श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
अध्यक्ष
गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर
सारांश
मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले का कूनो राष्ट्रीय उद्यान आज भारत के चीता पुनर्स्थापन कार्यक्रम का प्रमुख केंद्र है। 17 सितंबर 2022 को नामीबिया से आठ चीतों के आगमन के साथ यह कार्यक्रम शुरू हुआ। सितंबर 2026 तक सरकारी जानकारी के अनुसार भारत में चीतों की संख्या 52 हो गई, जिनमें 49 कूनो और 3 गांधी सागर में बताए गए हैं तथा भारत में 32 शावकों के जन्म की सूचना है। लेकिन कूनो की कहानी केवल चीतों की वापसी की कहानी नहीं है। इसके पीछे दशकों पुराना मानवीय विस्थापन, भूमि-अधिकार, जंगल आधारित आजीविका, पुनर्वास और बुनियादी सुविधाओं का प्रश्न भी जुड़ा है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार कूनो क्षेत्र से 24 गांवों का पुनर्वास किया गया और लगभग 1,545 परिवार प्रभावित हुए। इसलिए केंद्रीय प्रश्न यह है कि वन्यजीव संरक्षण के लिए तैयार किए गए इस क्षेत्र को बनाने की सामाजिक कीमत किसने चुकाई और विस्थापित परिवारों को वास्तविक पुनर्वास कितना मिला?
1. कूनो की दूसरी कहानी
कूनो को आज चीता संरक्षण की सफलता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के अनुसार चीता पुनर्स्थापन का उद्देश्य केवल विलुप्त प्रजाति को वापस लाना नहीं, बल्कि घासस्थलीय एवं अर्ध-शुष्क पारिस्थितिक तंत्र तथा स्थानीय आजीविका को मजबूत करना भी है। लेकिन जिन समुदायों का जीवन जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर था, उनके लिए कूनो का इतिहास अलग है। प्रश्न यह है कि जंगल से हटाए जाने के बाद उन्हें भूमि, पानी, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और टिकाऊ रोजगार कितना मिला?
2. 24 गांव और 1,545 परिवार
कूनो में गांवों का विस्थापन चीता परियोजना के बाद शुरू नहीं हुआ। 1990 के दशक में कूनो को एशियाई सिंह के संभावित पुनर्वास क्षेत्र के रूप में विकसित करने के दौरान 24 गांवों को बाहर बसाया गया। भारत सरकार के दस्तावेज के अनुसार इससे लगभग 6,258 हेक्टेयर क्षेत्र निर्बाध वन्यजीव क्षेत्र के रूप में उपलब्ध हुआ और 1,545 परिवारों का पुनर्वास हुआ। इसलिए आज का मानव-बस्ती-विहीन कूनो केवल प्राकृतिक स्थिति का परिणाम नहीं, बल्कि लंबे समय तक चले मानव विस्थापन का परिणाम भी है।
3. प्रभावित समुदाय कौन थे?
कूनो क्षेत्र में सहरिया आदिवासी समुदाय की महत्वपूर्ण उपस्थिति रही है। सहरिया मध्य प्रदेश में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में सूचीबद्ध है। इनके लिए जंगल केवल जमीन नहीं बल्कि भोजन, लघु वनोपज, पशुपालन, रोजगार, सामाजिक संबंध और सांस्कृतिक जीवन का आधार रहा है। स्वतंत्र रिपोर्टों में विस्थापन के बाद इन पारंपरिक संसाधनों तक पहुंच कम होने की समस्याएं दर्ज की गई हैं।
4. पुनर्वास पैकेज और वास्तविक पुनर्वास
NTCA के पुनर्वास मॉडल में प्रति परिवार ₹10 लाख के पैकेज का प्रावधान था, जिसमें कृषि भूमि, आवास, अधिकारों के निपटारे तथा सड़क, सिंचाई, पेयजल, स्वच्छता और बिजली जैसी सुविधाओं के लिए राशि निर्धारित थी। बाद में पुनर्वास सहायता बढ़ाई गई। लेकिन किसी पैकेज की राशि और वास्तविक पुनर्वास एक ही बात नहीं हैं। यदि परिवार को पैसा मिल जाए, लेकिन पर्याप्त भूमि, पानी, सिंचाई, स्कूल, स्वास्थ्य और रोजगार न मिले तो जीवन-व्यवस्था का पुनर्निर्माण अधूरा रह जाता है।
5. भूमि अधिकार और कृषि की समस्या
विस्थापित परिवारों के संबंध में स्वतंत्र रिपोर्टिंग में भूमि के कानूनी दस्तावेज, भूमि की गुणवत्ता और कृषि उत्पादकता से जुड़ी समस्याओं का उल्लेख हुआ है। कुछ परिवारों ने नई जगह पर कम उत्पादक भूमि और मजदूरी पर निर्भरता की बात कही। इसलिए केवल यह दर्ज करना पर्याप्त नहीं कि “दो हेक्टेयर भूमि दी गई”; यह भी देखना आवश्यक है कि भूमि कितनी उपजाऊ है, सिंचाई उपलब्ध है या नहीं और परिवार के पास उसका वैधानिक अधिकार है या नहीं।
6. जंगल आधारित आजीविका का नुकसान
सहरिया जैसे समुदायों की अर्थव्यवस्था कृषि के साथ लघु वनोपज और जंगल के अन्य संसाधनों पर निर्भर रही है। विस्थापन के बाद जंगल तक पहुंच सीमित होने से उनकी बहु-स्रोत आजीविका व्यवस्था प्रभावित हुई। कूनो के संदर्भ में प्रकाशित रिपोर्टों में चिरौंजी/चिरगोंद तथा अन्य वन संसाधनों से होने वाली पारंपरिक आय के समाप्त होने की समस्याओं का उल्लेख मिलता है।
7. पानी, आवास और बुनियादी सुविधाएं
पुनर्वास का उद्देश्य लोगों को केवल दूसरी जगह पहुंचाना नहीं बल्कि बेहतर और सुरक्षित जीवन देना होना चाहिए। 2026 की स्वतंत्र रिपोर्टिंग में कुछ पुनर्वास क्षेत्रों में पेयजल की कमी, अधूरे आवास तथा सड़क, बिजली, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाओं से संबंधित शिकायतों का उल्लेख किया गया है। यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्तमान PVTG विकास नीति में आवास, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और टिकाऊ आजीविका को प्राथमिक लक्ष्य माना गया है।
8. बगचा गांव और चीता परियोजना
चीता परियोजना के समय बगचा कूनो के भीतर बची प्रमुख बस्ती थी। 2022 में सरकारी अधिकारियों के अनुसार बगचा में 148 घर थे और उसे भी स्थानांतरित किया जाना था। इससे स्पष्ट होता है कि चीता परियोजना शुरू होने के समय भी कूनो में मानव विस्थापन की प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।
9. पुनर्वास के प्रति लोगों की इच्छा
चीता परिचय की Action Plan में स्थानीय लोगों की पुनर्वास संबंधी इच्छा का सर्वेक्षण किया गया था। इसमें 47.8 प्रतिशत उत्तरदाता पर्याप्त भूमि या धन मिलने पर पुनर्वास के लिए तैयार थे, जबकि 37.4 प्रतिशत ने नकारात्मक उत्तर दिया और लगभग 5 प्रतिशत अनिश्चित थे। बगचा में 82.35 प्रतिशत, जांगरह में 74.07 प्रतिशत और नयागांव में 40 प्रतिशत उत्तरदाता पुनर्वास के लिए तैयार बताए गए। यह आंकड़ा बताता है कि स्थानीय समाज पुनर्वास के प्रश्न पर एकमत नहीं था।
10. “स्वैच्छिक पुनर्वास” और वास्तविक सहमति
सरकारी दस्तावेज पुनर्वास को स्वैच्छिक बताते हैं, लेकिन शोध की दृष्टि से यह देखना जरूरी है कि लोगों को पूरी जानकारी, वास्तविक विकल्प और भविष्य की आजीविका संबंधी सुरक्षा कितनी मिली। ग्राम सभा की भूमिका, वन अधिकार कानून, भूमि अधिकार और सूचित सहमति की प्रक्रिया का स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट आवश्यक है।
11. दोहरे विस्थापन की नई चिंता
2026 की स्वतंत्र रिपोर्ट के अनुसार कूनो से पहले विस्थापित किए गए कुछ परिवारों के पुनर्वास क्षेत्रों पर कुनवारी नदी से जुड़ी चेंटीखेड़ा सिंचाई परियोजना के कारण संभावित जलमग्नता का खतरा बताया गया है। प्रभावित परिवारों ने दूसरी बार विस्थापन की आशंका व्यक्त की है। इन दावों को संबंधित परियोजना के अंतिम स्वीकृत डूब क्षेत्र और सरकारी अभिलेखों से स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जाना चाहिए। यदि यह स्थिति आधिकारिक अभिलेखों से पुष्ट होती है, तो यह संरक्षण और विकास परियोजनाओं में “दोहरे विस्थापन” का गंभीर उदाहरण होगा।
12. संरक्षण बनाम समुदाय नहीं, संरक्षण के साथ समुदाय
कूनो के इतिहास को केवल “चीता बचाने के लिए आदिवासियों को हटाया गया” कहना पूरी तरह सटीक नहीं होगा, क्योंकि अधिकांश पुनर्वास चीता परियोजना से पहले एशियाई सिंह पुनर्स्थापन की योजना के संदर्भ में हुआ था। बाद में यही मानव-बस्ती-विहीन क्षेत्र चीता पुनर्स्थापन के लिए उपयोग किया गया। इसलिए कूनो का वर्तमान संरक्षण मॉडल दशकों पहले शुरू हुए संरक्षण-आधारित विस्थापन की विरासत पर खड़ा है।
13. चीता परियोजना से रोजगार की संभावना
चीता परियोजना का सकारात्मक पक्ष भी है। सरकार और NTCA के अनुसार स्थानीय समुदायों को पर्यटन, गाइड, Cheetah Mitra, परिवहन और अन्य सेवाओं के माध्यम से रोजगार के अवसर मिल सकते हैं। लेकिन यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि जिन समुदायों ने संरक्षण के लिए भूमि और संसाधनों का नुकसान उठाया, उन्हें संरक्षण एवं पर्यटन से होने वाले आर्थिक लाभ में वास्तविक हिस्सेदारी मिले।
14. कूनो पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था
कूनो में पर्यटन बढ़ने की संभावना है। इससे स्थानीय गाइड, वाहन चालक, होम-स्टे, भोजन, हस्तशिल्प और अन्य सेवाओं में रोजगार पैदा हो सकता है। लेकिन पर्यटन की सफलता केवल पर्यटकों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। यह भी मापा जाना चाहिए कि पर्यटन से स्थानीय परिवारों की आय कितनी बढ़ी, कितने स्थानीय युवाओं को रोजगार मिला और पर्यटन आय का कितना हिस्सा स्थानीय विकास में गया।
15. सामाजिक ऑडिट की आवश्यकता
कूनो के सभी 24 पुनर्वासित गांवों का स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट होना चाहिए। परिवारवार यह दर्ज किया जाए कि किसे कितनी भूमि मिली, भूमि का वैधानिक अधिकार किसके पास है, कितने घर पूर्ण हैं, पानी और सिंचाई की स्थिति क्या है, स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र कितनी दूरी पर हैं, कृषि से कितनी आय होती है, कितने लोग मजदूरी या पलायन पर निर्भर हैं और कितने परिवारों की पारंपरिक वन-आधारित आय समाप्त हुई।
16. सामाजिक न्याय के लिए आवश्यक कदम
पहला, 24 गांवों का परिवारवार सर्वेक्षण हो। दूसरा, सभी भूमि अधिकारों को कानूनी रूप से सुनिश्चित किया जाए। तीसरा, प्रत्येक पुनर्वास गांव में पेयजल और सिंचाई की स्थायी व्यवस्था हो। चौथा, अधूरे मकानों को पूरा किया जाए। पांचवां, सहरिया PVTG परिवारों के लिए विशेष आजीविका योजना बने। छठा, स्थानीय महिलाओं और युवाओं को पर्यटन से जोड़ा जाए। सातवां, चीता पर्यटन की आय में स्थानीय समुदाय की हिस्सेदारी सुनिश्चित हो। आठवां, किसी भी नए विस्थापन से पहले सामाजिक एवं पर्यावरणीय प्रभाव का स्वतंत्र अध्ययन हो। नौवां, ग्राम सभा की वास्तविक और सूचित सहमति सुनिश्चित की जाए। दसवां, संभावित दूसरे विस्थापन वाले परिवारों के लिए पहले से पुनर्वास एवं आजीविका सुरक्षा योजना तैयार हो।
17. निष्कर्ष : चीता भी बचे और इंसान भी
कूनो में चीतों की संख्या बढ़ना संरक्षण की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। सितंबर 2026 तक 52 चीते और भारत में जन्मे 32 शावक दर्ज किए गए हैं। लेकिन उसी कूनो की दूसरी तस्वीर में 24 पुनर्वासित गांव, लगभग 1,545 परिवार, भूमि-अधिकार, जंगल आधारित आजीविका, पानी, आवास और पुनर्वास की चुनौतियां दिखाई देती हैं। इसलिए कूनो की सफलता को दो पैमानों पर देखना होगा—वन्यजीव संरक्षण और सामाजिक न्याय। यदि चीते सुरक्षित हों लेकिन विस्थापित परिवारों की बुनियादी जरूरतें अधूरी रहें तो संरक्षण की कहानी अधूरी है। कूनो का आदर्श मॉडल वह होना चाहिए जिसमें चीता भी बचे, जंगल भी बचे और उन समुदायों का जीवन एवं सम्मान भी सुरक्षित रहे, जिन्होंने इस संरक्षण भू-दृश्य की सामाजिक कीमत चुकाई है।
शोध आलेख का मूल प्रश्न यही है—क्या संरक्षण ऐसा हो सकता है जिसमें प्रकृति की रक्षा के साथ हाशिए के लोगों के अधिकार, आजीविका और गरिमा भी सुरक्षित रहें? यही कूनो के भविष्य की सबसे बड़ी सामाजिक और नीतिगत चुनौती है।
