
संगठित अपराध के विरुद्ध केवल गिरफ्तारी नहीं, उसके पूरे नेटवर्क, आर्थिक तंत्र और बार-बार अपराध करने की प्रवृत्ति का विधिक विनाश ही सुरक्षित, न्यायपूर्ण और विकसित भारत का मार्ग है
संगठित अपराध सिंडिकेट, मादक पदार्थों की तस्करी अवैध खनन,हवाला,साइबर अपराध, रंगदारी,भूमि माफिया, मानव तस्करी व आदतन अपराधी बार-बार जमानत पर छूटकर फ़िर अपराध करते हैं,राष्ट्र की अर्थव्यवस्था,लोकतंत्र,निवेश,सामाजिक विश्वास और नागरिक सुरक्षा पर सीधा हमला -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत आज विश्व की सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।डिजिटल क्रांति, वैश्विक निवेश,आधुनिक अवसंरचना और सामाजिक परिवर्तन के इस दौर में यदि कोई सबसे बड़ी चुनौती विकास की गति को बाधित करती है,तो वह है संगठित अपराध (आर्गेनाइजेड क्राइम), आपराधिक सिंडिकेट,मादक पदार्थों की तस्करी,अवैध खनन,हवाला साइबर अपराध, रंगदारी,भूमि माफिया,मानव तस्करी तथा ऐसे आदतन अपराधी जो बार-बार जमानत पर छूटकर फिर अपराध करते हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि ऐसे अपराध केवल कानून- व्यवस्था का प्रश्न नहीं हैं, बल्कि वे राष्ट्र की

अर्थव्यवस्था,लोकतंत्र निवेश,सामाजिक विश्वास और नागरिक सुरक्षा पर सीधा हमला हैं।आज 30 जून 2026 क़ो महाराष्ट्र विधानसभा में चल रहे मानसून सत्र में माननीय मुख्यमंत्री ने भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार संगठित अपराध और नशा तस्करी के विरुद्ध अपनी कार्रवाई को और अधिक कठोर बनाने की दिशा में काम कर रही है। उन्होंने कहा कि ऐसे आदतन (रिपीट) अपराधी, विशेषकर ड्रग तस्करी और संगठित आपराधिक सिंडिकेट से जुड़े लोग,जो बार-बार जमानत पर छूटकर फिर से अपराध करते हैं, उन्हें महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ़ ऑर्गनिज़ड क्राइम एक्ट (मकोका) के दायरे में लाने के लिए सरकार आवश्यक कानूनी प्रावधानों पर विचार कर रही है।उनके अनुसार केवल सामान्य आपराधिक धाराओं या नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सबस्टेन्सेस एक्ट,1985 (एनडीपीएस अधिनियम) के तहत कार्रवाई पर्याप्त नहीं है,क्योंकि कई मामलों में आरोपी जमानत मिलने के बाद पुनःउसी अवैध गतिविधि में शामिल हो जाते हैं। इसलिए संगठित ड्रग नेटवर्क, उनके वित्तीय तंत्र और बार-बार अपराध करने वाले गिरोहों पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए मकोका जैसे सख्त कानून का उपयोग आवश्यक माना जा रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस संबंध में गृह विभाग आवश्यक प्रक्रिया आगे बढ़ा रहा है, ताकि संगठित अपराध पर निर्णायक प्रहार करते हुए समाज में कानून का प्रभावी भय स्थापित किया जा सके। इसी को आधार बनाते हुए इस आर्टिकल के माध्यम से मैं पूरे भारत के राज्यों से अपील करना चाहूंगा कि वह भी इस मॉडल को अपनाएं।
साथियों, यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनना है और समाज में भयमुक्त वातावरणe स्थापित करना है,तो केवल अपराधियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होगी।आवश्यकता इस बात की है कि अपराध के पूरे नेटवर्क,उसकी वित्तीय संरचना,उसके राजनीतिक- सामाजिक संरक्षण तथा पुनरावृत्ति करने वालेe अपराधियों पर कठोर और प्रभावी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। यही वास्तविक अर्थों में कानून का शासन (रूल ऑफ़ ला) होगा।भारत के विभिन्न राज्यों ने संगठित अपराध के विरुद्ध विशेष कानून बनाए हैं। सबसे चर्चित उदाहरण महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट (मकोका) है,जिसे सामान्यतः मकोका कहा जाता है। इस कानून का उद्देश्य केवल अपराधी को दंडित करना नहीं, बल्कि उसके पूरे आपराधिक संगठन,वित्तीय स्रोत और नेटवर्क को समाप्त करना है। समय के साथ कई अन्य राज्यों ने भी समान सटीक कानून बनाए हैं।
साथियों, इसी प्रकार कर्नाटक कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट (ककोका), गुजरात कंट्रोल ऑफ टेररिज्म एंड ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट (गकटोक), तथा उत्तर प्रदेश कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट (यूपीकोका) जैसे प्रयास यह दर्शाते हैं कि राज्यों ने संगठित अपराध की गंभीरता को समझा है। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय न्याय संहिता, 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023,भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023, गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम (यूएपीए ),धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए ), राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए), एनडीपीएस अधिनियम, तथा गैंगस्टर्स एवं समाज विरोधी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम जैसे अनेक कानून उपलब्ध हैं। चुनौती कानूनों की कमी नहीं,बल्कि उनके प्रभावी, समयबद्ध और निर्भीक क्रियान्वयन की है।
साथियों, एक अधिवक्ता होने के नाते मैं देखता हूं क़ि विशेष चिंता उन अपराधियों की है जो गंभीर अपराधों में गिरफ्तार होने के बाद जमानत पर बाहर आते हैं और पुनःउसी अपराध में संलिप्त हो जाते हैं। ऐसे रीपीट ऑफेंडर्स कानून के प्रति भय समाप्त कर देते हैं। इसलिए आवश्यक है कि जिन व्यक्तियों का संगठित अपराध, गैंग संचालन,मादक पदार्थों की तस्करी,मानव तस्करीसाइबर धोखाधड़ी या हिंसक अपराधों का लंबा इतिहास हो, उनके मामलों में जमानत देते समय न्यायालयों के समक्ष अपराध कीw पुनरावृत्ति, पीड़ितों की सुरक्षा और समाज पर संभावित प्रभाव जैसे पहलुओं का गंभीर मूल्यांकन हो तथा कानून के अनुरूप कठोर शर्तें लागू की जाएँ।आधुनिक संगठित अपराध अब केवल स्थानीय नहीं रहा। यह डिजिटल बैंकिंग,क्रिप्टोकरेंसी,डार्क वेब,फर्जी कंपनियों शेल अकाउंट,अंतरराष्ट्रीय हवाला नेटवर्क और साइबर प्लेटफॉर्म के माध्यम से संचालित होता है। इसलिए केवल स्थानीय पुलिस नहीं, बल्कि राज्यों, केंद्रीय एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बीच प्रभावी समन्वय आवश्यक है। अपराधी नेटवर्क सीमाओं का सम्मान नहीं करते; इसलिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों को भी तकनीक और सूचना साझाकरण के माध्यम से उतना ही सशक्त होना होगा।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी यही बताते हैं। इटली ने माफिया के विरुद्ध,अमेरिका ने संगठित अपराध के विरुद्ध तथा अनेक यूरोपीय देशों ने वित्तीय अपराधों के विरुद्ध कठोर कानूनी ढाँचे विकसित किए। इन मॉडलों का मूल सिद्धांत था केवल अपराधी को जेल भेजना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके धन,संपत्ति,नेटवर्क, सहयोगियों और आर्थिक शक्ति को समाप्त करना आवश्यक है। यही रणनीति भारत में भी अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकती है।अपराध के विरुद्ध सबसे बड़ा हथियार केवल दंड नहीं बल्कि दंड का निश्चित और शीघ्र होना है।यदि जांच वैज्ञानिक हो, डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित हों, अभियोजन सक्षम हो और मुकदमे समयबद्ध हों, तो अपराधी के मन में कानून का वास्तविक भय उत्पन्न होता है। दूसरी ओर वर्षों तक लंबित मुकदमे, कमजोर जांच और गवाहों पर दबाव न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता को कम करते हैं। इसलिए पुलिस सुधार, फॉरेंसिक क्षमता, डिजिटल जांच, गवाह संरक्षण और अभियोजन प्रणाली को समानe महत्व देना होगा।साथ ही यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि कठोर कानूनों का प्रयोग केवल संगठित और गंभीर अपराधों के विरुद्ध हो तथा प्रत्येक आरोपी को संविधान प्रदत्त निष्पक्ष सुनवाई, न्यायिक समीक्षा और विधिक अधिकार प्राप्त रहें। कानून का उद्देश्य भय पैदा करना नहीं, बल्कि न्याय और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। लोकतंत्र में कठोरता और संवैधानिक संतुलन दोनों साथ-साथ चलते हैं।
साथियों, यदि भारत कोe भ्रष्टाचार माफिया,नशा तस्करी, साइबर अपराध,अवैध खनन,भूमि कब्ज़ा और संगठित अपराध से मुक्त बनाना है, तो राज्यों और केंद्र के बीच एक समन्वित राष्ट्रीय रणनीति विकसित करनी होगी। इसमें अपराधियों की संपत्ति जब्ती, अवैध आय की पहचान, तकनीकी निगरानी, अंतरराज्यीय डाटाबेस, वित्तीय खुफिया तंत्र और त्वरित न्याय प्रणाली प्रमुख आधार बन सकते हैं।
साथियों, भारतीय संस्कृति में सतयुग और त्रेतायुग न्याय, सत्य, धर्म और लोककल्याण के प्रतीक माने जाते हैं। आधुनिक लोकतांत्रिक भारत में इन आदर्शों का अर्थ किसी धार्मिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना नहीं, बल्कि ऐसा शासन है जहाँ कानून सर्वोपरि हो, अपराधी कानून से भयभीत हों, निर्दोष नागरिक सुरक्षित हों, महिलाओं, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों को निर्भय वातावरण मिले तथा न्याय सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध हो। यही संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप “सुशासन” की वास्तविक परिकल्पना है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि यह कहा जा सकता है कि संगठित अपराध के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष केवल पुलिस का दायित्व नहीं,बल्कि सरकार, न्यायपालिका,जांच एजेंसियों, अभियोजन, नागरिक समाज और जागरूक नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है। जब कानून निष्पक्ष,त्वरित और प्रभावी ढंग से लागू होगा, जब अपराध सिंडिकेट का आर्थिक और संगठनात्मक ढाँचा ध्वस्त होगा,जब आदतन अपराधियों के विरुद्ध कानून की कठोरता और न्यायिक प्रक्रिया की गति दोनों सुनिश्चित होंगी,तब भारत अधिक सुरक्षित, निवेश- अनुकूल,न्यायपूर्ण और विश्वासपूर्ण राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ सकेगा। यही विकसित भारत, सुशासन और संविधान आधारित न्याय व्यवस्था की सबसे मजबूत आधारशिला होगी।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
