बिलासपुर :- नई पीढ़ी से लगभग छूटती जा रही सिंधी भाषा अपने आप में बहुत समृद्ध है माना जाता है कि हमारे भारत वर्ष में हर 10 किलोमीटर में बोली बदल जाती है उसी तरह अखंड भारत के सिंध प्रांत में बोली जाने सिंधी भाषा के भी अलग अलग क्षेत्रों में शब्द के अलग अलग मायने निकलते थे जो अब प्रायः हम सिंधी भाषी भूल बिसर गए हैं ऐसा ही एक शब्द है *लारी* जिस तरह यमक अलंकार में एक ही शब्द के एक से अधिक मायने होते है वैसे ही लारी शब्द के भी अलग अलग मायना है ~

इसी कि एक बानगी इस घटना में निहित है वर्षों पूर्व की बात है गोंदिया के रेलवे स्टेशन के दूसरी तरफ भी एक प्लेटफार्म है जहां से बालाघाट सिवनी जाने के लिए टैक्सी बस आदि छूटती है इस प्लेटफार्म की तरफ कुछ कच्ची खोलिया भी थी जिसमें अपेक्षाकृत कमजोर वर्ग के परिवार बसेरा किया करते थे , बालाघाट से बिलासपुर लौटते समय अहमदाबाद गुजरात निवासी एक सुपरिचित सजातीय बंधु भी मेरे साथ ही सहयात्री थे ,, उन सजातीय सहयात्री ने अनुनय विनय करते हुए कहा कि बंधु बिलासपुर की ओर जाने वाली टाटा नागपुर ट्रेन गोंदिया से रात्रि 12 बजे निकलती है अभी 10 बजे है चलिए मेरे रिश्तेदारी में एक कन्या का विवाह होना है उसे चल शगुन डाल आते हैं ,,,, सामान्य बातचीत में मैने पूछ लिया कि कन्या के परिजन व्यवसाय क्या करते हैं उनका जवाब आया कि उनके पास अपनी 40/50 लारियां है जो किराए पर चलती है ,,,, जब हम पहुंचे तो कच्ची खोली में डेढ़ कमरे का कच्चा मकान देख मैने उत्सुकता वश पूछा भई इनकी 40/50 लारियां कहा है दिख तो नहीं रही ,, वो रही 15 लारियां सामने म्युनिसपल के मैदान में और बाकी 40 किराए पर गई हुई है,, मै अचंभित सा रह गया क्योंकि सिंधी बोली में हम लारी *यात्री बस* को कहते जानते समझते है और यहां इन महाशय की सिंधी बोली में इस शब्द का आशय ऐसे *हाथ ठेले अथवा रेहड़ी* से था जिनके चक्के में टायर ट्यूब की जगह रबर सोल लगा रहता है और जो से ऊपर छत विहीन रहता है उसे गन्ना रस या मूंगफल्ली बेचने वाले उस समय 10 रुपए रोज के किराए पर ले जाते थे वर्तमान में शायद बढ़ कर 50/100 रुपए हो गया हो , विश्व की पुरातन सभ्यता और उसका शब्द संचय सचमुच कितना समृद्धशाली है आइए आज 10 अप्रैल सिंधी भाषा दिवस पर संकल्पित हो अपनी वैभवशाली भाषा के व्यवहार और विकास के प्रति।
लेखक
सतराम जेठमलानी
संयोजक सेवा एक नई पहल ,
बिलासपुर (छ ग़)।
10/अप्रैल/2026
