विजय की ✒️ कलम

बिलासपुर / संपादकीय।आज के दौर में राजनीति हो, व्यापार हो या सामाजिक संगठन—हर क्षेत्र में कुछ लोगों की कार्यशैली ऐसी दिखाई देती है, जिसमें जनहित और समाज सेवा से ज्यादा महत्व अपने स्वार्थ, अपनी प्रतिष्ठा और अपनी जय-जयकार को दिया जाने लगता है। किसी भी तरह अपना काम बन जाए, अपनी वाहवाही हो जाए और अपने प्रभाव को कायम रखा जाए, यही सोच जब सामाजिक संस्थाओं में प्रवेश कर जाती है, तब समाज सेवा का मूल उद्देश्य पीछे छूटने लगता है।बिलासपुर में डांडिया आयोजन को लेकर उठे सवाल भी इसी गंभीर विषय की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। समाज की एक आयोजन समिति द्वारा महिला एवं अन्य संस्थाओं के सहयोग से शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर एक बड़े होटल में डांडिया कार्यक्रम आयोजित किए जाने की चर्चा है। आयोजन पर लगभग 45 लाख रुपये खर्च होने और प्रतिभागियों के लिए हजारों रुपये के पास रखे जाने की बात सामने आई है। ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है कि यदि किसी आयोजन का उद्देश्य समाज सेवा है, तो क्या उसकी पहुंच समाज के हर वर्ग तक नहीं होनी चाहिए? क्या यह जानना जरूरी नहीं कि कुल आय कितनी हुई, खर्च कितना हुआ और बची हुई राशि का उपयोग किस उद्देश्य से किया गया?यह सवाल किसी एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। यह उस सोच पर सवाल है, जिसमें समाज का नाम तो बड़े गर्व से लिया जाता है, लेकिन समाज के आर्थिक रूप से कमजोर, मध्यमवर्गीय और साधारण परिवारों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।रायपुर के निशुल्क आयोजन ने खड़ा किया बड़ा सवालइसी बीच रायपुर में छत्तीसगढ़ सिंधी पंचायत द्वारा बड़े होटल में निशुल्क डांडिया आयोजन किए जाने की जानकारी और उससे संबंधित वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ। बताया जा रहा है कि इस कार्यक्रम में महिलाओं, युवाओं, बच्चों और परिवारों ने बड़ी संख्या में भाग लिया तथा उत्साहपूर्वक आयोजन का आनंद उठाया।इस आयोजन की चर्चा बिलासपुर तक पहुंची और लोगों ने इसकी सराहना की। अब सवाल यह है कि यदि कोई संस्था समाज के लिए निशुल्क कार्यक्रम आयोजित कर सकती है, जिसमें हर वर्ग के लोगों को शामिल होने का अवसर मिले, तो दूसरे आयोजनों में भी ऐसी व्यवस्था पर विचार क्यों नहीं किया जा सकता?यहां तुलना किसी संस्था को छोटा या बड़ा साबित करने के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक आयोजनों के उद्देश्य पर विचार करने के लिए होनी चाहिए। आयोजन की भव्यता से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उससे समाज के कितने लोगों को लाभ मिला और कितने लोग उसमें शामिल हो सके।समाज सेवा और व्यवसाय के बीच की रेखा स्पष्ट होनी चाहिएडांडिया, गरबा और सांस्कृतिक कार्यक्रम हमारी परंपरा, एकता और सामाजिक मेल-मिलाप के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इन आयोजनों पर खर्च होना या प्रवेश शुल्क लिया जाना अपने आप में गलत नहीं है। बड़े कार्यक्रमों में होटल, मंच, कलाकार, सुरक्षा, सजावट और अन्य व्यवस्थाओं पर पर्याप्त धन खर्च हो सकता है।लेकिन जब किसी आयोजन को समाज सेवा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब आयोजकों की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिए कि आयोजन का वास्तविक उद्देश्य क्या है, आर्थिक व्यवस्था किस प्रकार की गई है और समाज को उससे क्या लाभ मिला है।यदि कार्यक्रम व्यावसायिक है, तो उसे व्यवसाय के रूप में प्रस्तुत करने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन यदि उसे समाज सेवा का नाम दिया जा रहा है, तो उसकी कसौटी भी समाज का हित, समावेशिता और पारदर्शिता ही होनी चाहिए।समाज के नाम पर आयोजित कार्यक्रमों में यदि आर्थिक रूप से कमजोर परिवार केवल महंगे पास के कारण शामिल नहीं हो पाते, तो आयोजकों को आत्ममंथन जरूर करना चाहिए। क्या कुछ निशुल्क पास, रियायती प्रवेश या सभी के लिए खुले कार्यक्रम की व्यवस्था नहीं की जा सकती? क्या आयोजन की आय का कुछ हिस्सा शिक्षा, चिकित्सा, जरूरतमंद परिवारों अथवा अन्य सामाजिक कार्यों में नहीं लगाया जा सकता?ये ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर समाज को मिलने चाहिए।तीन साल से उठ रही आवाज का आज भी वही सवालमैं पिछले तीन वर्षों से सामाजिक आयोजनों में पारदर्शिता, आम लोगों की भागीदारी और समाज के धन का समाज के हित में उपयोग करने की बात उठाता रहा हूं। मेरा स्पष्ट मानना है कि सामाजिक संस्था की कुर्सी कोई व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का सिंहासन नहीं, बल्कि सेवा का दायित्व है।किसी पद पर बैठने का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति अपनी प्रशंसा करवाने में लग जाए। उस पद का वास्तविक सम्मान तब होता है, जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचता है, उसकी परेशानी समझता है और उसे भी सामाजिक गतिविधियों में बराबरी का अवसर देता है।यदि समाज के नाम पर धन एकत्र किया जाता है या समाज की संस्थाएं किसी आयोजन में सहयोग करती हैं, तो आय-व्यय का स्पष्ट हिसाब सामने रखना नैतिक जिम्मेदारी है। इससे संस्था की विश्वसनीयता बढ़ती है और लोगों का भरोसा मजबूत होता है।मेरी लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति से है जिसमें समाज सेवा के नाम पर व्यक्तिगत स्वार्थ को प्राथमिकता दी जाती है। मैं यह भी मानता हूं कि किसी आयोजन की सफलता केवल भीड़, होटल की भव्यता, मंच की चमक या सोशल मीडिया पर चलने वाले प्रचार से नहीं मापी जा सकती। सफलता का असली पैमाना यह है कि समाज के कितने लोग उससे जुड़े, कितने परिवार लाभान्वित हुए और समाज में एकता का कितना संदेश गया।प्रचार से नहीं, काम से बनती है पहचानकिसी कार्यक्रम के पक्ष में वीडियो जारी करना, उसकी प्रशंसा करना या अपनी उपलब्धियां गिनाना हर संस्था का अधिकार है। लेकिन प्रशंसा के साथ सवाल पूछने वालों को विरोधी मान लेना उचित नहीं है। सोशल मीडिया पर किसी दूसरे आयोजन की सराहना होने से यदि किसी संस्था को असहजता महसूस होती है, तो उसे दूसरे के प्रचार का जवाब प्रचार से नहीं, बल्कि अपने काम की गुणवत्ता और पारदर्शिता से देना चाहिए।यदि किसी आयोजन की आर्थिक व्यवस्था को लेकर सवाल हैं, तो उनका उत्तर तथ्यों और दस्तावेजों के साथ दिया जाना चाहिए। आरोप-प्रत्यारोप, व्यक्तिगत टिप्पणियों और एक-दूसरे को नीचा दिखाने से समाज का कोई भला नहीं होने वाला।यह भी जरूरी है कि किसी व्यक्ति या संस्था पर धोखाधड़ी, बेईमानी अथवा धन के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप बिना प्रमाण के न लगाए जाएं। लेकिन सवाल पूछना, हिसाब मांगना और समाज के हित की बात करना हर जागरूक सदस्य का अधिकार है।सवालों से घबराने के बजाय उनका तथ्यात्मक जवाब देना ही सच्चे नेतृत्व और जिम्मेदार सामाजिक संस्था की पहचान है।समाज की कुर्सी सेवा के लिए है, स्वार्थ के लिए नहींसमाज में पद और प्रतिष्ठा स्थायी नहीं होते। आज कोई अध्यक्ष है, कोई सचिव है, कोई संरक्षक है, तो कल कोई दूसरा होगा। लेकिन व्यक्ति के कार्यों की छाप लंबे समय तक बनी रहती है। लोग यह जरूर याद रखते हैं कि किसने समाज को जोड़ने का काम किया और किसने अपने पद को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा तक सीमित रखा।समाज की कुर्सी पर बैठने वालों को यह समझना होगा कि यह सम्मान के साथ-साथ जवाबदेही भी लेकर आती है। यदि आयोजन में समाज की संस्थाओं, दानदाताओं, सहयोगियों अथवा सदस्यों का योगदान है, तो प्रत्येक सहयोग का सम्मान होना चाहिए और आर्थिक विवरण भी स्पष्ट रखा जाना चाहिए।आयोजन में लाभ हुआ है या खर्च अधिक हुआ है, यह तथ्य सामने आना चाहिए। यदि कार्यक्रम से कोई बचत हुई है, तो उसका उपयोग किस कार्य में किया जाएगा, इसकी जानकारी भी समाज को मिलनी चाहिए। इससे पारदर्शिता की परंपरा विकसित होगी और भविष्य में किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश कम होगी।विजयादशमी का संदेश: पहले अपने भीतर के रावण को जलाएंविजयादशमी हमें केवल रावण के पुतले को जलाने का संदेश नहीं देती, बल्कि अपने भीतर बैठे अहंकार, लालच, छल, ईर्ष्या और स्वार्थ जैसे अवगुणों को समाप्त करने की प्रेरणा भी देती है।रावण विद्वान था, शक्तिशाली था, लेकिन उसका अहंकार उसके पतन का कारण बना। इतिहास और धर्मग्रंथों से मिलने वाली यह सीख आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। पद, पैसा और प्रतिष्ठा होने के बावजूद यदि व्यक्ति के भीतर विनम्रता, ईमानदारी और सेवा भाव नहीं है, तो उसकी उपलब्धियां अधूरी हैं।मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का आदर्श हमें सिखाता है कि सत्य, मर्यादा, न्याय और कर्तव्य का मार्ग ही अंततः समाज को सही दिशा देता है।इसलिए विजयादशमी के पावन अवसर पर सभी सामाजिक संस्थाओं और उनके पदाधिकारियों से मेरा विनम्र आग्रह है कि वे आत्ममंथन करें। समाज सेवा को व्यक्तिगत प्रचार का माध्यम न बनाएं। आयोजन की आर्थिक व्यवस्था स्पष्ट रखें। आम परिवारों को जोड़ें। जरूरतमंदों के लिए अवसर पैदा करें और समाज के प्रत्येक रुपये का उपयोग जनहित में करें।अंत में एक सीधा सवालयदि हमारा उद्देश्य वास्तव में सिंधी समाज की एकता, संस्कृति और सेवा है, तो फिर आयोजन ऐसा क्यों न हो जिसमें अधिक से अधिक परिवार शामिल हो सकें? यदि कार्यक्रम से आय होती है, तो उसका हिसाब समाज के सामने क्यों न रखा जाए? यदि हम समाज के सेवक हैं, तो समाज के सवालों का जवाब देने में संकोच कैसा?याद रखिए, समाज की सेवा का प्रमाण बड़े-बड़े दावे नहीं, बल्कि ईमानदार काम होता है। लोगों की तालियां कुछ समय के लिए मिल सकती हैं, लेकिन विश्वास वर्षों के व्यवहार से बनता है।आइए, समाज सेवा को दिखावे से मुक्त करें, आर्थिक पारदर्शिता को परंपरा बनाएं और सामाजिक आयोजनों को हर वर्ग के लिए सुलभ बनाएं। क्योंकि समाज का नाम लेकर समाज को पीछे छोड़ देना सेवा नहीं हो सकती।अहंकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसका अंत निश्चित है। इसलिए दूसरों की कमियां गिनाने से पहले अपने भीतर झांकिए और अपने कर्तव्य को पहचानिए।समाज हमारा है, जिम्मेदारी भी हमारी है। समाज के नाम पर होने वाला हर आयोजन समाज के विश्वास पर खरा उतरना चाहिए।
