*꧁‼️सत्य सनातन धर्म की जय‼️꧂
**तुलसीदास और सूरदास:

भक्ति का तराजू*एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी ब्रज पहुँचे, जहाँ उनकी भेंट महाकवि सूरदास जी से हुई। दोनों महान भक्त कवियों ने एक-दूसरे के प्रति सम्मान प्रकट किया और भक्ति-रस की चर्चा की। वार्तालाप के दौरान तुलसीदास जी ने शरारतवश सूरदास जी से कहा, “सूर बाबा! आप कहाँ इस नटखट कन्हैया के चक्कर में पड़े हैं? हमारे आराध्य प्रभु श्री राम की शरण में आइए। हमारे ठाकुर बहुत सरल और वचन के पक्के हैं, जबकि आपके कन्हैया अपनी बातों पर टिकते नहीं हैं।”तुलसीदास जी के इन शब्दों ने सूरदास जी के हृदय को छू लिया और भक्ति के गौरव को लेकर दोनों के बीच एक रोचक प्रतियोगिता छिड़ गई। यह निर्णय करने के लिए कि किनके आराध्य ‘भारी’ हैं, एक विशाल तराजू तैयार किया गया।*भक्ति की परीक्षा*पेड़ पर तराजू लटकाया गया। एक पलड़े में सूरदास जी अपने प्रभु कृष्ण की मूर्ति लेकर बैठे और बोले, *”हे मेरे गोपाल! आज भक्त की लाज रखना।”* वहीं, दूसरे पलड़े में तुलसीदास जी श्री सीताराम जी की मूर्ति के साथ विराजमान हुए और बोले, *”जय हो श्री सीताराम! प्रभु, भक्त की लाज रखना।”*जब तराजू थमा, तो तुलसीदास जी का पलड़ा भारी निकला। यह देखकर सूरदास जी को अत्यंत ग्लानि हुई। वे उदास मन से अपने प्रभु कृष्ण की मूर्ति लेकर कुटिया में लौट आए और प्रभु को उलाहना देने लगे, “हे प्रभु! मैंने जीवन भर आपके ही गुण गाए, कभी आपसे कुछ नहीं मांगा, फिर आज आपने मेरी लाज क्यों नहीं रखी?”*कृष्ण का दिव्य उत्तर*उसी क्षण श्री कृष्ण प्रकट हुए। उन्होंने सूरदास जी के चेहरे को अपने हाथों में लेकर प्यार से कहा, “बाबा! इसमें मेरी क्या गलती है? दोष तुम मुझे दे रहे हो!” सूरदास जी ने क्रोधित होकर कहा, “गलती तो मेरी ही है कि मैंने आपकी भक्ति की।”तब श्री कृष्ण मुस्कुराकर बोले, “अच्छा यह बताओ, दो लोग भारी होंगे या तीन?” सूरदास जी ने कहा, “प्रभु! दो से तीन तो भारी ही होंगे।” कृष्ण ने समझाया, “तुम जब पलड़े में बैठे तो तुमने कहा—’हे गोपाल जी लाज रखियो’, वहाँ केवल एक तुम और एक मैं, कुल दो लोग थे। लेकिन जब तुलसी बाबा बैठे, तो उन्होंने कहा—’जय श्री सीताराम, लाज रखना’। वहाँ सीता जी, श्री राम और स्वयं तुलसीदास—कुल तीन लोग थे। इसलिए उनका पलड़ा भारी हो गया। यदि तुमने पुकारा होता—’हे राधेश्याम, लाज रखियो’, तो तुम्हारे पलड़े में भी तीन लोग होते और वजन बराबर होता!”*उपसंहार*अपनी भूल समझकर सूरदास जी का मन प्रसन्नता से भर गया। उन्होंने श्री कृष्ण से क्षमा माँगी और पुनः मूर्ति लेकर तुलसीदास जी के पास पहुँचे। उन्होंने तुलसीदास जी से कहा, “बाबा, चलिए, एक बार फिर वजन करते हैं।”तुलसीदास जी तो ज्ञानी थे, वे स्थिति को समझ गए कि सूरदास जी किससे मिलकर आ रहे हैं। उन्होंने मुस्कुराते हुए वजन करने से मना कर दिया और आगे बढ़कर सूरदास जी को अपने गले से लगा लिया। यह भक्ति का वह मिलन था जहाँ तर्क समाप्त हो गए और केवल प्रेम शेष रह गया।*सीख:* यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर का स्वरूप चाहे कोई भी हो, उनके प्रति भक्त का अनन्य प्रेम और विश्वास ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। जहाँ निश्छल भक्ति होती है, वहाँ ईश्वरीय कृपा का अनुभव स्वयं सिद्ध होता है।*꧁‼️जय राम जी की ‼️꧂*
