✍️ श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर
एक यात्रा से शुरू हुआ प्रश्न
लगभग तीस वर्ष पहले मैं पहली बार तिरुपति गया था। उस समय यह यात्रा एक सामान्य धार्मिक यात्रा थी। तीन दशक बाद जब हैदराबाद के कार्यक्रम के सिलसिले में दोबारा दक्षिण भारत की यात्रा बनी, तो परिस्थितियों ने मुझे फिर तिरुपति पहुंचा दिया।
इस बार तिरुपति पहुंचने का अनुभव अलग था।
भारी भीड़ के कारण मैं स्वयं दर्शन की कतार में नहीं गया। साथियों से दर्शन के लिए जाने को कहा और मैं प्रतीक्षा करने लगा।
यही प्रतीक्षा मेरे लिए एक शोध-यात्रा बन गई।
मेरे सामने प्रश्न आया—
आखिर दक्षिण भारत के इतने बड़े भूभाग में तिरुमला ही इतना विशाल धार्मिक केंद्र क्यों बना?
क्या यह महत्व केवल वर्तमान मंदिर के कारण पैदा हुआ?
या इस पहाड़ी और इसके आसपास का भूगोल मंदिर से बहुत पहले से महत्वपूर्ण था?
और यदि यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण था, तो क्या इसकी धार्मिक पहचान भी समय के साथ बदलती रही?
इसी प्रश्न ने मुझे तिरुपति के इतिहास, पुरातत्व, शिलालेख, प्राचीन साहित्य और बौद्ध परंपरा से जुड़े दावों की खोज करने के लिए प्रेरित किया।
सबसे पहला प्रमाण : तिरुपति का इतिहास मंदिर से बहुत पुराना है
इस खोज में सबसे महत्वपूर्ण बात सामने आई कि तिरुपति क्षेत्र में मानव गतिविधि का इतिहास केवल मध्यकालीन मंदिर से शुरू नहीं होता।
आंध्र प्रदेश सरकार के तिरुपति जिला पुरातत्व विभाग के अनुसार वेण्कटापुरम गांव में 500–300 ईसा पूर्व का मेगालिथिक दफन स्थल मौजूद है। सरकार इसे प्रागैतिहासिक मानव सभ्यता की उपस्थिति का महत्वपूर्ण संकेत मानती है।
और इससे भी महत्वपूर्ण बात—पुराने चित्तूर जिले में लगभग 300 मेगालिथिक दफन स्थलों की पहचान का उल्लेख सरकारी स्रोत में है।
इस प्रमाण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसका अर्थ यह नहीं है कि वे मेगालिथिक लोग बौद्ध थे।
500–300 ईसा पूर्व का मेगालिथिक स्थल बौद्ध विहार का प्रमाण नहीं है।
लेकिन यह अवश्य प्रमाणित करता है कि तिरुपति के आसपास का भूभाग अत्यंत प्राचीन मानवीय गतिविधियों वाला क्षेत्र था।
यानी प्रश्न अब और बड़ा हो गया—
इस प्राचीन भूभाग की सांस्कृतिक यात्रा मेगालिथिक काल से लेकर तिरुमला के महान तीर्थ तक कैसे पहुंची?
दूसरा प्रमाण : तिरुपति क्षेत्र में इससे भी पुरानी मानव उपस्थिति
पुरातत्व संबंधी पुराने भारतीय अभिलेखों में स्वर्णमुखी नदी क्षेत्र में पुरापाषाण संस्कृति के प्रमाण दर्ज हैं।
भारतीय पुरातत्व संबंधी 1960–61 के अभिलेख में तिरुपति और सीतारामपेटा सहित स्वर्णमुखी बेसिन में पुरापाषाण उपकरण मिलने का उल्लेख है।
इससे एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है—
तिरुपति का भूभाग केवल ऐतिहासिक मंदिरों का क्षेत्र नहीं है; यहां मानव गतिविधि का इतिहास बहुत पीछे तक जाता है।
यहां हमें कम-से-कम तीन अलग-अलग ऐतिहासिक परतें दिखाई देती हैं—
पुरापाषाण मानव → मेगालिथिक संस्कृति → ऐतिहासिक/धार्मिक केंद्र।
अब शोध का वास्तविक विषय यह होना चाहिए कि इन परतों के बीच सांस्कृतिक भूगोल कैसे विकसित हुआ।
तीसरा प्रमाण : तिरुवेंगडम कोई अचानक पैदा हुआ तीर्थ नहीं था
प्राचीन तमिल परंपरा में तिरुमला क्षेत्र को वेंगडम/तिरुवेंगडम के नाम से जाना जाता था।
भारत सरकार के शैक्षणिक ई-पाठ्यक्रम में प्रकाशित दक्षिण भारतीय इतिहास सामग्री के अनुसार तमिलकम की उत्तरी भौगोलिक सीमा वेंगडम अर्थात वर्तमान तिरुपति पहाड़ियों तक मानी जाती थी।
यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण है।
क्यों?
क्योंकि इसका अर्थ है कि यह क्षेत्र केवल धार्मिक स्थल नहीं था।
यह भौगोलिक सीमा और संपर्क क्षेत्र भी था।
दक्षिण की तमिल भूमि और उससे उत्तर के क्षेत्रों के बीच आवागमन के लिए यह क्षेत्र महत्वपूर्ण रहा होगा।
ऐसे स्थानों पर स्वाभाविक रूप से—
– यात्रियों का आवागमन,
– व्यापार,
– सांस्कृतिक संपर्क,
– भाषाई आदान-प्रदान,
– धार्मिक यात्राएं
विकसित हो सकती हैं।
इसलिए तिरुपति की धार्मिक प्रतिष्ठा को उसके भूगोल से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
चौथा प्रमाण : यहां पहाड़, मार्ग और जल—तीनों साथ हैं
तिरुमला पूर्वी घाट की सेशाचलम पर्वतमाला में स्थित है। सरकारी विवरण के अनुसार यहां सात प्रमुख पर्वत चोटियां हैं और तिरुमला लगभग 980 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इस क्षेत्र में अनेक प्राकृतिक जलस्रोत और तीर्थ भी हैं।
इसका धार्मिक महत्व समझने के लिए केवल मंदिर को देखना पर्याप्त नहीं है।
हमें पूरे पर्वतीय परिदृश्य को देखना होगा।
प्राचीन यात्राओं में पहाड़, गुफाएं, जलस्रोत और सुरक्षित मार्ग विशेष महत्व रखते थे।
इसलिए यह जांचना जरूरी है कि क्या तिरुमला के प्राचीन धार्मिक महत्व का संबंध किसी पुराने पर्वतीय तीर्थ या प्राकृतिक पवित्र स्थल से था।
पांचवां प्रमाण : तिरुपति के आसपास केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं थी
आज तिरुपति की पहचान मुख्य रूप से वेंकटेश्वर मंदिर से होती है।
लेकिन आसपास के क्षेत्र में शैव, वैष्णव और अन्य प्राचीन धार्मिक केंद्र भी हैं।
आंध्र प्रदेश सरकार चित्तूर क्षेत्र में पल्लव, चोल और विजयनगर काल के अनेक मंदिरों का उल्लेख करती है। वह इस क्षेत्र को प्रागैतिहासिक स्थलों, मेगालिथ, प्राचीन नगरों, किलों और मंदिरों से समृद्ध क्षेत्र बताती है।
इससे एक नई दिशा मिलती है—
तिरुमला को अकेले नहीं, पूरे क्षेत्रीय धार्मिक नेटवर्क के भीतर अध्ययन करना चाहिए।
छठा प्रश्न : यदि इतने स्थल थे तो तिरुमला ही इतना बड़ा क्यों बना?
यही मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
कई क्षेत्रों में प्राचीन मंदिर थे।
कई स्थानों पर पहाड़ थे।
कई स्थानों पर नदियां और प्राकृतिक तीर्थ थे।
फिर तिरुमला ही धीरे-धीरे ऐसा केंद्र कैसे बना जहां देश के दूर-दूर से लोग आने लगे?
इसका उत्तर शायद एक ही कारण में नहीं है।
संभवतः कई प्रक्रियाएं एक साथ काम करती रहीं—
प्राकृतिक पवित्रता + भौगोलिक स्थिति + प्राचीन मार्ग + स्थानीय आस्था + साहित्यिक प्रतिष्ठा + राजकीय संरक्षण + मंदिर संस्थान + दान व्यवस्था + तीर्थ अर्थव्यवस्था।
यही वह मॉडल है जिससे तिरुमला की असाधारण लोकप्रियता को समझने का प्रयास किया जाना चाहिए।
सातवां प्रमाण : शिलालेख मंदिर की लगातार बढ़ती संस्थागत शक्ति दिखाते हैं
टीटीडी के ऐतिहासिक ग्रंथों में तिरुमला मंदिर से जुड़े पल्लव और चोल कालीन शिलालेखों का विस्तृत विवरण मिलता है।
उदाहरण के लिए, पल्लव काल से जुड़े अभिलेखों में दीप के लिए सोने के दान का उल्लेख मिलता है। चोल काल में भी मंदिर को दीप और अन्य दान दिए जाने के प्रमाण मिलते हैं।
टीटीडी के प्रकाशित इतिहास में तिरुमला मंदिर की दीवारों और गोपुरम पर अनेक शिलालेखों का विवरण मिलता है। कुछ शिलालेख 12वीं–13वीं शताब्दी के निर्माण और दान से संबंधित हैं।
इससे यह समझ आता है कि मंदिर की शक्ति अचानक नहीं बनी।
वह सदियों में संस्थागत रूप से बढ़ी।
आठवां प्रमाण : तिरुमला के प्राचीन धार्मिक केंद्र बनने की प्रक्रिया
उपलब्ध शिलालेखीय और साहित्यिक सामग्री से एक संभावित ऐतिहासिक क्रम बनाया जा सकता है—
पहली परत
अत्यंत प्राचीन मानव गतिविधि।
दूसरी परत
मेगालिथिक संस्कृति और दफन परंपराएं।
तीसरी परत
तिरुवेंगडम का क्षेत्रीय/भौगोलिक महत्व।
चौथी परत
स्थानीय और क्षेत्रीय धार्मिक परंपराएं।
पांचवीं परत
प्रारंभिक वैष्णव प्रतिष्ठा और साहित्यिक संदर्भ।
छठी परत
पल्लव-चोल कालीन दान और मंदिर संस्थान।
सातवीं परत
मध्यकालीन राजकीय संरक्षण।
आठवीं परत
विजयनगर काल में विशाल विस्तार।
नौवीं परत
आधुनिक परिवहन, तीर्थ व्यवस्था और अखिल भारतीय धार्मिक पहचान।
यह क्रम एक शोध-परिकल्पना है, अंतिम इतिहास नहीं।
लेकिन इससे यह स्पष्ट होता है कि तिरुमला को केवल एक मंदिर के निर्माण की कहानी से नहीं समझा जा सकता।
नौवां प्रश्न : फिर बौद्ध संबंध की चर्चा क्यों होती है?
यहीं से मेरा मूल प्रश्न और जटिल हो जाता है।
आंध्र प्रदेश में बौद्ध धर्म की उपस्थिति कोई काल्पनिक बात नहीं है।
राज्य के आधिकारिक बौद्ध पर्यटन दस्तावेज में अमरावती, नागार्जुनकोंडा, जग्गय्यापेटा, घंटशाला, भट्टिप्रोलु, गुन्टुपल्ली, चंद्रावरम आदि अनेक बौद्ध स्थलों को सूचीबद्ध किया गया है।
इसलिए यह ऐतिहासिक तथ्य है कि तिरुपति के व्यापक दक्षिण-पूर्वी भूभाग में बौद्ध धर्म का प्रभाव रहा।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है—
आंध्र प्रदेश में बौद्ध धर्म की उपस्थिति सिद्ध है; तिरुमला को बौद्ध विहार सिद्ध करना अलग प्रश्न है।
यही अंतर शोध में बनाए रखना आवश्यक है।
दसवां प्रश्न : तिरुपति और बौद्ध केंद्रों के बीच दूरी से अधिक महत्वपूर्ण है संपर्क
अब शोध को केवल “तिरुपति में बुद्ध की मूर्ति मिली या नहीं” तक सीमित नहीं रखना चाहिए।
यह देखना चाहिए कि—
क्या प्राचीन बौद्ध केंद्रों और तिरुमला के बीच कोई ऐतिहासिक मार्ग था?
अमरावती।
भट्टिप्रोलु।
नागार्जुनकोंडा।
चंद्रावरम।
जग्गय्यापेटा।
इन बौद्ध केंद्रों से दक्षिण और पश्चिम की ओर जाने वाले प्राचीन मार्गों का अध्ययन किया जाना चाहिए।
फिर उन्हें तिरुमला, स्वर्णमुखी घाटी और तमिल क्षेत्र से जोड़कर देखा जाना चाहिए।
यदि किसी काल में इन मार्गों पर बौद्ध यातायात, व्यापार या धार्मिक गतिविधि के प्रमाण मिलते हैं, तो तिरुमला के संभावित बौद्ध संपर्क की परिकल्पना मजबूत हो सकती है।
अभी ऐसा निर्णायक प्रमाण मेरे सामने नहीं आया है।
इसलिए इस प्रश्न को खुला रखना ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।
ग्यारहवां प्रश्न : क्या तिरुमला में बौद्ध विहार था?
इस प्रश्न पर उपलब्ध सामग्री को ईमानदारी से दो भागों में रखना होगा।
कुछ लेखकों, विशेष रूप से के. जमानदास, ने तिरुपति को प्राचीन बौद्ध स्थल और वेंकटेश्वर की प्रतिमा को अवलोकितेश्वर से जोड़ने का तर्क दिया है।
लेकिन दूसरी ओर तिरुमला के उपलब्ध शिलालेखीय इतिहास में पल्लव काल से आगे स्पष्ट वैष्णव मंदिर-संस्था के प्रमाण मिलते हैं।
मुझे वर्तमान खोज में तिरुमला पहाड़ी पर ऐसा निर्णायक पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिला जो यह स्थापित कर दे कि वर्तमान मंदिर के स्थान पर निश्चित रूप से बौद्ध विहार था।
यह बात साफ-साफ लिखना जरूरी है।
क्योंकि शोध का उद्देश्य अपनी पूर्वधारणा सिद्ध करना नहीं, बल्कि प्रमाण खोजना है।
बारहवां प्रश्न : क्या पुरातत्व में अभी भी कुछ खोजा जाना बाकी है?
मेरा उत्तर है—बहुत कुछ।
क्योंकि सरकारी पुरातत्व विभाग स्वयं वेण्कटापुरम मेगालिथिक स्थल को ऐसा क्षेत्र बताता है जिसमें आगे पुरातात्विक अनुसंधान की बड़ी संभावना है।
इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय मिशन ऑन मॉन्यूमेंट्स एंड एंटीक्विटीज के अभिलेख में तिरुपति क्षेत्र को प्रागैतिहासिक सांस्कृतिक संबद्धता वाले स्थल के रूप में दर्ज किया गया है।
इसलिए वास्तविक शोध का अगला चरण होना चाहिए—
“तिरुपति मंदिर के बाहर तिरुपति क्षेत्र का पुरातत्व।”
तेरहवां प्रश्न : क्या मुंडन परंपरा कोई सुराग दे सकती है?
तिरुपति की सबसे प्रसिद्ध परंपराओं में से एक है बाल अर्पण।
बौद्ध भिक्षुओं के लिए सिर मुंडाना प्रव्रज्या का हिस्सा रहा है।
तिरुपति में भक्त धार्मिक संकल्प और मन्नत के रूप में बाल अर्पित करते हैं।
यह समानता ध्यान आकर्षित करती है।
लेकिन इतिहास में केवल समानता से वंशानुक्रम सिद्ध नहीं होता।
इसलिए खोज करनी होगी—
तिरुपति में बाल अर्पण का सबसे पुराना प्रमाण क्या है?
यदि इसका प्रारंभिक उल्लेख मंदिर के पुराने शिलालेखों में मिलता है तो वह महत्वपूर्ण होगा।
यदि उससे भी पुराना कोई स्थानीय स्रोत मिलता है, तो वह और महत्वपूर्ण होगा।
और यदि किसी प्राचीन बौद्ध स्रोत से प्रत्यक्ष संबंध मिलता है, तो यह एक अलग स्तर का प्रमाण होगा।
अभी ऐसा निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
चौदहवां प्रश्न : क्या किसी पुराने धार्मिक स्थल ने नया रूप लिया?
भारतीय इतिहास में धार्मिक स्थलों की पहचान समय के साथ बदलने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
लेकिन तिरुमला के लिए ऐसा निष्कर्ष निकालने हेतु हमें निम्न प्रकार के प्रमाण चाहिए—
– पुराने निर्माण की नींव;
– अलग धार्मिक प्रतीक;
– बुद्ध या बोधिसत्त्व की प्रतिमा;
– ब्राह्मी अथवा अन्य प्राचीन अभिलेख;
– स्तूप या चैत्य के अवशेष;
– विहार की वास्तुकला;
– पुराने यात्रावृत्तांत;
– या ऐसा शिलालेख जो किसी पुराने धार्मिक संस्थान का उल्लेख करे।
अभी मेरी खोज में ऐसा निर्णायक प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया है।
इसलिए “तिरुपति निश्चित रूप से बौद्ध विहार था” कहना जल्दबाजी होगी।
लेकिन “इस प्रश्न पर कोई शोध की आवश्यकता ही नहीं” कहना भी उतना ही अनुचित होगा।
पंद्रहवां प्रश्न : सबसे बड़ी खोज शायद मंदिर के बाहर छिपी हो
मेरे विचार से आगे का शोध केवल गर्भगृह या वर्तमान मंदिर की मूर्ति पर केंद्रित नहीं होना चाहिए।
हमें पूरे भूभाग को देखना होगा—
तिरुपति शहर → स्वर्णमुखी घाटी → वेण्कटापुरम → करकंबाडी → तिरुमला पहाड़ियां → प्राचीन मार्ग → आसपास के पुरास्थल → चित्तूर क्षेत्र → तमिल सीमा।
यदि इन सभी स्थानों को एक साथ अध्ययन किया जाए तो शायद तिरुमला की धार्मिक प्रतिष्ठा का वास्तविक इतिहास अधिक स्पष्ट हो।
अब तक मिले प्रमाणों की स्थिति
प्रश्न| अभी मिला प्रमाण| निष्कर्ष
तिरुपति क्षेत्र प्राचीन है?| पुरापाषाण उपकरण और मेगालिथिक स्थल| हाँ
500–300 ईसा पूर्व की मानव गतिविधि?| वेण्कटापुरम मेगालिथिक स्थल| हाँ
तिरुवेंगडम का प्राचीन महत्व?| तमिल ऐतिहासिक साहित्य| हाँ
पल्लव/चोल कालीन धार्मिक संस्थान?| शिलालेख| हाँ
मध्यकालीन वैष्णव विकास?| साहित्य और शिलालेख| मजबूत प्रमाण
आंध्र में बौद्ध धर्म?| अनेक पुरातात्विक स्थल| सिद्ध
तिरुमला में बौद्ध विहार?| प्रत्यक्ष निर्णायक प्रमाण नहीं मिला| अभी अनिर्णीत
वेंकटेश्वर = अवलोकितेश्वर?| कुछ लेखकों की परिकल्पना| सिद्ध नहीं
मुंडन परंपरा = बौद्ध परंपरा?| समानता मौजूद, लेकिन प्रत्यक्ष ऐतिहासिक कड़ी नहीं| सिद्ध नहीं
मेरी शोध-यात्रा का निष्कर्ष
अब मुझे लगता है कि तिरुपति के बारे में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि
“क्या यह हिंदू मंदिर था या बौद्ध विहार?”
बल्कि पहला प्रश्न होना चाहिए—
“यह भूभाग इतना महत्वपूर्ण क्यों बना और इसकी धार्मिक पहचान हजारों वर्षों में कैसे विकसित हुई?”
यदि इस प्रश्न का उत्तर खोज लिया गया, तो बौद्ध संबंध का प्रश्न भी अधिक स्पष्ट हो सकता है।
हो सकता है शोध यह सिद्ध करे कि तिरुमला की धार्मिक परंपरा निरंतर वैष्णव रही।
यह भी संभव है कि किसी पुराने स्थानीय या अन्य धार्मिक परंपरा के साथ इसका संपर्क रहा हो।
और यह भी संभव है कि भविष्य के पुरातात्विक प्रमाण किसी ऐसी परत को सामने लाएं जिसके बारे में आज हमारे पास पर्याप्त जानकारी नहीं है।
लेकिन फिलहाल प्रमाण हमें इतना जरूर बताते हैं कि—
तिरुपति का इतिहास वर्तमान मंदिर से बहुत पुराना है।
और आसपास का भूभाग प्रागैतिहासिक मानव गतिविधि, मेगालिथिक संस्कृति, प्राचीन मार्गों, साहित्यिक परंपरा, राजकीय संरक्षण और अनेक धार्मिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है।
इसलिए यह पूछना बिल्कुल उचित है—
«इतने बड़े और प्राचीन सांस्कृतिक भूभाग में आखिर तिरुमला ही ऐसा असाधारण धार्मिक केंद्र क्यों बना?»
इसका उत्तर शायद अभी पूरी तरह हमारे सामने नहीं है।
और शायद इसी प्रश्न से तिरुपति के इतिहास की एक नई शोध-यात्रा शुरू हो सकती है।
अंतिम टिप्पणी
मेरी तिरुपति यात्रा में उस रात लगभग डेढ़ बजे तेज बारिश, बिजली का जाना, अंधेरा और लगभग 45 मिनट तक असुविधाजनक स्थिति में फंसे रहना भी यात्रा का हिस्सा बन गया।
लेकिन उस रात एक बात स्पष्ट हो गई—
कभी-कभी यात्रा हमें वह प्रश्न दे देती है, जिसका उत्तर खोजने में वर्षों लग सकते हैं।तिरुपति में मुझे ऐसा ही एक प्रश्न मिला है।
अब यात्रा समाप्त नहीं हुई है—अब प्रमाणों की खोज शुरू हुई है।
श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
अध्यक्ष
गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर
