विजय की ✒ कलम
संपादकीय। देश में इस समय कई मुद्दे हैं, विवाद हैं, परेशानियां हैं और रोज नई-नई खबरें सामने आ रही हैं। इन्हीं सबके बीच मुंबई और महाराष्ट्र से सोशल मीडिया के रास्ते एक छोटी-सी खबर निकली, जो धीरे-धीरे लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई और देखते ही देखते सोशल मीडिया, अखबारों और टीवी चैनलों तक पहुंच गई। यह खबर थी नीम करोली बाबा और उनके जीवन पर आधारित फिल्म “हनुमान अंश” की। काहनी
नीम करोली बाबा एक संत थे, जिनका जन्म उत्तर प्रदेश के एक गांव में हुआ था। उनके जीवन से जुड़ी घटनाओं और आध्यात्मिक यात्रा को फिल्म के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया गया। शुरुआत में फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कोई खास असर नहीं दिखाया, लेकिन दूसरे सप्ताह से धीरे-धीरे दर्शकों की संख्या बढ़ती गई और फिल्म ने जबरदस्त सफलता हासिल की। दावा किया जा रहा है कि फिल्म का कलेक्शन ₹150 करोड़ के आंकड़े को पार कर गया, जबकि इसका बजट करीब ₹2 करोड़ बताया गया।
यही बात अपने आप में सोचने पर मजबूर करती है।
जहां बड़े-बड़े सितारों, करोड़ों रुपये के बजट और बड़े निर्देशकों की फिल्में दर्शकों को आकर्षित करने में असफल हो जाती हैं, वहीं एक संत के जीवन पर आधारित कम बजट की फिल्म लोगों के बीच इतनी चर्चा पैदा कर देती है।
आखिर इसकी वजह क्या है?
कुछ लोगों का मानना है कि फिल्म के साथ हनुमान जी का नाम जुड़ा होना, नीम करोली बाबा की हनुमान भक्ति और उनके द्वारा राम नाम का स्मरण करना इसकी सफलता का कारण है। यह भी एक पहलू हो सकता है। लेकिन विजय की कलम एक और सवाल पूछती है—क्या केवल किसी फिल्म को देख लेना ही धार्मिक होने की निशानी है?
आज सोशल मीडिया का युग है। लोग धार्मिक तस्वीरें लगाते हैं, संतों के वीडियो शेयर करते हैं, प्रवचन पोस्ट करते हैं और धर्म से जुड़े संदेश आगे बढ़ाते हैं। निश्चित रूप से यह अच्छी बात है। लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि हम धर्म को केवल दिखावे तक सीमित तो नहीं कर रहे?
अगर समाज वास्तव में धर्म और सनातन के मूल सिद्धांतों को अपने जीवन में उतार ले, तो फिर समाज में हिंसा, नफरत, अपराध, महिलाओं के प्रति अत्याचार और अन्य सामाजिक बुराइयों के लिए इतनी जगह क्यों दिखाई देती है?
सवाल किसी धर्म पर नहीं, बल्कि हमारे आचरण पर है।
नीम करोली बाबा के जीवन से जुड़ी चर्चाओं में उनकी भक्ति, सेवा और आध्यात्मिकता का विशेष उल्लेख मिलता है। उनके जीवन से प्रेरित होकर बनी इस फिल्म के पीछे भी एक रोचक कहानी बताई जाती है। कहा जाता है कि विदेश से आए एक व्यक्ति ने बाबा के आश्रम से जुड़े अपने अनुभवों को एक किताब के माध्यम से सामने रखा। बाद में विदेश में पढ़ाई कर रही एक भारतीय युवती ने उस किताब को पढ़ा और बाबा के जीवन से प्रभावित हुई। उसे लगा कि बाबा के जीवन से जुड़ी घटनाओं पर एक ऐसी फिल्म बननी चाहिए, जो लोगों के दिल को छू सके।
इसके बाद संतों से चर्चा, आशीर्वाद और मार्गदर्शन के साथ कम बजट में छोटे कलाकारों को लेकर फिल्म तैयार की गई और आज वह फिल्म चर्चा में है।
लेकिन अब एक दूसरा सवाल भी खड़ा होता है।
क्या आगे संतों और भगवान के नाम पर बनने वाली हर फिल्म का उद्देश्य धर्म को आगे बढ़ाना होगा? या फिर धर्म भी फिल्मों के लिए एक नया बाजार बन जाएगा?
क्योंकि जहां व्यवसाय प्रवेश करता है, वहां मुनाफे की सोच भी आती है। धार्मिक विषय पर फिल्म बनाना गलत नहीं है। बल्कि अगर किसी संत का जीवन, उनके विचार और उनकी सेवा समाज तक पहुंचती है तो यह अच्छी पहल है। लेकिन असली सफलता तब होगी, जब फिल्म देखने के बाद दर्शक संत के बताए मार्ग पर चलने की कोशिश करे।
सिर्फ थिएटर में बैठकर फिल्म देखना, बाहर निकलकर सोशल मीडिया पर उसका वीडियो लगाना और अगले दिन सब कुछ भूल जाना—क्या यही धर्म है?
धर्म तस्वीर में नहीं, व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।
भक्ति पोस्ट में नहीं, जीवन में दिखाई देनी चाहिए।
और संत का सम्मान केवल जयकारे में नहीं, उनके बताए मार्ग पर चलने में होना चाहिए।
आज धार्मिक फिल्में बन रही हैं, संतों पर कहानियां सामने आ रही हैं और लोग उन्हें पसंद भी कर रहे हैं। इसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि हर धार्मिक फिल्म को केवल मनोरंजन या व्यवसाय का माध्यम न बनने दें। यदि ऐसी फिल्में लोगों को सेवा, सदाचार, संयम, करुणा, सत्य और राष्ट्रसेवा की ओर प्रेरित करती हैं, तभी उनका उद्देश्य सार्थक होगा।
दिखावे की इस दुनिया से थोड़ा आगे बढ़िए। अडंबर, अंधभक्ति और केवल सोशल मीडिया की लोकप्रियता से बाहर निकलकर संतों के बताए मार्ग को समझिए और अपने जीवन में उतारिए।
तभी किसी संत के जीवन पर बनी फिल्म देखना वास्तव में सार्थक होगा। वरना केवल फिल्म देखकर तालियां बजाना और जीवन में कोई बदलाव न लाना, उस कहावत को चरितार्थ करेगा—“दीया तले अंधेरा।”
हनुमान जी की कृपा सभी सनातन धर्मावलंबियों पर बनी रहे। सभी को सद्बुद्धि मिले और हम सब हनुमान जी की भक्ति, श्रीराम के आदर्शों, मानव सेवा और राष्ट्रसेवा के मार्ग पर आगे बढ़ें।
जय श्रीराम।
जय बजरंगबली।
जय भारत माता।
जय छत्तीसगढ़।
