
अंबिकापुर की बिजली व्यवस्था पर गंभीर सवाल, ठेकेदारी सिस्टम और राजनीतिक संरक्षण को लेकर बढ़ी चर्चाअंबिकापुर। सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर की विद्युत व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शहर के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति बनाए रखने की जिम्मेदारी कथित तौर पर महज दो तकनीकी कर्मचारियों के भरोसे संचालित होने की बात सामने आने के बाद आम उपभोक्ताओं, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। विशेष रूप से मेडिकल कॉलेज अस्पताल, जिला अस्पताल, जेल, बीएसएनएल कार्यालय, डाक-तार विभाग, बस स्टैंड क्षेत्र, निजी अस्पतालों और हजारों उपभोक्ताओं की बिजली व्यवस्था से जुड़े मामले ने पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।विशाल क्षेत्र की जिम्मेदारी, लेकिन स्टाफ बेहद कमप्राप्त जानकारी के अनुसार खरसिया नाका, शीतला वार्ड, बाबूपारा, जेल परिसर, मेडिकल कॉलेज अस्पताल, दर्रीपारा के विभिन्न वार्डों, लक्ष्मीपुर, मठपारा, गहिरा गुरु वार्ड सहित शहर के बड़े हिस्से की रात्रिकालीन फ्यूज कॉल और विद्युत फाल्ट सुधार व्यवस्था के लिए केवल तीन कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जाती है। इनमें से एक कर्मचारी वाहन चालक होता है, जबकि वास्तविक तकनीकी कार्य दो कर्मचारियों को ही संभालना पड़ता है।स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सामान्य दिनों में ही शिकायतों का दबाव अधिक रहता है, जबकि मानसून के दौरान बिजली फाल्ट, तार टूटने, ट्रांसफार्मर संबंधी समस्याओं और आपूर्ति बाधित होने की घटनाएं कई गुना बढ़ जाती हैं। ऐसे में दो कर्मचारियों पर पूरे क्षेत्र का भार डालना व्यावहारिक नहीं माना जा रहा है।अस्पतालों और आपात सेवाओं की सुरक्षा पर उठे सवालयह क्षेत्र केवल आवासीय इलाका नहीं है बल्कि यहां मेडिकल कॉलेज से संबद्ध जिला अस्पताल के साथ-साथ जीवन ज्योति, संजीवनी, संकल्प, यशोदा, फिरदौसी, केडी, लेजर, माता राजरानी और एसआरएस जैसे अनेक निजी अस्पताल भी संचालित हैं।इन अस्पतालों में आईसीयू, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन सपोर्ट सिस्टम और अन्य जीवनरक्षक उपकरण लगातार विद्युत आपूर्ति पर निर्भर रहते हैं। इसके अलावा जेल, बीएसएनएल का मुख्य कार्यालय, डाक विभाग और अन्य महत्वपूर्ण संस्थान भी इसी नेटवर्क से जुड़े हुए हैं।विद्युत क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संस्थानों को बिजली आपूर्ति देने वाले फीडरों को अत्यंत संवेदनशील श्रेणी में रखा जाता है और इनके लिए विशेष निगरानी, पर्याप्त तकनीकी स्टाफ तथा त्वरित प्रतिक्रिया दल की व्यवस्था आवश्यक होती है। इसके बावजूद सीमित मानवबल के सहारे व्यवस्था संचालित होना चिंता का विषय माना जा रहा है।वायरल वीडियो ने बढ़ाई बहसहाल ही में सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो ने इस मुद्दे को और अधिक चर्चा में ला दिया है। वीडियो में फ्यूज कॉल से जुड़े एक कर्मचारी द्वारा कथित रूप से स्टाफ की कमी और कार्य के दबाव का उल्लेख किया गया है।वीडियो सामने आने के बाद नागरिकों का कहना है कि यदि स्वयं फील्ड में काम करने वाले कर्मचारी संसाधनों और मानवबल की कमी की बात कर रहे हैं, तो उपभोक्ताओं द्वारा वर्षों से की जा रही शिकायतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।कई उपभोक्ताओं ने आरोप लगाया है कि रात में बिजली गुल होने के बाद शिकायत दर्ज कराने के बावजूद कई-कई घंटे तक सुधार कार्य शुरू नहीं हो पाता, जिससे आम लोगों के साथ-साथ मरीजों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को भी परेशानी उठानी पड़ती है।ठेकेदारी व्यवस्था पर फिर उठे सवालशहर में लंबे समय से विद्युत मेंटेनेंस कार्य ठेकेदारी व्यवस्था के माध्यम से संचालित किए जाने की चर्चा रही है। स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जा रहा है कि संभाग मुख्यालय के तीनों जोन का विद्युत मेंटेनेंस कार्य एक प्रभावशाली स्थानीय ठेकेदार के पास है।आलोचकों का आरोप है कि वर्षों से एक ही व्यवस्था चलने के बावजूद उपभोक्ताओं को अपेक्षित स्तर की सेवा नहीं मिल पा रही है। सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि यदि रिकॉर्ड में पर्याप्त संसाधन और मानवबल उपलब्ध हैं तो जमीनी स्तर पर कर्मचारियों की कमी क्यों दिखाई देती है।कर्मचारियों की स्थिति भी चिंता का विषयसूत्रों के अनुसार ठेका प्रणाली के अंतर्गत कार्य करने वाले कई कर्मचारियों को सीमित वेतन, अस्थायी रोजगार और अपर्याप्त सुरक्षा संसाधनों के बीच काम करना पड़ता है। बिजली विभाग के कार्य को अत्यधिक जोखिमपूर्ण माना जाता है, लेकिन कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाओं और सुरक्षा उपकरणों को लेकर भी समय-समय पर प्रश्न उठते रहे हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि जब कर्मचारी संख्या कम होगी, कार्य का दबाव अधिक होगा और संसाधन सीमित होंगे, तब सेवा की गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है।राजनीतिक संरक्षण के आरोपों ने बढ़ाई चर्चापूरे मामले में राजनीतिक पहलू भी चर्चा का केंद्र बना हुआ है। स्थानीय राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठाया जा रहा है कि वर्षों से संचालित ठेका व्यवस्था विभिन्न राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद जस की तस कैसे बनी रही।चर्चाओं के अनुसार संबंधित ठेकेदार पहले सत्ता में रही राजनीतिक व्यवस्था के करीब माना जाता था और बाद में बदलते राजनीतिक परिदृश्य के अनुरूप उसने अपनी राजनीतिक सक्रियता भी बदली। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन जनता के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि यदि व्यवस्था में कमियां हैं तो फिर सुधारात्मक कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई देती।विभागीय जवाबदेही पर उठ रहे प्रश्नशहरवासियों का कहना है कि यदि विभाग के पास पर्याप्त कर्मचारी उपलब्ध हैं तो रात्रिकालीन ड्यूटी में केवल दो तकनीकी कर्मचारी ही क्यों तैनात रहते हैं? यदि व्यवस्था पूरी तरह सक्षम है तो शिकायतों के समाधान में देरी क्यों होती है? और यदि अस्पताल, जेल तथा अन्य संवेदनशील संस्थान सर्वोच्च प्राथमिकता में हैं तो उनके लिए अलग आपातकालीन विद्युत प्रतिक्रिया दल की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?बारिश के मौसम में बढ़ सकती हैं मुश्किलेंमानसून की शुरुआत के साथ ही बिजली फाल्ट, तार टूटने और ट्रिपिंग की घटनाएं बढ़ने की आशंका रहती है। ऐसे में वर्तमान व्यवस्था को लेकर नागरिकों की चिंता और बढ़ गई है।शहर के लोगों का कहना है कि अंबिकापुर जैसे संभागीय मुख्यालय में बिजली व्यवस्था किसी प्रयोग या अस्थायी व्यवस्था के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। जनता चाहती है कि विभाग इस पूरे मामले पर स्पष्ट स्थिति सामने रखे, उपलब्ध मानवबल की जानकारी सार्वजनिक करे और संवेदनशील क्षेत्रों के लिए पर्याप्त तकनीकी व्यवस्था सुनिश्चित करे।प्रमुख सवाल* क्या वास्तव में इतने बड़े क्षेत्र की रात्रिकालीन बिजली व्यवस्था केवल दो तकनीकी कर्मचारियों के भरोसे संचालित हो रही है?* अस्पताल, जेल और अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों के लिए अलग आपातकालीन टीम क्यों नहीं है?* ठेका व्यवस्था में कार्यरत कर्मचारियों की वास्तविक संख्या क्या है?* रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत में अंतर क्यों दिखाई दे रहा है?* वर्षों से मिल रही शिकायतों के बावजूद व्यवस्था में सुधार क्यों नहीं हो पाया?बताया जा रहा है कि ठेकेदार पहले कांग्रेस में थे अब भाजपा में आ गए हैं इसलिए राजनैतिक संरक्षण की बात भी सामने आ रही है मतलब उपभोक्ता एक तो बिजली के बढ़े हुए दाम दे ऊपर से सेवा के नाम पर बार बार की कटौती और लो वोल्टेज समस्या झेले लेकिन इन सब में ठेकेदार के प्रॉफिट और अधिकारियों के कथित कमीशन में कोई कमी नहीं होनी चाहिए वाह रे “सुशासन तिहार’’।इन सवालों के जवाब अब केवल उपभोक्ता ही नहीं, बल्कि पूरा शहर जानना चाहता है। अंबिकापुर की बिजली व्यवस्था को लेकर उठे ये प्रश्न आने वाले दिनों में प्रशासन, विद्युत विभाग और जनप्रतिनिधियों के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
