
पत्रकारिता से दूर हो चुके सदस्यों की सदस्यता की समीक्षा कब? नए पत्रकारों की अनदेखी और आपसी खींचतान से बिगड़ रहा प्रेस क्लबों का माहौलअनिल शुक्ला की रिपोर्टबिलासपुर। रायपुर प्रेस क्लब में सदस्यता नहीं मिलने के विवाद के बीच गोली चलने की घटना ने छत्तीसगढ़ के प्रेस क्लबों की सदस्यता व्यवस्था, आंतरिक लोकतंत्र और पत्रकारों के बीच बढ़ते मतभेदों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटना केवल एक प्रेस क्लब तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि प्रदेश के अन्य प्रेस क्लबों में सदस्यता प्रक्रिया और संगठनात्मक कार्यप्रणाली पर भी बहस की जरूरत को रेखांकित करती है।प्रदेश के विभिन्न प्रेस क्लबों में लंबे समय से सदस्य बने कुछ लोग अब सक्रिय पत्रकारिता से दूर हो चुके हैं। कई लोगों ने अपना पेशा बदल लिया है, कुछ दूसरे स्थानों पर चले गए हैं, तो कुछ राजनीति अथवा सरकारी सेवा से जुड़ चुके हैं। इसके बावजूद उनकी सदस्यता बरकरार रहने और समय-समय पर सदस्यता की समीक्षा नहीं होने को लेकर सवाल उठते रहे हैं। वहीं, पत्रकारिता के क्षेत्र में नए सिरे से काम कर रहे लोगों को सदस्यता देने के मामले में कथित उदासीनता की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।नए पत्रकारों के आवेदन पर विचार क्यों नहीं?प्रेस क्लब पत्रकारों के सामूहिक हित, संवाद और संगठनात्मक एकता के लिए बनाए जाते हैं। लेकिन जब किसी नए पत्रकार को सदस्यता के लिए बार-बार आवेदन करने के बाद भी स्पष्ट जवाब नहीं मिलता, अथवा उसके आवेदन पर विचार किए बिना उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से असंतोष पैदा होता है।सदस्यता के लिए निर्धारित नियम और पात्रता होना आवश्यक है, लेकिन उन नियमों का पालन पारदर्शी एवं समान रूप से होना भी उतना ही जरूरी है। यदि किसी आवेदन को अस्वीकार किया जाता है, तो उसके कारण स्पष्ट होने चाहिए। इसी तरह, लंबे समय से निष्क्रिय सदस्यों की स्थिति की समीक्षा के लिए भी निष्पक्ष व्यवस्था होनी चाहिए।लगातार उपेक्षा का अनुभव करने वाले लोगों में असंतोष बढ़ सकता है। हालांकि, किसी भी विवाद या हिंसक घटना को केवल सदस्यता नहीं मिलने का परिणाम मानना उचित नहीं होगा। ऐसे मामलों में वास्तविक कारणों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।बिलासपुर प्रेस क्लब में दो धड़ों की खींचतानरायपुर की घटना के बाद बिलासपुर प्रेस क्लब की आंतरिक स्थिति भी चर्चा का विषय बन रही है। यहां संगठन के भीतर दो गुटों के बीच मतभेद और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलने की बातें सामने आती रही हैं। विवाद केवल आपसी बातचीत तक सीमित रहने के बजाय शिकायतों और पुलिस तक पहुंचने की स्थिति भी बन चुकी है। एक-दूसरे के विरुद्ध एफआईआर दर्ज होने की बात भी सामने आई है।ऐसे हालात में प्रेस क्लब की एकजुटता और उसकी सार्वजनिक छवि पर सवाल उठना स्वाभाविक है। पत्रकारों के बीच आपसी मतभेद यदि लगातार बढ़ते रहें, तो इसका असर संगठनात्मक गतिविधियों, सामूहिक कार्यक्रमों और प्रेस कॉन्फ्रेंस जैसे आयोजनों में भी दिखाई दे सकता है।प्रेस क्लब का उद्देश्य पत्रकारों को एक साझा मंच उपलब्ध कराना है, न कि उन्हें अलग-अलग गुटों में बांटना। यदि संगठन के भीतर संवाद और विश्वास की कमी बनी रहती है, तो विवादों का समाधान कठिन होता जाएगा।‘रायपुर में गोली, बिलासपुर में गुटबाजी’—आखिर कब सुधरेगा माहौल?रायपुर की गोलीकांड की घटना और बिलासपुर प्रेस क्लब में जारी कथित गुटीय खींचतान को एक ही तरह की परिस्थितियों का परिणाम मानना जल्दबाजी होगी। फिर भी, दोनों घटनाक्रमों ने पत्रकार संगठनों में संवाद, पारदर्शिता और विवाद निपटारे की व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता सामने रखी है।सवाल यह भी है कि क्या प्रेस क्लबों में सदस्यता के लिए स्पष्ट और सार्वजनिक मानदंड हैं? क्या आवेदकों को उनके आवेदन की स्थिति बताई जाती है? क्या पुराने सदस्यों की सक्रियता और पात्रता की समय-समय पर समीक्षा होती है? और क्या संगठन के भीतर शिकायतों के समाधान के लिए निष्पक्ष व्यवस्था मौजूद है?इन सवालों पर गंभीरता से विचार किए बिना सदस्यता संबंधी विवादों और संगठनात्मक मतभेदों को दूर करना मुश्किल होगा।आम बैठक से निकल सकता है समाधानबिलासपुर प्रेस क्लब में मौजूदा तनाव को कम करने के लिए सभी सदस्यों और संबंधित पत्रकार साथियों की संयुक्त बैठक बुलाने की जरूरत महसूस की जा रही है। बैठक में सभी पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाए तथा शिकायतों, सुझावों और आपत्तियों पर आम सहमति से समाधान निकालने का प्रयास किया जाए।सदस्यता के स्पष्ट नियम, आवेदन प्रक्रिया में पारदर्शिता, निष्क्रिय सदस्यों की निष्पक्ष समीक्षा और विवादों के निपटारे की समयबद्ध व्यवस्था संगठन को मजबूत बना सकती है। किसी भी निर्णय में व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के बजाय निर्धारित नियमों और पत्रकारिता के हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।प्रेस क्लब पत्रकारों के लिए ऐसा साझा मंच होना चाहिए, जहां वे आपसी सम्मान के साथ बैठ सकें, जनहित के मुद्दों पर चर्चा कर सकें और जनता की आवाज को शासन-प्रशासन तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभा सकें।पत्रकारिता की ताकत उसकी एकजुटता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता में है। यदि पत्रकार संगठन ही आपसी विवादों में उलझे रहेंगे, तो इससे न केवल उनकी प्रतिष्ठा प्रभावित होगी, बल्कि सामूहिक हितों की आवाज भी कमजोर पड़ सकती है। इसलिए समय रहते संवाद और सहमति का रास्ता अपनाना ही समझदारी होगी।
