
बिलासपुर। दीपावली का पर्व देशभर में हर्षोल्लास और उत्साह के साथ मनाया जाता है, लेकिन सिंधी समाज में दीपावली के साथ एक विशेष परंपरा जुड़ी हुई है, जिसे ‘हटड़ी पूजा’ के नाम से जाना जाता है। सिंधी समाज में इस पूजा का धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक दृष्टि से विशेष महत्व माना जाता है। महामाया विहार सिंधी कॉलोनी बिलासपुर निवासी मनीष गुरबानी ने बताया कि हटड़ी पूजा सिंधी समाज की हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति और परंपरा का अभिन्न हिस्सा है।उन्होंने बताया कि सिंधी समाज में मान्यता है कि दीपावली के अवसर पर हटड़ी की पूजा करने से व्यापार-व्यवसाय में बरकत आती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। यही वजह है कि व्यापारी वर्ग इस पूजा को विशेष श्रद्धा और उत्साह के साथ करता है। हटड़ी मंदिरनुमा स्वरूप में तैयार की जाती है, जिसमें माता लक्ष्मी सहित अन्य देवी-देवताओं को विराजमान किया जाता है। दीपावली से तीन दिन पहले से लेकर चांद रात तक इसकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।मनीष गुरबानी के अनुसार, सिंधी समाज में यह भी परंपरा है कि परिवार में जब किसी लड़के का जन्म होता है, तो उसकी पहली दीपावली पर उसके नाम से हटड़ी पूजा की जाती है। इसके पीछे मान्यता है कि आगे चलकर बच्चा व्यापार-व्यवसाय करेगा और माता लक्ष्मी की कृपा से उसके जीवन में तरक्की और समृद्धि आएगी।उन्होंने बताया कि सिंधी सभ्यता और संस्कृति का इतिहास लगभग 5000 वर्ष पुराना माना जाता है। पुरातात्विक स्थलों पर मिले अवशेषों में व्यापार से संबंधित वस्तुओं की मौजूदगी इस बात की ओर संकेत करती है कि प्राचीन सिंधु सभ्यता में व्यापार और व्यवसाय का महत्वपूर्ण स्थान था। उस समय भी सिंधी सभ्यता काफी विकसित थी।मनीष गुरबानी ने कहा कि आज सिंधी समाज पूरी दुनिया में फैला हुआ है, लेकिन अपनी संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं को आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहा है। हटड़ी पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और विरासत से जोड़ने का माध्यम भी है।उन्होंने समस्त भारतवासियों को दीपावली की शुभकामनाएं देते हुए माता लक्ष्मी से सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और खुशहाली की कामना की
।जय झूलेलाल।
