दोस्त
– सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
कुछ लोग जीवन में आते हैं और समय के साथ चले जाते हैं। कुछ लोग आते हैं, कुछ समय साथ रहते हैं और फिर यादों में कहीं धुंधले पड़ जाते हैं। लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन्हें समय, दूरी और मृत्यु भी समाप्त नहीं कर पाती। वे लोग हमारे जीवन से भले ही चले जाएं, लेकिन उनकी बातें, उनका हंसना, उनका अपनापन और उनका निश्छल व्यवहार मन के किसी कोने में हमेशा जीवित रहता है। बृजेश अग्रहरि ‘पप्पू भाई’ मेरे लिए ऐसा ही एक दोस्त था।आज वह इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी यादें आज भी मेरे साथ चलती हैं। उसकी बातें कभी-कभी अचानक कानों में गूंजने लगती हैं, उसका चेहरा आंखों के सामने आ जाता है और मन अनायास ही पूछ बैठता है आखिर इतनी जल्दी क्यों चले गए पप्पू?
हम दोनों एक ही मोहल्ले में रहते थे। वह उदई चौक में रहता था। अपने परिवार में तीसरे नंबर का भाई था, लेकिन परिवार की अनेक जिम्मेदारियों को उसने हमेशा तत्परता से निभाया। उसके बड़े भाई कमलेश अग्रहरि मेरे सहपाठी थे, लेकिन मेरी वास्तविक और गहरी दोस्ती पप्पू से थी। यह दोस्ती कुछ दिनों या वर्षों की नहीं, बल्कि उसके जीवन के अंतिम क्षण तक कायम रही। मेरे जीवन में अनेक मित्र आए। कुछ बेहद अच्छे मिले और कुछ ऐसे भी मिले जिनकी याद रखना मैं जरूरी नहीं समझता। लेकिन पप्पू इन सबसे बिल्कुल अलग था। उसकी जगह कोई दूसरा मित्र कभी नहीं ले सकता।
पप्पू का सबसे बड़ा गुण था उसका निष्कपट और निश्छल स्वभाव। उसमें छल-कपट नहीं था। वह संग्रह करने वाला व्यक्ति नहीं था। जिंदगी को वह अपनी ही धुन में जीता था, आज यहां, कल वहां। खाओ, पियो, हंसो और मस्त रहो। उसके लिए जिंदगी बहुत बड़ी योजनाओं और स्वार्थों का नाम नहीं थी, बल्कि उसे वह अपने ढंग से जीना चाहता था। सन 1986-87 के आसपास हमारी दोस्ती और गहरी हुई। उन दिनों मोहल्ले में हमारा एक पूरा दोस्ताना संसार था सुभाष, गुड्डू, संतोष, रमेश सिंधी, गुड्डू संतोष गुप्ता, छुटकौना, मनोज ताम्रकार, संजू, बबलू और न जाने कितने साथी। कोई त्योहार हो, पिकनिक हो, कहीं बैठकर हंसी-मजाक करना हो या बस यूं ही दिन गुजारना हो ,हम सब साथ रहते थे। लगभग 1990 के आसपास पप्पू ने अपने घर के बाहर सड़क किनारे किराए की जगह पर साइकिल स्टैंड और मैकेनिक की दुकान के साथ कैरम क्लब भी शुरू किया। वह जगह देखते ही देखते हमारे दोस्तों का अड्डा बन गई। दिनभर वहां कैरम की गोटियां खनकतीं, हंसी-मजाक होता और दोस्तों की भीड़ लगी रहती। साइकिल के काम से भी उसकी अच्छी आमदनी होने लगी थी।
लेकिन जिंदगी हमेशा एक जैसी नहीं रहती। एक दिन उसके पिता ने न जाने किस बात पर नाराज होकर उसे घर से निकाल दिया। वह क्षण पप्पू के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ बन गया।कहा जाता है कि स्वाभिमान आदमी को बहुत कुछ सहना सिखाता है, लेकिन कभी-कभी वही स्वाभिमान उसे अपने ही घर की देहरी से दूर भी कर देता है। पप्पू ने पिता की कड़वी बात को अपने दिल पर इतना ले लिया कि वह बिना कपड़े लिए, बिना कुछ खाए और नंगे पांव घर से निकल गया।
मुझे उस समय इसकी जानकारी तक नहीं थी। जब पता चला तो मन बहुत दुखी हुआ। मैंने उसकी खोज शुरू की। आखिर पता चला कि वह अरपा नदी के उस पार चिंगराजपारा की ओर एसईसीएल कॉलोनी में किसी परिचित के यहां अपना ठिकाना बनाए हुए है। वहीं उसने एक छोटी-सी पान की दुकान शुरू कर दी और अपने जीवन की नई लड़ाई शुरू कर दी। यहीं से मैंने पप्पू को एक नए रूप में देखा। वह परिस्थितियों से टूटने वाला आदमी नहीं था। उसमें गजब की व्यवहार- कुशलता थी। वह नम्र था, सहयोगी था और किसी की मदद के लिए बिना लाभ-हानि सोचे खड़ा हो जाता था। शायद यही कारण था कि जहां भी जाता, लोग उससे जुड़ते चले जाते। उससे मैंने भी बहुत कुछ सीखा ,नम्रता, स्नेह, सहयोग और बिना किसी स्वार्थ के किसी के साथ खड़े हो जाना।
पप्पू में एक और अद्भुत गुण,ऐसा हुनर था ..वह जिस काम को हाथ में लेता, उसमें अपनी जगह बना लेता। ऐसा लगता था जैसे उसके हाथ में हुनर हो तो मिट्टी को भी आकार देकर बेच दे। पान की दुकान के बाद उसने फूलों की सजावट का काम शुरू किया। इसमें उसे अपने मित्र जगताप कश्यप का सहयोग मिला। दोनों ने गोल बाजार स्थित फूल चौक में काम शुरू किया और देखते ही देखते उनका काम चल निकला। पप्पू की जिंदगी धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही थी।लेकिन उसके भीतर अपने घर की वह चोट शायद कभी नहीं भरी। मैं उससे हमेशा मिलता रहा। हमारे बीच कभी दूरी नहीं आई। मेरे घर कोई कार्यक्रम हो, समारोह हो या कोई पारिवारिक अवसर में पप्पू पूरे मन से मेरे साथ खड़ा रहता।
मेरी छोटी बहन की शादी का प्रसंग तो मैं जीवनभर नहीं भूल सकता। उस समय मेरे सामने आर्थिक संकट था। बहन की शादी कैसे होगी, यह चिंता मुझे भीतर से खाए जा रही थी। पप्पू ने मेरी परेशानी देखी तो उसे अपनी परेशानी समझ लिया। उसने अपनी पहचान और जिम्मेदारी पर एक साहूकार से मेरे लिए इतनी रकम की व्यवस्था कर दी, जो उस समय विवाह संपन्न कराने के लिए मेरे लिए बहुत बड़ी मदद थी। उसने मुझ पर कोई एहसान नहीं जताया। उसने बस दोस्ती निभाई। और शादी के दिन तो उसने दोस्ती की परिभाषा ही बदल दी। वह विवाह में बढ़-चढ़कर शामिल हुआ। यहां तक कि बारातियों के झूठे बर्तन धोने में भी उसने कोई संकोच नहीं किया। आज सोचता हूं तो लगता है वह केवल मेरा मित्र नहीं था, वह मेरे परिवार का अपना आदमी था।
बाद में पप्पू बिलासपुर से करीब 30 किलोमीटर दूर कोटा चला गया। वहां उसने फूलों का काम शुरू किया। उसका व्यवसाय वहां भी चल निकला। एक छोटी-सी खेतनुमा जगह की देखभाल करने लगा। समय के साथ वह जगह ही उसका संसार बनती चली गई। फिर कोटा के एक चंडी मंदिर में उसने अपना ठिकाना बना लिया। वह कहता था -“मां चंडी ही मेरी मां हैं। अब मैं इन्हीं की सेवा और इन्हीं के आश्रय में जीवन बिताऊंगा।” मैं उससे अक्सर कहता, अब विवाह कर ले, गृहस्थ जीवन बसा ले। जिंदगी अकेले कैसे कटेगी? वह मुस्कुराकर कहता- “अब मन मां के चरणों में लग गया है। परिवार ने जब मेरा साथ नहीं दिया, पिता ने घर से निकाल दिया, तो अब किस परिवार का मोह करूं?”
उसकी बातें सुनकर मैं भीतर तक दुखी हो जाता था। मैंने महसूस किया था कि पप्पू ने परिवार से शिकायतें शायद बहुत पहले छोड़ दी थीं, लेकिन उसके भीतर का खालीपन कहीं न कहीं बना हुआ था। उसने किसी से बदला नहीं लिया, किसी को कोसा नहीं। बस अपने तरीके से जिंदगी जीता रहा। और फिर एक दिन अचानक सब कुछ खत्म हो गया।सुबह-सुबह कोटा के चंडी मंदिर के पुरोहित के पुत्र मनोज पंडा का फोन आया। आवाज में ऐसी सूचना थी, जिसे सुनने के लिए मन कभी तैयार नहीं होता।
“पप्पू भाई नहीं रहे…”कुछ पल के लिए मुझे लगा जैसे समय ठहर गया हो। मैं सन्न रह गया। पप्पू पिछले दो-तीन दिनों से बुखार से पीड़ित था।कोई ऐसी गंभीर बीमारी भी नहीं थी, जिसके कारण उसके जाने की कल्पना की जा सके। लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था।बताया गया कि वह चलते-चलते अचानक हड़बड़ा गया, गिर पड़ा और तखत से टकराकर नीचे गिरते ही उसके प्राण निकल गए। लोग तत्काल उसे डॉक्टर के पास ले गए, लेकिन डॉक्टर ने कह दिया कि अब वह इस दुनिया में नहीं रहा। मैं आज भी उस दिन को नहीं भूल पाया हूं।
5 जुलाई…। मेरे जीवन की स्मृतियों में दर्ज एक ऐसी तारीख, जिसे मैं चाहकर भी मिटा नहीं सकता।पप्पू चला गया, लेकिन अपने पीछे वह इतनी सारी यादें छोड़ गया है कि कभी-कभी लगता है वह कहीं गया ही नहीं।उसकी हंसी याद आती है। उसकी बातें याद आती हैं। उसका भोला चेहरा याद आता है। बिना स्वार्थ मदद करने का उसका अंदाज याद आता है। मेरी बहन की शादी में उसका दौड़-दौड़कर काम करना याद आता है। और सबसे ज्यादा याद आता है उसका वह निश्छल दोस्ती वाला मन।आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि जिंदगी में धन-दौलत, मकान, जमीन और संपत्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ और है,ऐसे रिश्ते, जिनमें स्वार्थ नहीं होता। पप्पू के पास शायद बहुत कुछ नहीं था, लेकिन उसके पास एक ऐसा दिल था, जिसमें दोस्तों के लिए बहुत जगह थी।
उसने जिंदगी अपने ढंग से जी। संघर्ष किया। ठोकरें खाईं। अपने पैरों पर खड़ा हुआ। दूसरों की मदद की और बिना किसी बड़े दावे के लोगों के जीवन में अपनी जगह बनाता चला गया। आज वह नहीं है। लेकिन मेरे लिए वह आज भी वहीं है – उदई चौक की उन्हीं गलियों में, दोस्तों के उसी अड्डे पर, कैरम की गोटियों के बीच हंसता हुआ, अपनी पान की दुकान पर खड़ा हुआ और किसी दोस्त की परेशानी सुनकर तुरंत कहता हुआ-“चिंता मत कर, मैं हूं न…” शायद यही सच्ची दोस्ती है।इंसान चला जाता है, लेकिन उसका दिया हुआ स्नेह नहीं जाता। शरीर मिट जाता है, लेकिन उसकी यादें नहीं मिटतीं। समय बीत जाता है, लेकिन कुछ रिश्ते समय से भी बड़े हो जाते हैं।
पप्पू भाई, तुम जहां भी हो, खुश रहो। ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शांति दे। यदि जन्म-मृत्यु का कोई दूसरा संसार है, तो मेरी यही प्रार्थना है कि अगली बार तुम्हें ऐसा जीवन मिले, जिसमें कोई अकेलापन न हो, कोई शिकायत न हो और तुम्हें भरपूर प्रेम मिले। और अगर दोस्ती सचमुच जन्म-जन्मांतर का रिश्ता है, तो मुझे विश्वास है किसी न किसी जन्म में हम फिर मिलेंगे। तब शायद मैं तुमसे बस इतना ही कहूंगा -“पप्पू भाई, बहुत देर कर दी यार… मैं कब से तुम्हें ढूंढ रहा था।”
तुम चले गए, मगर यादों में रह गए,
हंसी के वो पल आंखों में बह गए।
दोस्ती का वो रिश्ता था कितना अनमोल,
तुम बिछड़े तो जैसे खामोश हो गए बोल।
न छल था तुम्हारे मन में, न कोई अभिमान,
दोस्ती निभाना ही था तुम्हारा सबसे बड़ा सम्मान।
जहां भी रहो पप्पू, खुश रहना मेरे यार,
तुम्हारी याद रहेगी दिल में हर जन्म, हर बार।।
– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
