देश / विदेश :- तस्वीर में दिख रहा वह स्वर्ण ‘फरसा’ केवल धातु का एक टुकड़ा नहीं है। वह प्रतीक है भगवान परशुराम के न्याय का, वह प्रतीक है उस अटूट विश्वास का जो एक भारतीय अपने सीने में दबाकर विदेश ले जाता है। कल्पना कीजिए उन हाथों की, जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया की धरती पर दिन-रात मेहनत की होगी, पसीना बहाया होगा, और फिर अपनी गाढ़ी कमाई का एक-एक अंश जोड़कर यह 4 करोड़ का उपहार तैयार किया होगा। यह सोना चमकता हुआ इसलिए दिख रहा है क्योंकि इसमें हज़ारों प्रवासी भारतीयों की आँखों के आँसू और अपने वतन के प्रति असीम तड़प घुली हुई है।
विदा होकर भी जो पास रहे…
जब कोई अपना घर छोड़कर विदेश जाता है, तो वह केवल एक सूटकेस लेकर नहीं निकलता, बल्कि अपने साथ अपनी संस्कृति, अपने संस्कार और अपने देवी-देवताओं की स्मृतियों का भंडार लेकर जाता है। ऑस्ट्रेलिया में बसे उन भारतीयों के लिए यह ‘फरसा’ भेंट करना एक भावुक क्षण रहा होगा। उनके मन में यह विचार रहा होगा कि हम भले ही अपनी मिट्टी से दूर हैं, लेकिन हमारे आराध्य, हमारी जड़ें और हमारे पूर्वजों का तेज आज भी हमारे गौरव का आधार है।
उस पल की कल्पना कीजिए जब पहली बार इस स्वर्ण फरसे को मंच पर लाया गया होगा। वहां मौजूद हर शख्स की आँखें नम रही होंगी। यह भावुकता किसी संपत्ति के प्रदर्शन की नहीं थी, बल्कि इस बात की थी कि “देखिए, हम आपकी संतानें आज भी आपकी शिक्षाओं को नहीं भूली हैं।” यह फरसा उस पिता की याद दिलाता है जो गाँव में बैठा अपने बेटे की राह देख रहा है, और उस माँ की जो आज भी मंदिर में दीया जलाकर अपने बच्चों की सलामती मांगती है।
धर्म का ध्वज और एकता का संदेश
यह तस्वीर हमें सिखाती है कि धर्म केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है। धर्म वह है जो हमें जोड़ता है। जब हाथ में यह भारी स्वर्ण अस्त्र थमाया जा रहा था, तो वह भार केवल सोने का नहीं था, बल्कि उन उम्मीदों का था जो भारत को विश्व गुरु बनाने की दिशा में बढ़ रही हैं। यह उपहार उन लोगों के मुँह पर एक तमाचा है जो कहते हैं कि आधुनिकता के दौर में हम अपनी जड़ों को भूल गए हैं।
इस तस्वीर को देखकर सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है, पर साथ ही आँखों के कोने भी भीग जाते हैं। यह याद दिलाता है कि हम चाहे दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएं, हमारी आत्मा हमेशा उस केसरिया रंग और उस पवित्र मंत्रोच्चार में ही रमी रहेगी जो हमें हमारे होने का अहसास दिलाते हैं।
आज जब हम इस परशुराम के फरसे को देखते हैं, तो हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम भी अपने जीवन में न्याय, साहस और अपनी संस्कृति के प्रति इतनी ही निष्ठा रखेंगे। यह 4 करोड़ की राशि नहीं, यह 140 करोड़ भारतीयों के मान-सम्मान का प्रतीक है।
