सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” आज की विश्व व्यवस्था तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। एक ओर पश्चिमी देशों का विकसित समूह जिसे “ग्लोबल नॉर्थ” कहा जाता है, वह तकनीक, पूंजी और सैन्य शक्ति में अग्रणी है, वहीं दूसरी ओर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील एवं उभरते राष्ट्र “ग्लोबल साउथ” के रूप में अपनी नई पहचान बना रहे हैं। इन दोनों ध्रुवों के बीच यदि कोई देश संतुलन, संवाद, विश्वास और साझेदारी का सबसे मजबूत सेतु बनकर उभरा है, तो वह भारत है। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी विदेश नीति, आर्थिक क्षमता, तकनीकी प्रगति और लोकतांत्रिक मूल्यों के बल पर विश्व मंच पर ऐसा विश्वास अर्जित किया है, जो आज बहुत कम देशों के पास है। यही कारण है कि आज अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित राष्ट्र भी भारत को अपना रणनीतिक सहयोगी मानते हैं, जबकि अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिकी देशों के लिए भारत आशा, सहयोग और समानता का प्रतीक बन चुका है। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी “संतुलित कूटनीति” है। भारत ने कभी किसी शक्ति समूह की अंधानुकरण नीति नहीं अपनाई। रूस-यूक्रेन युद्ध हो, पश्चिम एशिया का संकट हो या चीन से जुड़ी वैश्विक चिंताएँ - भारत ने हर मुद्दे पर अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक शांति को प्राथमिकता दी। यही स्वतंत्र नीति भारत को विश्वसनीय बनाती है। भारत न तो किसी पर अपनी विचारधारा थोपता है और न ही किसी राष्ट्र के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप की प्रवृत्ति रखता है। ग्लोबल साउथ के देशों को भारत इसलिए अपना स्वाभाविक साथी लगता है क्योंकि भारत स्वयं कभी उपनिवेशवाद, गरीबी, संसाधनों की कमी और विकास संबंधी चुनौतियों से गुजरा है। भारत उनकी समस्याओं को केवल कूटनीतिक भाषा में नहीं, बल्कि अनुभव की गहराई से समझता है। यही कारण है कि कोविड महामारी के दौरान भारत ने “वैक्सीन मित्र” बनकर अनेक गरीब देशों तक दवाइयाँ और टीके पहुँचाए। यह केवल सहायता नहीं थी, बल्कि मानवता और वैश्विक जिम्मेदारी का परिचय था। भारत की तकनीकी और डिजिटल क्रांति भी उसे विश्व में अलग पहचान देती है। आज डिजिटल भुगतान, आधार व्यवस्था, अंतरिक्ष तकनीक, स्टार्टअप और आईटी सेवाओं में भारत का मॉडल दुनिया के लिए प्रेरणा बन रहा है। विकसित देश भारत की तकनीकी क्षमता और विशाल बाजार को अवसर के रूप में देखते हैं, जबकि विकासशील देश भारत के कम लागत वाले विकास मॉडल को अपनाना चाहते हैं। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था भी उसकी विश्वसनीयता को मजबूत करती है। अनेक वैश्विक शक्तियों के बीच बढ़ते तनाव और अधिनायकवादी प्रवृत्तियों के दौर में भारत एक ऐसा विशाल लोकतांत्रिक राष्ट्र है जहाँ विविधता के बीच एकता का अद्भुत उदाहरण दिखाई देता है। यही कारण है कि दुनिया भारत को केवल आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि नैतिक शक्ति के रूप में भी देखने लगी है। आज भारत की भूमिका केवल एक देश की नहीं, बल्कि एक “वैश्विक मध्यस्थ” की बनती जा रही है। जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने जिस प्रकार “वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर” का संदेश दिया, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत विश्व को विभाजन नहीं, बल्कि सहयोग और सहअस्तित्व का मार्ग दिखाना चाहता है। भारत ने अफ्रीकी संघ को जी-20 में स्थायी सदस्यता दिलाकर यह साबित किया कि वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे ग्लोबल साउथ की आवाज बनना चाहता है। भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था, युवा शक्ति, सामरिक स्थिति और सांस्कृतिक प्रभाव उसे आने वाले समय में और अधिक महत्वपूर्ण बनाएंगे। विश्व की बड़ी कंपनियाँ भारत में निवेश कर रही हैं। रक्षा, ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा और अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत तेजी से वैश्विक केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। किन्तु इस बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा के साथ भारत की जिम्मेदारियाँ भी बढ़ी हैं। भारत को अपने भीतर सामाजिक समरसता, आर्थिक समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों को और अधिक मजबूत करना होगा। क्योंकि विश्व में वही राष्ट्र स्थायी नेतृत्व कर सकता है जिसकी आंतरिक नींव मजबूत हो। आज जब दुनिया अविश्वास, युद्ध, आर्थिक अस्थिरता और शक्ति संघर्ष के दौर से गुजर रही है, तब भारत विश्वास, संतुलन और सहयोग का नया प्रतीक बनकर उभर रहा है। भारत न केवल ग्लोबल साउथ की आशाओं का केंद्र है, बल्कि ग्लोबल नॉर्थ के लिए भी एक भरोसेमंद साझेदार है। वास्तव में, आने वाला समय केवल “विश्व शक्ति भारत” का नहीं, बल्कि “विश्व विश्वास भारत” का हो सकता है।