विजय की ✒ कलम

संपादकीय
राजनीति में विचारों का मतभेद स्वाभाविक है। अलग-अलग राज्यों, भाषाओं और संस्कृतियों की अपनी पहचान भी है। लेकिन जब राजनीति की भाषा हमारी आस्था और आराध्य देवताओं तक पहुंच जाए, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।
हाल ही में तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के एक बयान को लेकर विवाद खड़ा हुआ। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा कि वे द्रविड़ हैं और भगवान शिव के भक्त हैं, जबकि आर्यों को भगवान श्रीराम का उपासक बताते हुए श्रीराम को अमीरों और भगवान शिव को गरीबों का भगवान कहा। इस बयान पर भाजपा नेताओं ने भी आपत्ति जताई और इसे हिंदुओं तथा उत्तर-दक्षिण के बीच विभाजन पैदा करने वाला बताया।
अब सवाल यह है कि क्या भगवान को भी राजनीति की सीमाओं में बांटा जा सकता है?
भगवान श्रीराम केवल उत्तर के नहीं हैं और भगवान भोलेनाथ केवल दक्षिण के नहीं हैं। राम हों, कृष्ण हों, शिव हों, माता दुर्गा हों या कोई अन्य आराध्य—उनकी भक्ति किसी भाषा, प्रदेश, जाति या आर्थिक वर्ग की मोहताज नहीं है।
भारत की सबसे बड़ी खूबसूरती ही यही है कि यहां भाषा अलग हो सकती है, पहनावा अलग हो सकता है, पूजा की परंपराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन आस्था लोगों को जोड़ती है।
दक्षिण भारत में भगवान श्रीराम की भक्ति है तो उत्तर भारत में भगवान शिव के करोड़ों भक्त हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण स्वयं रामेश्वरम की धार्मिक परंपरा है, जहां भगवान राम द्वारा भगवान शिव की पूजा किए जाने की मान्यता जुड़ी हुई है।
फिर राम को अमीरों का और शिव को गरीबों का भगवान बताने की जरूरत आखिर क्यों?
क्या गरीब श्रीराम को नहीं मान सकता?
क्या अमीर भगवान शिव का भक्त नहीं हो सकता?
क्या दक्षिण भारत का व्यक्ति श्रीराम को अपना आराध्य नहीं मान सकता?
क्या उत्तर भारत का व्यक्ति भोलेनाथ का भक्त नहीं हो सकता?
आस्था का कोई आयकर स्लैब नहीं होता, कोई राज्य सीमा नहीं होती और न ही भगवान के भक्तों की कोई आर्थिक श्रेणी होती है।
राजनीति कीजिए, नीतियों पर बहस कीजिए, विकास पर सवाल पूछिए, सरकारों के कामकाज पर चर्चा कीजिए—यह लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन भगवान और आस्था को राजनीतिक खांचे में डालने से समाज में अनावश्यक दूरी और कटुता पैदा हो सकती है।
हमारी राजनीति चाहे जितनी अलग हो, हमारी राष्ट्रीय पहचान एक है। उत्तर हो या दक्षिण, पूर्व हो या पश्चिम—हम सब भारतीय हैं।
और सनातन परंपरा में तो भगवान के अनेक रूपों में एक ही परम तत्व को देखने की भावना रही है। इसलिए श्रीराम और महादेव को एक-दूसरे के सामने खड़ा करना ही अपने आप में एक अनावश्यक विभाजन पैदा करता है।
राम हमारे हैं, शिव हमारे हैं।
राम सबके हैं, शिव सबके हैं।
जो राम को पूजता है वह भी अपना है, जो शिव को पूजता है वह भी अपना है।
राजनेताओं को यह समझना होगा कि जनता केवल वोट बैंक नहीं है। उसकी आस्था, भावनाएं और धार्मिक विश्वास भी उसके जीवन का हिस्सा हैं।
इसलिए राजनीति के लिए समाज को उत्तर-दक्षिण, भाषा, जाति या भगवान के नाम पर बांटने के बजाय ऐसी भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए जो भारत को जोड़े।
कहावत है—बाप कितनों को मानो, लेकिन मां तो एक ही होती है।
इसी तरह हमारी क्षेत्रीय पहचान कितनी भी अलग क्यों न हो, देश की पहचान एक है—हम भारतीय हैं।
भगवान से यही प्रार्थना है कि सभी नेताओं को सद्बुद्धि दें और ऐसी भाषा से बचने की प्रेरणा दें जिससे समाज में विभाजन नहीं, बल्कि भाईचारा और एकता मजबूत हो।
— विजय दुसेजा
“विजय की ✒ कलम”
