
बीके गायत्री दीदी* *सात दिवसीय राजयोग ध्यान शिविर में सिखाई परमात्मा से मन की बातें साझा करने की सहज विधि* *बिलासपुर, राज किशोर नगर :* जीवन में सुख हो या संकट, परमात्मा को अपना सच्चा साथी मानकर उनसे आत्मिक संबंध जोड़ना मन को शक्ति और शांति देता है। परमात्मा के सामने याचक बनने के बजाय स्वयं को उनकी संतान समझकर उनके गुणों और शक्तियों का अनुभव करना चाहिए। यह बात राजयोग शिक्षिका बीके गायत्री दीदी ने शिव-अनुराग भवन, राज किशोर नगर में आयोजित सात दिवसीय राजयोग ध्यान शिविर के सत्र में कही। *परिचय, संबंध, स्नेह और प्राप्ति से जुड़ता है परमात्मा से नाता* उन्होंने बताया कि परमात्मा को याद करने के चार आधार हैं—परिचय, संबंध, स्नेह और प्राप्ति। जब व्यक्ति परमात्मा को जानकर उनके साथ पिता, मित्र और मार्गदर्शक का संबंध जोड़ता है, तब उनकी याद सहज होने लगती है। उन्होंने कहा कि परमात्मा को अपना परमपिता मानकर उनसे शांति, प्रेम और शक्ति प्राप्त करने का अभ्यास करना चाहिए। *मुश्किल समय में भगवान देता है सहारा* जीवन की कठिन परिस्थितियों में परमात्मा के सहयोग को समझाने के लिए उन्होंने रेगिस्तान में पैरों के निशान का प्रेरक दृष्टांत सुनाया। एक व्यक्ति ने अपने जीवन की यात्रा में देखा कि सुख के समय चार पैरों के निशान थे, लेकिन कठिनाइयों के दौर में केवल दो निशान दिखाई दिए। उसने परमात्मा से शिकायत की कि संकट के समय वे साथ छोड़कर क्यों चले गए। परमात्मा ने समझाया कि वे निशान उसी के थे, क्योंकि कठिन समय में उन्होंने उसे गोद में उठाकर रखा था। इस दृष्टांत के माध्यम से उन्होंने विश्वास दिलाया कि परमात्मा की याद विपरीत परिस्थितियों में भी हिम्मत बनाए रखने का आधार बन सकती है। *आँखें खोलकर परमात्मा से करें मन की बात* राजयोग ध्यान की सहज विधि समझाते हुए बीके गायत्री दीदी ने बताया कि मेडिटेशन का अर्थ विचारों को पूरी तरह रोक देना नहीं है। आँखें खुली रखकर परमात्मा को याद करना और मन की बातें उनसे साझा करना भी राजयोग का महत्वपूर्ण अभ्यास है। उन्होंने इसे ‘रूह-रिहान’ अर्थात आत्मिक बातचीत के रूप में समझाया। व्यक्ति अपने मन की उलझनें, चिंताएं और भावनाएं परमात्मा के सामने रखकर मन को हल्का करने तथा सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने का अभ्यास कर सकता है।*प्रहलाद और मीराबाई के प्रसंगों से दिया संदेश* सत्र में भक्त प्रहलाद और मीराबाई के प्रसंगों के माध्यम से अटूट विश्वास, समर्पण और निष्कपट भक्ति का महत्व समझाया गया। उन्होंने कहा कि किसी का बुरा सोचने या करने के बजाय सभी के प्रति शुभभावना रखनी चाहिए। बच्चे की सहज प्रार्थना का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि परमात्मा से संबंध जोड़ने के लिए आडंबर से अधिक सच्चे भाव और सरल हृदय का महत्व है।
