इजराइल के वैज्ञानिकों ने किया शोध –
- सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
- बिलासपुर,छत्तीसगढ़
मानव सभ्यता के इतिहास पर दृष्टि डालें तो एक सत्य हर युग में समान रूप से दिखाई देता है - मनुष्य मृत्यु को स्वीकार तो करता है, किंतु उससे पराजित होना नहीं चाहता। जन्म और मृत्यु के बीच का संघर्ष ही मानव जीवन की सबसे बड़ी कथा है। यही कारण है कि आदिकाल से लेकर आधुनिक युग तक मनुष्य ने अमरता, दीर्घायु और यौवन को बनाए रखने के असंख्य प्रयास किए हैं। कभी यह प्रयास तप, योग और आध्यात्मिक साधना के माध्यम से हुए, तो कभी आयुर्वेद, रसायन विद्या और औषधियों के द्वारा। आज वही खोज अत्याधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी, जीन विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से सुसज्जित प्रयोगशालाओं में जारी है। हाल ही में Bar-Ilan University, Tel Aviv University तथा National Institute on Aging के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया शोध इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। शोध में पाया गया कि SIRT6 नामक प्रोटीन की सक्रियता बढ़ाकर वृद्ध चूहों के यकृत (लिवर) में उम्र बढ़ने से जुड़े अनेक जैविक परिवर्तनों को काफी हद तक पलटा जा सकता है। वैज्ञानिकों ने देखा कि वृद्ध कोशिकाओं में पुनः युवा अवस्था जैसी आनुवंशिक सक्रियता दिखाई देने लगी। यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका Nature Communications में प्रकाशित हुआ है।
आखिर शरीर बूढ़ा क्यों होता है? लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि बुढ़ापा केवल शरीर के घिसने-पिटने की स्वाभाविक प्रक्रिया है। जैसे किसी मशीन के पुर्जे समय के साथ कमजोर हो जाते हैं, वैसे ही शरीर के अंग भी क्षीण होते जाते हैं। लेकिन आधुनिक जीवविज्ञान ने इस धारणा को चुनौती दी है। वैज्ञानिकों के अनुसार वृद्धावस्था केवल कोशिकाओं की क्षति का परिणाम नहीं है, बल्कि यह इस बात से भी जुड़ी है कि कोशिकाएं अपने डीएनए को किस प्रकार "पढ़ती" और "उपयोग" करती हैं। उम्र बढ़ने के साथ डीएनए की संरचना और उसके नियंत्रण तंत्र में अव्यवस्था आने लगती है। परिणामस्वरूप सूजन, रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी, चयापचय संबंधी विकार तथा अनेक आयुजनित रोग उत्पन्न होते हैं।

SIRT6 : लंबी उम्र का रहस्यमयी प्रोटीन वैज्ञानिकों का ध्यान वर्षों से SIRT6 नामक प्रोटीन पर केंद्रित रहा है। इसे "लांगेविटी प्रोटीन" अर्थात दीर्घायु से जुड़ा प्रोटीन कहा जाता है। यह डीएनए की मरम्मत, कोशिकीय ऊर्जा संतुलन, जीन नियंत्रण और सूजन को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शोधकर्ताओं ने लगभग 24 माह आयु वाले चूहों जो मानव आयु के लगभग 70 से 80 वर्ष के बराबर माने जाते हैं, के लिवर में SIRT6 का स्तर बढ़ाया। इसके बाद जो परिणाम सामने आए, उन्होंने वैज्ञानिक समुदाय का ध्यान आकर्षित कर लिया। वृद्ध कोशिकाओं में जीनों की सक्रियता और डीएनए संगठन कई मामलों में युवा चूहों के समान दिखाई देने लगा। सूजन से जुड़े संकेत घटे और चयापचय संबंधी क्रियाएं बेहतर हुईं।
क्या वास्तव में बुढ़ापा पलटा जा सकता है? यह प्रश्न आज पूरी दुनिया को रोमांचित कर रहा है। वर्तमान शोध यह नहीं कहता कि चूहे अमर हो गए या उनकी मृत्यु रुक गई। शोध यह दर्शाता है कि उम्र बढ़ने से उत्पन्न कुछ महत्वपूर्ण जैविक लक्षणों को पीछे की ओर मोड़ा जा सकता है। अर्थात वृद्ध कोशिकाओं को आंशिक रूप से अधिक युवा अवस्था जैसा बनाया जा सकता है। यह अंतर समझना अत्यंत आवश्यक है। उम्र बढ़ने की गति को धीमा करना,स्वस्थ जीवन अवधि बढ़ाना, और पूर्ण अमरता प्राप्त करना ये तीनों अलग-अलग अवधारणाएं हैं। वर्तमान विज्ञान अभी तीसरे लक्ष्य से बहुत दूर है।

क्या इंसान ईश्वर को चुनौती दे रहा है? यह शोध केवल वैज्ञानिक नहीं, बल्कि दार्शनिक और आध्यात्मिक बहस भी खड़ी करता है। जब मनुष्य मृत्यु को टालने, बुढ़ापे को रोकने और जीवन को अनिश्चितकाल तक बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ता है, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या वह प्रकृति अथवा ईश्वर द्वारा निर्धारित व्यवस्था को चुनौती दे रहा है? भारतीय दर्शन में मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक परिवर्तन माना गया है।भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मा न जन्म लेती है और न मरती है। शरीर बदलता है, आत्मा नहीं। वहीं दूसरी ओर विज्ञान का दृष्टिकोण भिन्न है। विज्ञान मृत्यु को एक जैविक प्रक्रिया मानता है, जिसे समझा और संभव हो तो नियंत्रित किया जा सकता है। विज्ञान का उद्देश्य ईश्वर को चुनौती देना नहीं, बल्कि प्रकृति के नियमों को समझना है। किंतु जब यह समझ जीवन की अवधि को अत्यधिक बढ़ाने लगे, तब धार्मिक और नैतिक प्रश्न स्वतः सामने आ जाते हैं।
अमरता का सामाजिक संकट
यदि भविष्य में मनुष्य वास्तव में बहुत लंबा जीवन जीने लगे तो उसके परिणाम केवल व्यक्तिगत नहीं होंगे।
कल्पना कीजिए –
पृथ्वी पर जनसंख्या कितनी बढ़ेगी? संसाधनों पर कितना दबाव पड़ेगा? रोजगार और आर्थिक अवसरों का वितरण कैसे होगा?क्या केवल धनी वर्ग ही महंगी एंटी-एजिंग तकनीकों का लाभ उठा पाएगा? क्या अमरता सामाजिक असमानता को और बढ़ा देगी? यह संभव है कि भविष्य में “दीर्घायु” स्वयं एक आर्थिक संपत्ति बन जाए, जिसे खरीदने की क्षमता हर व्यक्ति के पास न हो।
प्रकृति का संतुलन और मृत्यु का महत्व
प्रकृति का समूचा तंत्र जन्म और मृत्यु के संतुलन पर आधारित है। जंगलों में पुराने वृक्ष गिरते हैं, तभी नई पौधों को सूर्य का प्रकाश मिलता है। पुरानी पीढ़ियां विदा होती हैं, तभी नई पीढ़ियों को अवसर मिलता है। यदि मृत्यु न हो तो विकास, परिवर्तन और सृजन की गति रुक सकती है। इस दृष्टि से देखें तो मृत्यु केवल अंत नहीं, बल्कि जीवन चक्र का आवश्यक अंग है।
विज्ञान की वास्तविक उपलब्धि क्या है?
इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह नहीं है कि मनुष्य अमर हो जाएगा। वास्तविक उपलब्धि यह है कि भविष्य में संभवतः वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों जैसे अल्जाइमर, पार्किंसन, मधुमेह, हृदय रोग और अंगों की क्षीणता को कम किया जा सकेगा। यदि कोई व्यक्ति 90 वर्ष की आयु तक स्वस्थ, सक्रिय और आत्मनिर्भर रह सके, तो यह मानव कल्याण की दृष्टि से बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।
मनुष्य की अमरता की आकांक्षा उतनी ही पुरानी है जितना उसका अस्तित्व। आज SIRT6 जैसे प्रोटीनों पर हो रहे शोध इस स्वप्न को नई वैज्ञानिक दिशा दे रहे हैं। किंतु अभी यह यात्रा प्रारंभिक चरण में है। चूहों पर मिली सफलता को मनुष्यों तक पहुंचने में वर्षों, संभवतः दशकों का समय लग सकता है।
फिर भी यह शोध एक महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने रखता है – क्या मनुष्य मृत्यु को पराजित करना चाहता है, या केवल स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन को लंबा करना चाहता है?
शायद भविष्य का विज्ञान हमें लंबी उम्र दे दे, परंतु जीवन का वास्तविक अर्थ केवल वर्षों की संख्या में नहीं, बल्कि उन वर्षों की गुणवत्ता, संवेदनशीलता, मानवता और सृजनशीलता में निहित रहेगा। और संभवतः यही वह सीमा है, जहां विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे से मिलते दिखाई देते हैं – एक शरीर को बचाने की कोशिश करता है, दूसरा आत्मा को समझने की कोशिश करता है।
मृत्यु से लड़ने निकला मानव, विज्ञान लिए हथियार,
खोज रहा है समय के भीतर, अमरत्व का संसार।
पर जीवन का सत्य यही है, परिवर्तन का क्रम,
जो आया है इस धरती पर, उसे जाना भी है एक दिन।।
- सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
