
फर्जी बिल्टी, संदिग्ध वाहन नंबर, GPS ट्रैकिंग और भुगतान में गड़बड़ी के आरोप; सेनोस्फीयर का टेंडर बंद होने से संभावित राजस्व नुकसान की जांच की मांग
पांच माह से आंदोलनरत ग्रामीणों ने CBI से कार्रवाई की लगाई गुहार, अनंत वासने के कार्यकाल के निर्णयों और परिवहन रिकॉर्ड की पड़ताल जरूरी
अनिल शुक्ला की रिपोर्ट
बिलासपुर। NTPC सीपत में राखड़ परिवहन और राखड़ डैम से निकलने वाले सेनोस्फीयर के संग्रहण एवं बिक्री को लेकर कथित अनियमितताओं का मामला गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। फर्जी बिल्टी, वाहनों के नंबरों में कथित हेरफेर, GPS ट्रैकिंग, परिवहन दूरी और भुगतान में गड़बड़ी के आरोपों के बीच तत्कालीन AGM अनंत वासने के बिहार स्थानांतरण के बाद भी ग्रामीणों का आंदोलन और जांच की मांग जारी है। अब सवाल केवल राखड़ परिवहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी है कि राखड़ डैम से प्राप्त होने वाले मूल्यवान औद्योगिक पदार्थ सेनोस्फीयर के संग्रहण और बिक्री की व्यवस्था में क्या बदलाव हुए, टेंडर बंद करने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया और इससे NTPC को संभावित राजस्व नुकसान हुआ या नहीं?
ग्राम सुखरीपाली के ठाकुरदेवा के पास करीब पांच माह से आंदोलनरत ग्रामीणों और शिकायतकर्ताओं ने NTPC प्रबंधन, सतर्कता विभाग तथा संबंधित जांच एजेंसियों से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। आंदोलनकारियों ने CBI से भी हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई है। हालांकि, फिलहाल सामने आए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और किसी अधिकारी अथवा ठेकेदार की संलिप्तता का निर्धारण जांच के बाद ही संभव होगा।
सेनोस्फीयर क्या है, राखड़ डैम में क्यों है इसकी कीमत?
सेनोस्फीयर (Cenosphere) को समझना इस पूरे मामले की आर्थिक अहमियत जानने के लिए जरूरी है। कोयले से बिजली उत्पादन के दौरान बनने वाली फ्लाई ऐश में सिलिका और एल्युमिना से बने बेहद हल्के, खोखले तथा सूक्ष्म गोलाकार कण मौजूद रहते हैं। इन्हें सेनोस्फीयर कहा जाता है। इनकी कम घनत्व, तापरोधी क्षमता, मजबूती और विशेष भौतिक गुणों के कारण औद्योगिक बाजार में मांग रहती है। इनका इस्तेमाल पेंट, प्लास्टिक, रेजिन, हल्के निर्माण उत्पादों, कंपोजिट सामग्री और तापरोधी उत्पादों में किया जाता है। “https://www.cenosphereindia.in/products.php” (https://www.cenosphereindia.in/products.php)
गीली राखड़ प्रणाली में इन कणों का एक हिस्सा पानी के ऊपर तैरने लगता है। इसी गुण के कारण राखड़ तालाबों में जमा फ्लाई ऐश से सेनोस्फीयर को अलग करके एकत्र किया जा सकता है। संग्रहण के बाद इसकी गुणवत्ता, आकार, शुद्धता और अन्य मानकों के अनुसार छंटाई तथा प्रसंस्करण किया जाता है। इसके बाद इसे औद्योगिक उपयोगकर्ताओं को बेचा जा सकता है। “https://ebooks.inflibnet.ac.in/esp11/chapter/fly-ash-utilization-and-rules/” (https://ebooks.inflibnet.ac.in/esp11/chapter/fly-ash-utilization-and-rules/)
यानी राखड़ डैम में जमा प्रत्येक पदार्थ को केवल अनुपयोगी कचरा मानना सही नहीं होगा। उसमें मौजूद कुछ घटकों का व्यावसायिक मूल्य भी हो सकता है। यही वजह है कि सेनोस्फीयर के संग्रहण और बिक्री की व्यवस्था में पारदर्शिता महत्वपूर्ण है।
सीपत में टेंडर बंद होने का आरोप, राजस्व का हिसाब कौन देगा?
शिकायतकर्ताओं के अनुसार, NTPC सीपत के राखड़ डैम से सेनोस्फीयर का संग्रहण कर उसे बोरियों में भरने और अधिकृत ठेकेदारों के माध्यम से विशाखापत्तनम सहित विभिन्न औद्योगिक केंद्रों तक भेजने की व्यवस्था थी। आरोप है कि अनंत वासने के कार्यकाल में इसकी टेंडर प्रक्रिया बंद हो गई। अब ग्रामीण यह जानना चाहते हैं कि टेंडर बंद करने का निर्णय किस आदेश के तहत लिया गया, इसके पीछे प्रशासनिक या तकनीकी कारण क्या थे और इसके बाद सेनोस्फीयर के संग्रहण एवं बिक्री की व्यवस्था किस प्रकार संचालित हुई।
NTPC के आधिकारिक टेंडर पोर्टल पर वर्ष 2015 में सीपत के राखड़ तालाब से सेनोस्फीयर के संग्रहण और बिक्री के लिए निविदा का रिकॉर्ड उपलब्ध है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सीपत में इस गतिविधि के लिए पहले औपचारिक निविदा प्रक्रिया अपनाई गई थी। “https://ntpctender.ntpc.co.in/NITDetails/NITs/14655” (https://ntpctender.ntpc.co.in/NITDetails/NITs/14655)
NTPC की ऐश पॉलिसी में भी सेनोस्फीयर के संग्रहण और बिक्री के लिए खुली निविदा, निर्धारित आरक्षित मूल्य तथा पात्र बोलीदाता के चयन का प्रावधान दर्ज है। नीति के अनुसार, संबंधित राखड़ तालाब की नीलामी या निविदा में सबसे ऊंची पात्र बोली निर्धारित आरक्षित मूल्य के बराबर अथवा उससे अधिक होने पर अनुबंध देने की व्यवस्था है। “https://ntpc.co.in/sites/default/files/policy-documents/AshPolicy2015.pdf” (https://ntpc.co.in/sites/default/files/policy-documents/AshPolicy2015.pdf)
ऐसे में सीपत में टेंडर बंद होने के आरोप की जांच के लिए पुराने और नए निविदा दस्तावेजों का तुलनात्मक परीक्षण जरूरी है। यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि अंतिम वैध अनुबंध कब तक प्रभावी था, उसके बाद कोई नई निविदा निकाली गई या नहीं, संग्रहण किसे और किन शर्तों पर दिया गया तथा बिक्री से प्राप्त राशि का हिसाब किस खाते में दर्ज हुआ।
करोड़ों के राजस्व नुकसान की आशंका, लेकिन गणना जरूरी
सेनोस्फीयर के टेंडर बंद होने मात्र से करोड़ों रुपये के नुकसान का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। वास्तविक आर्थिक प्रभाव का आकलन करने के लिए उपलब्ध मात्रा, गुणवत्ता, बाजार मूल्य, संग्रहण लागत, अनुबंध की शर्तें और पूर्व वर्षों की बिक्री का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।
जांच में यह पता लगाया जाना चाहिए कि सीपत के राखड़ डैम में संबंधित अवधि के दौरान कितनी सेनोस्फीयर उपलब्ध थी, उसमें से कितनी मात्रा एकत्र की गई, कितनी बेची गई और कितनी मात्रा का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। यदि किसी अवधि में नियमित निविदा नहीं हुई, तो यह भी देखा जाना चाहिए कि उस समय बिक्री अथवा संग्रहण का कोई वैकल्पिक अधिकृत प्रावधान लागू था या नहीं।
ग्रामीणों की मांग है कि सेनोस्फीयर से संबंधित टेंडर फाइल, तकनीकी और वित्तीय स्वीकृति, बिक्री रजिस्टर, स्टॉक रिकॉर्ड, गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट, चालान, भुगतान विवरण और आंतरिक ऑडिट रिपोर्ट की जांच कराई जाए। इन्हीं दस्तावेजों से संभावित राजस्व नुकसान की वास्तविक राशि का निर्धारण हो सकता है।
फर्जी बिल्टी से 500 से 1,000 किलोमीटर तक परिवहन दर्शाने का आरोप
राखड़ परिवहन को लेकर भी शिकायतकर्ताओं ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि कुछ मामलों में वास्तविक आपूर्ति की दूरी कम होने के बावजूद रिकॉर्ड में 500 से 1,000 किलोमीटर तक परिवहन दर्शाए जाने की आशंका है। एक ही वाहन के नाम पर 15 से 25 अलग-अलग नंबरों से ट्रिप दर्ज होने के आरोप भी लगाए गए हैं।
आंदोलनकारियों ने GPS लोकेशन, वाहन पंजीयन, परिवहन दूरी और भुगतान के रिकॉर्ड में संभावित अंतर की जांच की मांग की है। उनके अनुसार, कुछ मामलों में 60 से 80 टन राखड़ के हिसाब को लेकर भी सवाल हैं।
इन आरोपों की पुष्टि के लिए केवल बिल्टी या कंप्यूटर रिकॉर्ड देखना पर्याप्त नहीं होगा। संबंधित वाहनों के पंजीयन प्रमाणपत्र, चेसिस नंबर, इंजन नंबर, गेट पास, वे-ब्रिज की पर्चियां, टोल रिकॉर्ड, FASTag लेन-देन, GPS डेटा और वास्तविक डिलीवरी स्थल का मिलान किया जाना चाहिए। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि वाहन वास्तव में संबंधित मार्ग पर चले थे या नहीं, एक ही वाहन की पहचान का कहीं दोहराव हुआ या नहीं और भुगतान वास्तविक परिवहन के अनुरूप किया गया था या नहीं।
50 प्रतिशत हिस्सेदारी के आरोप, बैंक खातों की जांच की मांग
शिकायतकर्ताओं ने कुछ परिवहनकर्ताओं से कथित 50 प्रतिशत हिस्सेदारी और भुगतान में अनियमितता के आरोप भी लगाए हैं। इन दावों को प्रमाणित करने के लिए संबंधित अनुबंधों, भुगतान आदेशों, बिलों, बैंक लेन-देन और वित्तीय स्वीकृतियों की जांच जरूरी है।
आंदोलनकारियों ने अनंत वासने और संबंधित परिवहनकर्ताओं के बीच कथित मिलीभगत की जांच की मांग की है। हालांकि, केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता। किसी आर्थिक लेन-देन की वैधता या अवैधता संबंधित दस्तावेजों, साक्ष्यों और जांच के निष्कर्षों से ही तय हो सकती है।
यदि जांच के दौरान प्रथम दृष्टया अनियमित वित्तीय लेन-देन के प्रमाण मिलते हैं, तो सक्षम एजेंसी कानून के अनुसार संबंधित बैंक खातों और अन्य वित्तीय रिकॉर्ड की पड़ताल कर सकती है। मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड अथवा अन्य डिजिटल साक्ष्य की जांच भी लागू कानूनी प्रक्रिया और आवश्यक अनुमति के तहत की जानी चाहिए।
सतर्कता विभाग, CISF और प्रबंधन की निगरानी पर सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि NTPC जैसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान में परिवहन, प्रवेश-निकास, अनुबंध और भुगतान की निगरानी के लिए व्यवस्थाएं मौजूद हैं। ऐसे में यदि बिल्टी, वाहन नंबर या परिवहन दूरी में गड़बड़ी हुई, तो उसे रोकने और उसकी पहचान करने के लिए क्या कदम उठाए गए?
आंदोलनकारियों का दावा है कि संबंधित अधिकारियों और सतर्कता विभाग तक शिकायतें पहुंचाने के बावजूद उन्हें अब तक ठोस कार्रवाई की स्पष्ट जानकारी नहीं मिली है। वे NTPC प्रबंधन, सतर्कता विभाग, NHAI और बिलासपुर RTO से संबंधित रिकॉर्ड की भी जांच चाहते हैं।
यहां जांच का महत्वपूर्ण पहलू यह होगा कि शिकायतें कब प्राप्त हुईं, उनके आधार पर कौन-सी प्रारंभिक जांच हुई, किन अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई और यदि किसी स्तर पर अनियमितता सामने आई तो उस पर क्या कार्रवाई की गई। केवल स्थानांतरण को मामले का अंतिम समाधान मानने के बजाय संबंधित कार्यकाल के निर्णयों और दस्तावेजों की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए।
लारा NTPC की तर्ज पर सीपत में भी जांच की मांग
ग्रामीणों ने NTPC लारा में सेनोस्फीयर की नीलामी और बिक्री की व्यवस्था का हवाला देते हुए सीपत में भी व्यापक जांच की मांग की है। NTPC लारा से संबंधित वर्ष 2026 की सार्वजनिक नीलामी सूचना में सेनोस्फीयर के संग्रहण और बिक्री के लिए राखड़ तालाब की नीलामी का उल्लेख मिलता है। “https://www.tendersontime.com/india/details/auction-sale-cenosphere-auction-ash-ponds-harvesting-collection-and-sale-cenosphere-one-year-appro-8d14499/” (https://www.tendersontime.com/india/details/auction-sale-cenosphere-auction-ash-ponds-harvesting-collection-and-sale-cenosphere-one-year-appro-8d14499/)
हालांकि, लारा और सीपत की राखड़ प्रबंधन व्यवस्था, उपलब्ध मात्रा, अनुबंध की शर्तें तथा वित्तीय परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसलिए दोनों परियोजनाओं के दस्तावेजों की तुलना करके यह देखना जरूरी है कि सीपत में अपनाई गई प्रक्रिया NTPC की लागू नीति और वित्तीय नियमों के अनुरूप थी या नहीं।
ग्रामीणों की प्रमुख मांग है कि सेनोस्फीयर के टेंडर बंद होने के कारणों, राखड़ परिवहन के कार्यादेशों, बिल्टी, GPS डेटा, टोल रिकॉर्ड, वे-ब्रिज पर्चियों और भुगतान का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए। पर्याप्त आधार मिलने पर संबंधित वित्तीय और डिजिटल रिकॉर्ड की नियमानुसार जांच भी की जाए।
पांच माह से आंदोलन, अब जवाबदेही की मांग
ग्राम सुखरीपाली के ठाकुरदेवा के पास करीब पांच माह से आंदोलनरत ग्रामीणों का कहना है कि उनकी मांग किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध कार्रवाई तक सीमित नहीं है। वे चाहते हैं कि राखड़ परिवहन और सेनोस्फीयर की बिक्री से संबंधित पूरी व्यवस्था की जांच हो तथा अनियमितता प्रमाणित होने पर जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब NTPC के पास टेंडर, वित्तीय ऑडिट, सतर्कता और परिवहन निगरानी की व्यवस्थाएं हैं, तो शिकायतों के बाद जांच की स्थिति क्या है? सेनोस्फीयर की बिक्री का हिसाब, टेंडर बंद करने के निर्णय, राखड़ परिवहन के वास्तविक रिकॉर्ड और भुगतान का स्वतंत्र परीक्षण ही यह स्पष्ट कर सकता है कि कहीं NTPC को राजस्व नुकसान हुआ, परिवहन में अनियमितता हुई या शिकायतों के पीछे कोई अन्य तथ्य है।
यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो संबंधित अधिकारियों, ठेकेदारों और परिवहनकर्ताओं के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखने के लिए निष्पक्ष जांच ही सबसे प्रभावी रास्ता है।
