पर्यावरण दिवस के अवसर पर विशेष –
- सुरेश सिंह बैस
बिलासपुर।स्थानीय जूना बिलासपुर उदई चौक के समीप सुरेंद्र मार्ग में नदी की ओर जाने वाले एक पतले से गलियारा नुमा रास्ते में पीपल का सदियों पुराना विशाल महावृक्ष मौजूद है। इस वृक्ष की यह विशेष खासियत है कि इस पर हजारों पक्षियों का घोसला आशियाना बना हुआ है। इस पीपल महावृक्ष में तोता,चील, कौवे मैंना, कबूतर, गौरैया, बाज, उल्लू, फूलचुक्की, बुलबुल, बगुला ,चमगादड़ आदि कई प्रकार के पंछियों का डेरा बना हुआ है। अनुमान है कि इस बोधिवृक्ष पर तीस चालीस हजार पंछियों का डेरा है।पंछियों की यह संख्या अन्य आसपास के पेड़ों में नहीं दिखाई देती।
मेरे निवास के ठीक सामने, उत्तर दिशा में बहने वाली जीवनदायिनी अरपा नदी के तट की ओर एक विशालकाय पीपल का वृक्ष अपनी पूरी गरिमा और शान के साथ खड़ा है। यह वृक्ष मेरे लिए केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि बचपन से लेकर आज तक का एक जीवंत साथी, प्रकृति का संरक्षक और हजारों पक्षियों का सुरक्षित आश्रय है। शायद पर आया रोज ही इस पेड़ के दर्शन मुझे होते हैं। बिलासपुर में मैं रहता हूं तो इस पेड़ के दर्शन यदा कदा आते जाते होते ही रहता है। इसकी विशालता ही इतनी है की आपको यह ना चाहते हुए भी दिखाई देगा। मुझे अपने बचपन से ही यह पीपल इसी प्रकार विशाल और भव्य दिखाई देता रहा है। समय के साथ इसकी ऊँचाई और फैलाव अवश्य बढ़ा है, परंतु इसकी पहचान और महत्ता आज भी वैसी ही है।
पर उसकी सबसे बड़ी पहचान उसकी ऊँचाई नहीं है। उसकी पहचान है वो हजारों कंठ, जो हर शाम उसमें लौटते हैं। तोते… मिट्ठू… सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में। चील, कौए, मैना, गौरैया, उल्लू और न जाने कितने नाम, कितनी जातियाँ। सूरज के ढलते ही गोधूलि की बेला में चारों दिशाओं से हरे पंखों की कतारें बनती हैं। जैसे कोई अनुशासित सेना हो, कोई नफासत भरी बारात हो। हवा में उनकी ‘टें-टें’ की आवाज़ तैरती है जो कर्कश नहीं, कर्णप्रिय सी लगती हैं। आधे घंटे तक ये सिलसिला चलता है। पूरा आसमान हरियाली से भर जाता है।
गोधूलि बेला में लौटते पंछियों का कलरव रचता है प्रकृति का अनुपम संगीत इस वृक्ष की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह हजारों पक्षियों का बसेरा बना हुआ है। अनुमानतः पचास हजार से अधिक तोते, जिन्हें स्थानीय भाषा में मिट्ठू कहा जाता है, प्रतिदिन इस वृक्ष पर आकर रात्रि विश्राम करते हैं। इनके अतिरिक्त चील, कौवे, मैना, गौरैया, उल्लू और अनेक अन्य पक्षियों का भी यह स्थायी आश्रय है। मेरे घर के चारों ओर अनेक बड़े-बड़े पीपल, नीम, आम और इमली के वृक्ष हैं। घर के ठीक पीछे दक्षिण दिशा में भी एक विशाल पीपल स्थित है, किंतु आश्चर्यजनक रूप से पक्षियों का ऐसा विराट जमावड़ा केवल इसी एक पीपल पर दिखाई देता है। मानो प्रकृति ने स्वयं इसे पक्षियों की राजधानी घोषित कर दिया हो। प्रतिदिन गोधूलि बेला में जब मैं अपनी छत पर टहलने या गमलों में लगे पौधों को पानी देने जाता हूँ, तब एक अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है। चारों दिशाओं से मिट्ठुओं के झुंड अनुशासित कतारों में उड़ते हुए इसी वृक्ष की ओर आते दिखाई देते हैं। उनका यह सामूहिक आगमन किसी सैन्य परेड की तरह व्यवस्थित और अत्यंत मनोहारी प्रतीत होता है। आधे घंटे तक लगातार विभिन्न दिशाओं से पक्षियों का आना-जाना चलता रहता है और पूरा आकाश उनके पंखों की फड़फड़ाहट और टें-टें की कलरव से गूंज उठता है। जब सभी तोते अपने-अपने बसेरों में पहुँच जाते हैं, तब लगभग दस-पंद्रह मिनट तक उनका सामूहिक कलरव और भी तीव्र हो जाता है। ऐसा लगता है मानो वे दिनभर के अनुभव साझा कर रहे हों, अपने साथियों का हालचाल पूछ रहे हों अथवा किसी महत्वपूर्ण सभा में सम्मिलित हों। 10-15 मिनट तक ऐसा लगता है जैसे पीपल की हर टहनी पर कोई संसद लगी हो। कौन जाने, शायद वे दिन भर की कहानियाँ सुनाते हों। किस खेत में मक्का मीठा था, किस बाग में अमरूद पका था, कौन-सा बच्चा आज उन्हें दाना डाल गया। फिर धीरे-धीरे सब कुछ शांत हो जाता है। पक्षी भी विश्राम में लीन हो जाते हैं पेड़ भी शांत खड़ा मौन हो जाता है, पर वो मौन खाली नहीं होता वो तृप्ति का मौन होता है। और केवल पीपल की पत्तियों की धीमी सरसराहट शेष रह जाती है। कभी-कभी हवा का हल्का झोंका जब उस वृक्ष की ओर से पत्तों को छूकर मुझे स्पर्श करता है तो लगता है इस महा बोधिवृक्ष ने मुझे अपना आशीर्वाद दे दिया हो.. ऐसा अनुभव होता है मानो स्वयं प्रकृति मुझे स्पर्श कर रही हो। उस क्षण मन श्रद्धा, करुणा और कृतज्ञता से भर उठता है। अनायास ही इस वृक्ष को नमन करने की इच्छा होती है। पता नहीं क्यों इन परिंदों ने अपना पूरा संसार इसी बोधि वृक्ष को सौंप दिया है। शायद पेड़ों में भी मां जैसी ममता होती है । ये अपनी गोद सबके लिए खोल देते हैं। धन्य है यह आश्रयदाता और अडिग महाबोधि वृक्ष। पीपल का वृक्ष भारतीय संस्कृति में अत्यंत पूजनीय माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसमें भगवान विष्णु तथा अनेक देवताओं का निवास माना जाता है। इसी आस्था का परिणाम है कि इस वृक्ष के विशाल तने के समीप एक मंदिर भी स्थापित है, जहाँ प्रतिदिन पूजा, आरती और भजन-कीर्तन होते हैं। मंदिर की घंटियों और करतालों की मधुर ध्वनि तथा पक्षियों का कलरव मिलकर एक ऐसा सात्विक वातावरण निर्मित करते हैं, जो मन को अद्भुत शांति प्रदान करता है। संभवतः हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण संरक्षण की भावना को ही धार्मिक आस्था से जोड़कर इन वृक्षों को देवतुल्य सम्मान दिया होगा, ताकि मानव इन्हें काटने के बजाय संरक्षित करे। आज जब वृक्षों की संख्या निरंतर घट रही है और पक्षियों के प्राकृतिक आवास समाप्त होते जा रहे हैं, तब ऐसे वृक्षों का महत्व और भी बढ़ जाता है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर हम सभी का यह दायित्व बनता है कि अधिक से अधिक वृक्ष लगाएँ, उन्हें संरक्षित करें और पक्षियों के लिए सुरक्षित आश्रय तैयार करें। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कुछ वृक्षों का संरक्षण करने का संकल्प ले ले, तो न केवल पर्यावरण सुरक्षित रहेगा बल्कि आने वाली पीढ़ियाँ भी प्रकृति के इस अद्भुत संगीत का आनंद ले सकेंगी।आज जब शहरों से हरियाली उजड़ रही है, जब कंक्रीट के जंगल बढ़ रहे हैं, तब इस पीपल को देखकर मन भीग जाता है। ये सिर्फ ऑक्सीजन नहीं देता, ये हज़ारों जीवों को छत देता है, माँ की तरह रात को आँचल में समेट लेता है। इसे देखकर प्रणाम करने का मन होता है ...न जाने किस आदर से, किस कृतज्ञता से। एक पौधा लगाना सिर्फ लकड़ी उगाना नहीं है, किसी का घर बसाना है। किसी तोते का बचपन, किसी गौरैया का घोंसला, किसी बुजुर्ग की छाँव बसाना है। तो बस,एक पीपल हम भी लगाएँ। इसलिए नहीं कि हम बड़े हैं, इसलिए कि हमसे छोटों को भी जीने का हक है। परिंदों का बसेरा बसाएँगे, तभी तो सुबह चहचहाहट से होगी।

जड़ों में जिसके मंदिर, शाखों पर संसद सारी,
पत्तों की सरसराहट में बसी ममता की क्यारी।
उजड़ती दुनिया में जो अब भी देता है सहारा,
वो पीपल नहीं, धरती का उज्जवल है उजियारा।।
