
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” छत्तीसगढ़ प्रदेश की संस्कारधानी न्यायधानी बिलासपुर नगर से लगभग 18 किलोमीटर दूर कोटा मार्ग पर स्थित गनियारी ग्राम अपने भीतर इतिहास का एक ऐसा अध्याय समेटे हुए है, जो आज भी शोधकर्ताओं, पुरातत्वविदों और श्रद्धालुओं को समान रूप से आकर्षित करता है। गांव के मध्य स्थित लगभग एक हजार वर्ष पुराना शिव मंदिर कलचुरीकालीन स्थापत्य कला, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक वैभव का जीवंत प्रतीक है। यद्यपि समय की मार ने इस मंदिर के अनेक हिस्सों को क्षतिग्रस्त कर दिया है, फिर भी इसकी भव्यता और आध्यात्मिक ऊर्जा आज भी लोगों को अपनी ओर खींचती है।कलचुरी राजवंश की गौरवशाली धरोहरइतिहासकारों के अनुसार गनियारी का यह शिव मंदिर 11वीं-12वीं शताब्दी के मध्य कलचुरी राजाओं द्वारा निर्मित कराया गया था। उस समय रतनपुर कलचुरी साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी। कलचुरी शासक भगवान शिव के अनन्य उपासक थे और उन्होंने पूरे छत्तीसगढ़ में अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण कराया।रतनपुर का महामाया मंदिर, मल्हार के प्राचीन मंदिर, पाली का शिव मंदिर और गनियारी का यह शिवालय उसी स्थापत्य परंपरा के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। इन मंदिरों के माध्यम से तत्कालीन शासकों ने धार्मिक आस्था के साथ-साथ कला और स्थापत्य को भी संरक्षण प्रदान किया।स्थापत्य कला का अनुपम उदाहरणगनियारी का मंदिर नागर शैली की वास्तुकला पर आधारित है। मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार अत्यंत कलात्मक है। द्वार की चौखटों पर देवी-देवताओं, अप्सराओं, गंधर्वों तथा पुष्पलताओं की सुंदर नक्काशी आज भी देखी जा सकती है।मंदिर का गर्भगृह वर्तमान में सुरक्षित है, जहां शिवलिंग स्थापित है। हालांकि मंदिर का मूल शिखर तथा मंडप कालांतर में नष्ट हो चुके हैं। टूटे हुए पत्थरों और क्षतिग्रस्त दीवारों के बावजूद मंदिर का स्थापत्य यह दर्शाता है कि अपने समय में यह अत्यंत भव्य और विशाल रहा होगा। मंदिर परिसर में प्रयुक्त विशाल प्रस्तर खंड उस युग के शिल्पकारों की अद्भुत दक्षता का प्रमाण हैं। बिना आधुनिक तकनीक के इतने विशाल पत्थरों को तराशकर कलात्मक संरचना खड़ी करना उस समय की उन्नत निर्माण कला को दर्शाता है।शिवलिंग की महिमा और आस्थामंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है। सावन मास, महाशिवरात्रि तथा अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। ग्रामीणों का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से की गई प्रार्थना भगवान शिव अवश्य सुनते हैं। अनेक श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ण होने के बाद पुनः मंदिर में आकर अभिषेक और विशेष पूजा संपन्न कराते हैं। लोककथाएं और किंवदंतियांभारत के अधिकांश प्राचीन मंदिरों की तरह गनियारी का यह शिवालय भी अनेक लोककथाओं और किंवदंतियों से जुड़ा हुआ है।एक रात में बना मंदिरग्रामीणों में प्रचलित एक कथा के अनुसार इस मंदिर का निर्माण दिव्य शक्तियों द्वारा एक ही रात में किया जा रहा था। किंतु सूर्योदय होने से पहले कार्य पूर्ण नहीं हो सका और मंदिर अधूरा रह गया। यद्यपि इस कथा का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, फिर भी यह स्थानीय जनमानस में आज भी लोकप्रिय है।गुप्त सुरंग का रहस्यकुछ बुजुर्ग बताते हैं कि मंदिर से रतनपुर तक एक भूमिगत सुरंग थी, जिसका उपयोग युद्ध अथवा आपातकालीन परिस्थितियों में किया जाता था। हालांकि पुरातत्व विभाग को इसका कोई ठोस प्रमाण प्राप्त नहीं हुआ है, लेकिन यह कथा आज भी लोगों की जिज्ञासा का विषय बनी हुई है।साधकों की तपोस्थलीस्थानीय मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में अनेक साधु-संतों और सिद्ध पुरुषों ने यहां तपस्या की थी। इसी कारण यह क्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण माना जाता है।उपेक्षा का शिकार विरासतइतिहास और धार्मिक महत्व के बावजूद यह मंदिर आज भी अपेक्षित संरक्षण और प्रचार-प्रसार से वंचित है। मंदिर के कई हिस्से क्षरण का शिकार हो रहे हैं। परिसर में पर्याप्त सूचना पट्ट, प्रकाश व्यवस्था तथा पर्यटक सुविधाओं का अभाव दिखाई देता है।यदि इस धरोहर का वैज्ञानिक संरक्षण किया जाए और इसे पर्यटन मानचित्र पर उचित स्थान मिले तो यह न केवल बिलासपुर जिले बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ की पहचान बन सकता है। पर्यटन की अपार संभावनाएंगनियारी मंदिर का विकास धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र के रूप में किया जा सकता है। रतनपुर, मल्हार, पाली और ताला जैसे ऐतिहासिक स्थलों के साथ इसे जोड़कर एक “कलचुरी विरासत परिपथ” विकसित किया जा सकता है। इससे स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ेंगे तथा क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलेगा। गनियारी का प्राचीन शिव मंदिर केवल पत्थरों से निर्मित एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के गौरवशाली अतीत का जीवंत दस्तावेज है। इसकी दीवारों पर उकेरी गई कलाकृतियां, इसके गर्भगृह में विराजमान शिवलिंग और इसके चारों ओर फैली लोककथाएं उस युग की स्मृतियों को आज भी संजोए हुए हैं। समय की आवश्यकता है कि इस अनमोल धरोहर को संरक्षित किया जाए, इसके इतिहास का गहन अध्ययन हो और आने वाली पीढ़ियों को इसकी महत्ता से परिचित कराया जाए। क्योंकि जो समाज अपनी विरासत को सहेजता है, वही अपने भविष्य को भी मजबूत आधार प्रदान करता है।”गनियारी का यह प्राचीन शिव मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की हजार वर्षीय सांस्कृतिक चेतना का मौन प्रहरी है, जो आज भी इतिहास की अनगिनत कहानियां अपने भीतर समेटे खड़ा है।”
