
#गुजरात के एक टोल पर कानून के रखवालों ने कमाई का ऐसा ‘टू-इन-वन’ मॉडल निकाला कि कॉरपोरेट वाले भी सिर पकड़ लें। स्कीम सीधी थी—ट्रक रोको, ड्राइवर की जेब से ₹300 का ‘टैक्स’ निकालो, गाड़ी का फोटो खींचो और मुस्कुराकर जाने दो। ट्रक वाला राहत की सांस लेकर आगे बढ़ा नहीं कि मोबाइल पर ई-चालान का मैसेज टनटना गया! यानी नगद सेवा शुल्क अलग और सरकारी रसीद का फटका अलग।अब ड्राइवरों को जब समझ आया कि उनका तो दोनों तरफ से ‘मुंडन’ हो गया, तो सबने गाड़ियां घुमाईं और आ धमके वसूली केंद्र पर। सीधा सवाल दागा—‘जब तीन सौ गांधी छाप नोट जेब में रख लिए, तो चालान का प्रसाद क्यों परोसा?’ सिपाही जी ने तुरंत जिम्मेदारी की गेंद बड़े साहब के पाले में फेंक दी—‘हम तो छोटे प्यादे हैं, बड़े साहब से बात करो’ड्राइवर ने बड़े साहब को फोन मिलाया, तो साहब भारी आवाज में कानून का पाठ पढ़ाने लगे—‘गलती करोगे तो चालान तो कटेगा ही!’ पर जैसे ही ड्राइवर ने बम फोड़ा कि ‘साहब, आपके चेले ने 300 रुपये की दक्षिणा भी तो डकार ली है’, साहब ने बिना एक सेकंड गंवाए कॉल डिस्कनेक्ट कर दी। सारा ज्ञान एक झटके में 4G नेटवर्क की तरह उड़ गया।इधर फोन कटते ही सिपाही जी का शेर वाला तेवर भीगी बिल्ली में बदल गया। फौरन ड्राइवर को केबिन के कोने में ले जाकर हाथ-पैर जोड़ने लगे—‘भाई, हम गरीब आदमी हैं, पैसे वापस ले लो पर वीडियो डिलीट कर दो, वरना नौकरी की लुटिया डूब जाएगी!’ पर ड्राइवर भी पक्का निकला, उसने साफ सुना दिया—‘पहले घूस के पैसे वापस करो, चालान रद्द करने की बात कबूलो और गाड़ियों के सारे फोटो डिलीट करो, उसके बाद ही कैमरे का शटर गिरेगा।’अब सोचिए, जो खाकी वाले कुछ मिनट पहले तक कानून की लाठी भांजकर अवैध वसूली कर रहे थे, वो मोबाइल का कैमरा ऑन होते ही खुद को ‘गरीब’ घोषित कर रहम की भीख मांगने लगे। वसूली का यह ‘अमृत महोत्सव’ देखकर तो यही लगता है कि चालान कटे न कटे, इनकी हरकतों का मीटर कभी डाउन नहीं होगा
