सब-स्टैंडर्ड खाद्य के लिए पांच लाख तक जुर्माना, धारा 52 गलत ब्रांडिंग के लिए तीन लाख तक जुर्माना और धारा 53 भ्रामक विज्ञापन के लिए दस लाख तक जुर्माना निर्धारित करती है।इसके अतिरिक्त इंडियन पेनल कोड की धारा 272 (खाद्य पदार्थ में मिलावट) और 273 (हानिकारक खाद्य की बिक्री) के तहत छह माह तक की सजा का प्रावधान है, जबकि धारा 420 के अंतर्गत धोखाधड़ी के लिए सात वर्ष तक की सजा हो सकती है।एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट के अंतर्गत भी आवश्यक वस्तु घोषित क्षेत्रों में अतिरिक्त कार्रवाई संभव है।कई राज्यों ने इसे गैर- जमानती अपराध बनाकर कठोर संशोधन किए हैं।क्रियान्वयन कीसबसे बढ़ी चुनौती: प्रशासनिक ढिलाई या संरचनात्मक कमी?यद्यपि कानून सख्त हैं,परंतु विशेषज्ञों का मत है कि उनका क्रियान्वयन अपेक्षित कठोरता से नहीं हो पा रहा। निरीक्षण की संख्या, लैब परीक्षण क्षमता और अभियोजन की गति में सुधार की आवश्यकता है। कई मामलों में दोष सिद्धि दर कम रहती है, जिससे मिलावटखोरों में दंड का भय कम हो जाता है। लाइसेंस रद्द करना, प्रतिष्ठान सील करना और पुनरावृत्ति पर कठोर दंड जैसे प्रावधानों का प्रभावी उपयोग जरूरी है।
साथियों बात कर हम क्या कुछ आलोचकों द्वारा आरोप क़ि दूध आयात की जमीन तैयार हो रही है? इसको समझने की करें तो कुछ विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों ने यह प्रश्न उठाया है कि बढ़ती मिलावट और गुणवत्ता संकट की चर्चा कहीं भविष्य में दूध आयात के लिए माहौल तैयार करने का प्रयास तो नहीं। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है,परंतु बढ़ती खपत और गुणवत्ता संबंधी चिंताओं ने इस बहस को जन्म दिया है। भारत जैसे देश में, जहां दुग्ध
अर्थव्यवस्था करोड़ों किसानों की आजीविका से जुड़ी है, आयात नीति का प्रभाव व्यापक सामाजिक-आर्थिक परिणाम ला सकता है।
साथियों बात अगरहम डिजिटल समाधान: एआई, ब्लॉकचेन और ट्रेसबिलिटी इसको समझने की करें तो डिजिटल और एआई तकनीकें इस संकट कासमाधान भी प्रस्तुत कर सकती हैं। ब्लॉकचेन आधारित ट्रेसबिलिटी से दूध की पूरी आपूर्ति श्रृंखला को ट्रैक किया जा सकता है,गांव के डेयरी फार्म से लेकर शहर के रिटेल स्टोर तक। एआई आधारित सेंसर और रीयल-टाइम टेस्टिंग किट्स मिलावट का तुरंत पता लगा सकती हैं। मोबाइल ऐप्स के माध्यम से उपभोक्ता शिकायतें दर्ज कर सकते हैं और लैब रिपोर्ट्स सार्वजनिक डोमेन में अति शीघ्रता से पारदर्शी रूप से उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
साथियों बात अगर हम त्योहारी सटीक सतर्कता:को समझने की करें तो एफएसएसएआई का मिलावट विरोधी अभियान- 2026,त्योहारों से पूर्व एफएसएसएआई ने राज्यों को मिलावट विरोधी अभियान- 2026 के तहत निरीक्षण और सैंपलिंग बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। विशेष रूप से मिठाइयां, नमकीन, खाद्य तेल, घी, खोआ और पनीर जैसे उत्पादों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। चिन्हित हॉटस्पॉट और संवेदनशील क्षेत्रों में छापेमारी और त्वरित कार्रवाई की सटीक रणनीति तत्परता से अपनाई
जा रही है।
साथियों बात अगर हम पूरी दुनियाँ के उपभोक्ताओं क़ो जागरूक होना अत्यंत जरूरी है, इसको समझने की करें तोसख्त कानून और प्रशासनिक कार्रवाई के साथ- साथ उपभोक्ता जागरूकता भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। पैकेजिंग पर एफएसएसएआई लाइसेंस नंबर की जांच, एक्सपायरी डेट देखना, और संदिग्ध स्वाद या गंध की स्थिति में शिकायत दर्ज कराना,ये छोटे कदम बड़े परिणाम दे सकते हैं। उपभोक्ता फोरम, राज्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी औरएफएसएसएआई हेल्पलाइन शिकायत दर्ज करने के प्रमुख माध्यम हैं।
साथियों बात अगर हम इस पूरे मुद्दे को अंतरराष्ट्रीयसंदर्भ और भारत की प्रतिष्ठा से जोड़कर समझने की करें तो भारत की वैश्विक दुग्ध उत्पादन में अग्रणी स्थिति उसकी कृषि और सहकारी संरचना,विशेषकर अमूल मॉडल की सफलता का परिणाम है।परंतु यदि गुणवत्ता संकट गहराता है तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निर्यात संभावनाओं पर भी प्रभाव पड़ सकता है। वैश्विक मानकों के अनुरूप गुणवत्ता सुनिश्चित करना भारत की प्रतिष्ठा और आर्थिक हित दोनों के लिए अनिवार्य है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेष कारण चरण करें तो हम पाएंगे क़ि मात्रा से गुणवत्ता की ओर निर्णायक कदम,डिजिटल युग में जहां सूचना तुरंत फैलती है,वहां खाद्य मिलावट जैसे मुद्दे सरकार, उद्योग और समाज सभी के लिए चुनौती बन जाते हैं। भारत ने उत्पादन में विश्व नेतृत्व हासिल कर लिया है, परंतु अब समय है कि गुणवत्ता नियंत्रण, प्रवर्तन सख्ती और तकनीकी नवाचार के माध्यम से विश्वास की पुनर्स्थापना की जाए। दूध केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों के पोषण, किसानों की आय और राष्ट्र की स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ा आधार है। यदि मिलावट पर प्रभावी अंकुश लगाया गया, तो भारत न केवल उत्पादन में बल्कि गुणवत्ता और सुरक्षा में भी विश्व नेतृत्व स्थापित कर सकता है।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425