- सुरेश सिंह बैस
बिलासपुर। प्रदेश की जीवनदायिनी नदियों के संरक्षण और पुनर्जीवन को लेकर महत्वपूर्ण पहल शुरू होने जा रही है। राज्य की 19 छोटी-बड़ी नदियों के उद्गम स्थलों की पहचान कर उन्हें राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करने की प्रक्रिया तेज की जाएगी। इस संबंध में हाईकोर्ट के निर्देश के बाद राज्य सरकार ने समिति गठन की तैयारी शुरू कर दी है।
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद उद्गम स्थलों की खोज और राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करने की तैयारी
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि प्रदेश से निकलने वाली कई नदियों के उद्गम स्थल धीरे-धीरे सूखते जा रहे हैं, जिससे नदियों का प्राकृतिक अस्तित्व खतरे में पड़ रहा है। ऐसे में इन उद्गम स्थलों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि सभी नदियों और उनके उद्गम स्थलों को राजस्व अभिलेखों में दर्ज किया जाए, ताकि भविष्य में उन पर अतिक्रमण और अवैध कब्जों को रोका जा सके।
विशेषज्ञों को समिति में शामिल करने के निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा गठित समिति को अपर्याप्त बताते हुए उसमें इतिहासकार, पर्यावरणविद्, तकनीकी विशेषज्ञ और स्थानीय जानकारों को शामिल करने की आवश्यकता जताई है। कोर्ट का मानना है कि केवल प्रशासनिक अधिकारियों की समिति नदी संरक्षण के उद्देश्य को पूरी तरह पूरा नहीं कर पाएगी। बताया जा रहा है कि समिति का प्रमुख कार्य नदियों के मूल स्रोतों की तलाश करना, उन्हें पुनर्जीवित करना तथा जल प्रवाह को बनाए रखने के उपाय सुझाना होगा। जिन जिलों से नदियों का उद्गम होता है, वहां के कलेक्टर समिति की निगरानी करेंगे। इसके साथ ही वन, खनिज और जिला पंचायत विभाग के अधिकारी भी सदस्य बनाए जाएंगे।
प्राकृतिक प्रवाह बनाए रखने पर जोर
याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट को बताया गया कि केवल उद्गम स्थलों को सुरक्षित करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र को भी संरक्षित करना जरूरी है। कई स्थानों पर अतिक्रमण और खेती के कारण जलधाराएं प्रभावित हो रही हैं। ऐसे क्षेत्रों को चिह्नित कर कब्जे हटाने की आवश्यकता बताई गई है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी निजी भूमि से नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है, तो शासन को आवश्यक कानूनी प्रक्रिया अपनाकर नदी के अस्तित्व और प्रवाह को सुरक्षित करना होगा।
प्रदेश की प्रमुख नदियां होंगी संरक्षित
जानकारी के अनुसार बिलासपुर से बहने वाली अरपा नदी सहित महानदी, शिवनाथ, हसदेव, तांदुला, पैरी, केलो, मांड व अन्य प्रदेश की 19 नदियों के संरक्षण एवं संवर्धन की योजना पर कार्य किया जाएगा। सरकार ने आश्वासन दिया है कि नई समिति के माध्यम से नदियों के स्रोतों की पहचान, संरक्षण और पुनर्जीवन की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।
जनप्रतिनिधियों की भागीदारी पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी उठा कि प्रस्तावित समिति में आम जनता या जनप्रतिनिधियों की भागीदारी नहीं रखी गई है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि स्थानीय समुदायों और जनप्रतिनिधियों को भी समिति में स्थान दिया जाए, क्योंकि नदी संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं बल्कि सामाजिक सहभागिता का विषय भी है।
