– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
– बिलासपुर, छत्तीसगढ़
महिषासुर मर्दिनी मंदिर, चैतुरगढ़, लाफ़ागढ: चैतुरगढ़ किले के शिखर पर स्थित मां महिषासुर मर्दिनी का मंदिर इस ऐतिहासिक परिसर का प्रमुख धार्मिक केंद्र है। मंदिर के गर्भगृह में देवी की बारह भुजाओं वाली प्रतिमा स्थापित है। देवी महिषासुर मर्दिनी का स्वरूप शक्ति, साहस और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के दौरान यहां विशेष पूजा- अर्चना होती है। इन दिनों श्रद्धालुओं के लिए इस स्थान का आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है। पहाड़ों, हरियाली और शांत प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित मंदिर भक्तों को शहरी जीवन की भागदौड़ से दूर आत्मिक शांति का अनुभव कराता है। यहां की धार्मिक परंपरा केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है। ऐसे प्राचीन मंदिर पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक स्मृति, लोकविश्वास और सामुदायिक जुड़ाव को भी जीवित रखते हैं। इसलिए मंदिर का संरक्षण केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के रूप में भी महत्वपूर्ण है।
मंदिर के समीप ऐतिहासिक महामाया तालाब: जल-संरक्षण की विरासत अप्रैल की गर्मी में राहत चाहिए तो घूमने जरूर आएं छत्तीसगढ़ का कश्मीर ‘चैतुरगढ़’,माँ महिषासुर मर्दिनी के भी होंगे दर्शन – चैतुरगढ़ की ऐतिहासिक पहचान का एक महत्वपूर्ण पक्ष यहां का प्राचीन जल-स्रोत भी है। मंदिर के समीप स्थित एक बड़े तालाब का उल्लेख स्थानीय पर्यटन- विवरणों में महामाया तालाब के नाम से मिलता है।एक स्थानीय विवरण के अनुसार, इसका निर्माण आसपास के गांव के एक जमींदार ने कराया था। हालांकि, इसके निर्माण की निश्चित तिथि, निर्माता का प्रमाणित नाम और निर्माण से जुड़ा विस्तृत ऐतिहासिक अभिलेख उपलब्ध आधिकारिक स्रोतों से स्पष्ट नहीं होता। इसलिए इन विवरणों की पुरातात्विक या अभिलेखीय पुष्टि आवश्यक है। इस तालाब का महत्व केवल इतना नहीं है कि यह मंदिर के पास स्थित जलाशय है। पहाड़ी के शिखर पर बसे किसी ऐतिहासिक परिसर में जल की उपलब्धता अपने आप में एक महत्वपूर्ण विषय है। दुर्गों में रहने वाले लोगों, धार्मिक गतिविधियों और यात्रियों की आवश्यकताओं के लिए जल-संग्रह की व्यवस्था उपयोगी रही होगी। चैतुरगढ़ के संदर्भ में यह एक ऐतिहासिक संभावना है, हालांकि महामाया तालाब का मूल उद्देश्य क्या था, इसे प्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर ही अंतिम रूप से बताया जा सकता है। इस तालाब को चैतुरगढ़ की प्राचीन जल-संस्कृति के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। आज जब जल-संकट, भूजल में गिरावट और वर्षाजल के संरक्षण की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही है, तब ऐसे पुराने जलाशय हमें स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जल-संग्रह की परंपराओं की याद दिलाते हैं।इतिहास की असली सीख यही है कि जलाशय केवल पानी भरने के लिए नहीं होते; वे किसी समाज की दूरदर्शिता, सामुदायिक जीवन और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी के भी प्रतीक होते हैं।
पांच तालाबों वाला पहाड़ी पठार: चैतुरगढ़ की अनूठी विशेषता किले के शिखर पर लगभग पांच वर्ग किलोमीटर के विस्तृत पठारी क्षेत्र में पांच तालाब हैं। इनमें से तीन में वर्षभर पानी रहने का उल्लेख किया गया है। यह जानकारी चैतुरगढ़ को एक साधारण पहाड़ी दुर्ग से अलग पहचान देती है। सामान्यतः ऊंचाई पर स्थित दुर्गों के सामने पानी की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती हो सकती थी। ऐसे में एक ही पठारी क्षेत्र में अनेक तालाबों का होना तत्कालीन जल-प्रबंधन की संभावनाओं पर विचार करने का अवसर देता है।
हालांकि, इन तालाबों की निर्माण-तिथि, मूल जलग्रहण क्षेत्र, आपसी संबंध और वर्तमान जलधारण क्षमता का व्यवस्थित वैज्ञानिक सर्वेक्षण सामने आए बिना यह दावा करना उचित नहीं होगा कि सभी तालाब किसी एक सुनियोजित प्राचीन जल-प्रबंधन परियोजना के अंतर्गत बनाए गए थे। फिर भी, इन जलाशयों की ऐतिहासिक और पर्यावरणीय महत्ता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि इनके जलस्तर, वर्षाजल के प्रवाह, गाद की मात्रा और आसपास के वन क्षेत्र का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए, तो चैतुरगढ़ की प्राचीन जल-संस्कृति के बारे में और अधिक प्रमाणिक जानकारी प्राप्त हो सकती है।
चैतुरगढ की पहाड़ी से उतरकर बीच पहाड़ी में स्थित है शंकर गुफा: प्रकृति की गोद में रहस्य और रोमांच चैतुरगढ़ मंदिर से लगभग तीन किलोमीटर दूर लेकिन पहाड़ी से कुछ नीचे उतरकर शंकर गुफा स्थित है। जो काफी बड़ी आकार में है इसी गुफा में विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियां है जहां पर्यटक आस्था पूर्वक पहुंचते हैं और पूजा पाठ कर मनोकामना पूर्ति हेतु अपनी इच्छा व्यक्त करते हैं। इसी गुफा के अंदर तरफ लगभग 28 फीट लंबी, सुरंग जैसी संकरी अंधेरी गलियारा है, जिसमें प्रवेश करने के लिए झुकना अथवा रेंगना पड़ सकता है। इस गुफा में मैं भी प्रवेश किया और प्रवेश करते समय यह यह चीज मुझे रूम पर रोमांटिक कर रही थी कि इसमें केवल एक तरफ से एक ही आदमी जा सकता था वापस लौटने वाले के लिए थोड़ा भी बगल में जगह नहीं रहती। करीब 28 फीट आगे जाकर कुआं जैसा चौड़ा गोली वाला क्षेत्र है जहां शिवलिंग स्थापित है। इस गुफा से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं इसे श्रद्धालुओं के लिए और भी आकर्षक बनाती हैं। साथ ही, इसकी प्राकृतिक संरचना भूगर्भीय दृष्टि से भी रुचिकर है। ऐसी गुफाओं का संरक्षण करते समय चट्टानों की स्थिरता, भीतर वायु-संचार, रोशनी और आगंतुकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना आवश्यक है। गुफा की संकीर्णता को देखते हुए सभी लोगों के लिए भीतर प्रवेश करना उचित नहीं है। विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और शारीरिक कठिनाई वाले यात्रियों को स्थानीय सुरक्षा-संबंधी निर्देशों का पालन करना चाहिए।
चैतुरगढ हरियाली, वन्यजीवन और प्राकृतिक सौंदर्य का अनमोल संसार है। चैतुरगढ़ का आकर्षण उसके मंदिर और किले तक सीमित नहीं है। पहाड़ी की प्राकृतिक चट्टानें, आसपास के जंगल, घाटियां और वन्यजीव इस क्षेत्र को प्रकृति-पर्यटन के लिए भी महत्वपूर्ण बनाते हैं। कोरबा जिला प्रशासन का विवरण यहां विभिन्न प्रकार के पक्षियों और जंगली जानवरों की मौजूदगी का उल्लेख करता है। लेकिन प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लेने के साथ यह समझना भी जरूरी है कि वन क्षेत्र केवल पर्यटकों के मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि वन्यजीवों के आवास और स्थानीय पारिस्थितिकी के संतुलन के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। पर्यटकों को प्लास्टिक, खाद्य पैकेट और अन्य कचरा खुले में नहीं छोड़ना चाहिए। तालाबों में साबुन या रसायनों का उपयोग, वन्यजीवों को भोजन देना और शोर करके उनके प्राकृतिक व्यवहार में बाधा डालना भी उचित नहीं है। चैतुरगढ़ को वास्तव में सुंदर बनाए रखने का अर्थ केवल वहां तक पहुंचने वाली सड़क को बेहतर बनाना नहीं, बल्कि उसके जंगल, जलस्रोत, चट्टानों और ऐतिहासिक अवशेषों को सुरक्षित रखना भी है।
जहां पर्यटन विकास के साथ संरक्षण की भी है जरूरत। चैतुरगढ़ जैसे ऐतिहासिक स्थलों के विकास के लिए सरकार, स्थानीय प्रशासन, पुरातत्व विशेषज्ञों, वन विभाग, मंदिर प्रबंधन और स्थानीय समुदायों के बीच समन्वय आवश्यक है।
कुछ महत्वपूर्ण कदम इस दिशा में उपयोगी हो सकते हैं: ऐतिहासिक दस्तावेजों का संकलन: किले, तीनों प्रवेश द्वारों, मंदिर और तालाबों से जुड़े अभिलेखों का अध्ययन कर प्रमाणिक इतिहास तैयार किया जाए। * तालाबों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण: महामाया तालाब सहित सभी पांच जलाशयों की स्थिति, जलधारण क्षमता और जलग्रहण क्षेत्र का अध्ययन किया जाए। * संरचनाओं की सुरक्षा: प्राचीन द्वारों, पत्थर की संरचनाओं और मंदिर परिसर की मरम्मत विशेषज्ञों की देखरेख में हो। * स्वच्छता एवं अपशिष्ट प्रबंधन: पर्याप्त कूड़ेदान, नियमित सफाई और प्लास्टिक-मुक्त पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए।* सुरक्षित पर्यटन: गुफा और दुर्गम रास्तों पर आवश्यक चेतावनी संकेत, सुरक्षा निर्देश और प्राथमिक उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। * स्थानीय समुदाय की भागीदारी: स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षित पर्यटन मार्गदर्शक बनाने और स्थानीय हस्तशिल्प एवं उत्पादों को प्रोत्साहित करने से रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। इन प्रयासों से चैतुरगढ़ की पहचान केवल एक धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में नहीं, बल्कि एक समग्र ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर के रूप में विकसित हो सकती है।
निष्कर्षत: चैतुरगढ़ को केवल देखना नहीं, समझना और बचाना भी जरूरी..चैतुरगढ़ की पहाड़ी पर स्थित मां महिषासुर मर्दिनी मंदिर हमें आस्था की शक्ति का अनुभव कराता है। कलचुरी काल से जुड़ा किला अतीत की राजनीतिक और स्थापत्य परंपरा की याद दिलाता है। महामाया तालाब और अन्य प्राचीन जलाशय जल-संरक्षण की ऐतिहासिक संभावनाओं की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। वहीं शंकर गुफा, जंगल और घाटियां प्रकृति के अनूठे रूप से परिचित कराती हैं।
लेकिन इन सभी धरोहरों का महत्व तभी बना रहेगा, जब हम इन्हें केवल घूमने-फिरने की जगह मानने के बजाय अपनी साझा विरासत समझेंगे। किसी ऐतिहासिक स्थल की वास्तविक समृद्धि उसके पत्थरों की उम्र, मंदिर की प्रसिद्धि या पर्यटकों की संख्या से ही नहीं मापी जाती; उसकी असली पहचान इस बात में है कि वह अपने इतिहास, जल, जंगल और संस्कृति को आने वाली पीढ़ियों के लिए कितना सुरक्षित रख पाता है। चैतुरगढ़ छत्तीसगढ़ की ऐसी ही अमूल्य धरोहर है, जिसके संरक्षण में हमारी आस्था, हमारी जिम्मेदारी और हमारी ऐतिहासिक चेतना,तीनों की परीक्षा होती है।
– सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
– वरिष्ठ पत्रकार/ लेखक/ अधिवक्ता बिलासपुर, छत्तीसगढ़
