योग शिविर में प्रतिभागियों को सिखाए गए शरीर और मन के संतुलन के दो महत्वपूर्ण अभ्यास
बिलासपुर, राजकिशोर नगर। ब्रह्माकुमारीज़ के शिव अनुराग भवन में आयोजित विशेष योग अभ्यास शिविर में आज उत्तानमंडूकासन एवं शशकासन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए ब्रह्माकुमारी गायत्री दीदी ने कहा कि योग का उद्देश्य केवल शरीर को स्वस्थ बनाना नहीं, बल्कि मन को शांत, विचारों को सकारात्मक और जीवन को संतुलित बनाना भी है। आज के दोनों आसन शरीर और मन के इसी संतुलन का सुंदर उदाहरण हैं।
दीदी ने बताया कि उत्तानमंडूकासन छाती, कंधों एवं फेफड़ों को सक्रिय करने वाला महत्वपूर्ण आसन है। इसके अभ्यास से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है, श्वसन क्षमता में सुधार आता है तथा कंधों एवं पीठ की जकड़न कम होती है। नियमित अभ्यास से व्यक्ति स्वयं को अधिक ऊर्जावान, आत्मविश्वासी और सक्रिय अनुभव करता है।
योग प्रशिक्षक बीके कविता बहन ने मंच से उत्तानमंडूकासन का प्रदर्शन करते हुए प्रतिभागियों को इसकी सही विधि की जानकारी दी। गायत्री दीदी ने बताया कि यह आसन विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो लंबे समय तक बैठकर कार्य करते हैं या जिनकी जीवनशैली अपेक्षाकृत कम सक्रिय है।
इसके पश्चात प्रतिभागियों को शशकासन का अभ्यास कराते हुए उन्होंने बतलाया कि यदि उत्तानमंडूकासन शरीर में ऊर्जा भरता है तो शशकासन मन को शांति और विश्राम प्रदान करता है। यह आसन तनाव, चिंता और मानसिक दबाव को कम करने में सहायक माना जाता है। शशकासन के अभ्यास से रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है तथा मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।
दीदी ने कहा कि शशकासन हमें विनम्रता और सहनशीलता का भी संदेश देता है। जीवन में आगे बढ़ने के लिए केवल शक्ति ही नहीं, बल्कि नम्रता और धैर्य भी आवश्यक हैं। योग हमें इन्हीं गुणों का विकास करना सिखाता है। जब व्यक्ति अपने मन को शांत करना सीख जाता है, तब वह परिस्थितियों के दबाव में भी संतुलित बना रहता है।
उन्होंने प्रतिभागियों को समझाया कि योगाभ्यास के दौरान शरीर पर किसी प्रकार का अनावश्यक दबाव नहीं डालना चाहिए। प्रत्येक आसन को अपनी क्षमता और सहजता के अनुसार करना चाहिए। योग में नियमितता, संयम और सजगता सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं।
