सुरेश सिंह बैस –
बिलासपुर। न्यायधानी बिलासपुर से से रायगढ़ रेलमार्ग पर लगभग 18 किलोमीटर दूर स्थित कोटमीसोनार गांव प्रदेश के एकमात्र क्रोकोडाइल पार्क के कारण विशेष पहचान रखता है। यहां मगरमच्छों और एक व्यक्ति के बीच करीब दो दशकों से चला आ रहा अनोखा रिश्ता आज भी लोगों के लिए कौतूहल और आश्चर्य का विषय बना हुआ है। क्रोकोडाइल पार्क में मगरों की देखभाल करने वाले सीताराम दास की आवाज सुनते ही विशाल जलाशय के विभिन्न हिस्सों में मौजूद मगरमच्छ उनकी ओर तेजी से चले आते हैं। खास बात यह है कि अन्य लोगों के बुलाने पर मगरों की ऐसी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती। यह दृश्य देखने आने वाले पर्यटकों और दर्शकों के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं होता। इस कहानी का सबसे मार्मिक पहलू यह है कि कुछ वर्ष पूर्व एक मगरमच्छ के हमले में सीताराम दास अपना एक हाथ गंवा चुके हैं। इसके बावजूद उनके मन में इन जीवों के प्रति प्रेम और समर्पण में कोई कमी नहीं आई। वे इसे नियति और संभवतः अपनी ही किसी लापरवाही का परिणाम मानते हुए कहते हैं कि मगरमच्छ की अपनी प्राकृतिक प्रवृत्ति है और इसके लिए उनके मन में कोई शिकायत नहीं है।सीताराम दास बताते हैं कि लगभग 20 वर्ष पूर्व उन्होंने स्थानीय अन्य एक जोगिया तालाब में दो घायल मगरमच्छ शावकों को बचाकर उनकी देखभाल शुरू की थी। धीरे-धीरे उनके बीच एक आत्मीय संबंध बन गया। बाद में क्रोकोडाइल पार्क की स्थापना होने पर उन्हें मगरों की देखभाल का दायित्व सौंपा गया, जिसे वे आज भी पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं।साधु-संत जैसी वेशभूषा और सात्विक जीवन अपनाने वाले सीताराम दास अपनी इस विशेष आत्मीयता को मां गंगा और मां नर्मदा की कृपा बताते हैं। उनका कहना है कि वे इन जीवों की सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित कर चुके हैं।
सीताराम दास और मगरमच्छों के बीच बना यह अनूठा रिश्ता केवल हैरतअंगेज कहानी नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच प्रेम, विश्वास और सह-अस्तित्व का एक प्रेरक संदेश भी देता है। यह कहानी बताती है कि पर्यावरण और वन्यजीवों के साथ सामंजस्य स्थापित कर उनका संरक्षण करना हम सभी का मानवीय कर्तव्य है।
