
त्योहार भारतीय जीवन की आत्मा हैं। वे केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा, परिवार, सामाजिक सरोकार और आध्यात्मिक चेतना से जुड़े अवसर हैं। दीपावली हो, धनतेरस हो, दशहरा हो, होली हो अथवा कोई अन्य पर्व – इनका मूल उद्देश्य मनुष्य के भीतर आनंद, सद्भाव, दया, परस्पर सहयोग और सकारात्मकता का प्रकाश जगाना रहा है। लेकिन आज धीरे-धीरे त्योहारों का स्वरूप बदलता जा रहा है। उत्सव की जगह उपभोक्तावाद और आवश्यकता की जगह दिखावे ने अपना स्थान बनाना शुरू कर दिया है। दीपावली के अवसर पर बिलासपुर के बाजारों का दृश्य इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। सदर बाजार, गोल बाजार, शनिचरी बाजार, तेलीपारा, हटरी चौक, श्री राम क्लॉथ मार्केट, राजीव प्लाजा मार्केट, सरकंडा राजकिशोर नगर मार्केट,बुधवारी मार्केट, बृहस्पति बाजार, तेलीपारा मार्केट वही बड़े-बड़े मॉल और शहर के अन्य व्यापारिक क्षेत्रों में इन दिनों खरीदारी की विशेष चहल-पहल है। प्रशासन को भीड़ को देखते हुए यातायात के लिए वन-वे, डायवर्जन, नो-पार्किंग और पार्किंग की विशेष व्यवस्था करनी पड़ी है। दुकानदारों को भी सड़क पर सामान फैलाकर आम लोगों की आवाजाही बाधित न करने की हिदायत दी गई है। यह बाजार की जीवंतता और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए निश्चित रूप से अच्छी बात है। त्योहारों में व्यापार बढ़ता है, दुकानदारों की आय होती है, कारीगरों और छोटे कारोबारियों को काम मिलता है तथा हजारों परिवारों की आजीविका इससे जुड़ी होती है। इसलिए व्यापार का विरोध नहीं, बल्कि विवेकहीन उपभोग का विरोध आवश्यक है। आज विज्ञापन हमारी इच्छाओं को आवश्यकता में बदलने की कला जानते हैं। मोबाइल पर विज्ञापन आया, नई टीवी ले लीजिए। दूसरा संदेश आया, फ्रिज बदल डालिए। कहीं एक्सचेंज ऑफर, कहीं कैशबैक, कहीं आसान ईएमआई, कहीं निश्चित उपहार। बिलासपुर के इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार में इस वर्ष 56 दुकानों से लगभग 50 करोड़ रुपये के त्योहारी कारोबार का अनुमान भी सामने आया है। आकर्षक छूट और एक्सचेंज योजनाएं ग्राहकों को खरीदारी के लिए प्रेरित कर रही हैं। लेकिन यहां एक सवाल प्रत्येक परिवार को स्वयं से पूछना चाहिए – क्या हमें वास्तव में उस वस्तु की आवश्यकता है? अक्सर उत्तर होता है….नहीं। फिर खरीदारी क्यों? क्योंकि पड़ोसी ने खरीद लिया। रिश्तेदार ने नया मोबाइल ले लिया। मित्र के घर नया टीवी आ गया। किसी ने नई कार खरीद ली। सोशल मीडिया पर किसी ने नया घर, नया फर्नीचर या महंगा सामान दिखा दिया। और हमारे भीतर एक अदृश्य प्रतिस्पर्धा जन्म ले लेती है- “उसने खरीदा तो मैं क्यों नहीं खरीदूं?” यहीं से उपभोक्तावाद का चक्र शुरू होता है। त्योहार पर घर में खुशी आने के बजाय कई बार क्रेडिट कार्ड का बिल, कर्ज की किस्त और आर्थिक तनाव प्रवेश कर जाता है। जिस दीपावली में घर के बुजुर्गों के चरण छूने, बच्चों के साथ दीप जलाने और जरूरतमंद के घर मिठास पहुंचाने की परंपरा थी, वहां यदि हमारी सारी ऊर्जा केवल महंगे सामान खरीदने और दूसरों से आगे दिखने में लग जाए तो हमें अपने उत्सव के अर्थ पर पुनर्विचार करना चाहिए। लक्ष्मी पूजा का अर्थ केवल धन प्राप्ति की कामना नहीं है। लक्ष्मी के साथ स्वच्छता, सदाचार, श्रम, संयम और विवेक को जोड़ना हमारी परंपरा रही है। धन तभी मंगलकारी है जब वह जीवन में संतुलन और सुख लाए। यदि धन कमाने या खर्च करने की होड़ में परिवार का बजट बिगड़ जाए, किसी गरीब की जरूरत अनदेखी हो जाए अथवा मनुष्य नशे, जुए और दिखावे में फंस जाए तो वह समृद्धि नहीं, आत्मविनाश का रास्ता है। विशेषकर त्योहारों के अवसर पर जुआ और नशे को सामाजिक प्रतिष्ठा का हिस्सा बनाना अत्यंत खतरनाक प्रवृत्ति है। कुछ लोग इसे परंपरा या मनोरंजन कहकर उचित ठहराने का प्रयास करते हैं, लेकिन जुए की आदत परिवार की आर्थिक नींव तक हिला सकती है और नशा स्वास्थ्य, संबंध तथा सामाजिक जीवन को नष्ट कर सकता है। त्योहार का आनंद ऐसा क्यों हो जिसके बाद किसी घर में कलह, कर्ज या पछतावा जन्म ले? हमें अपने बच्चों को भी त्योहार का वास्तविक अर्थ समझाना होगा। उन्हें यह बताना होगा कि दीपावली का अर्थ केवल नए कपड़े, पटाखे और महंगी खरीदारी नहीं है। एक दीपक किसी जरूरतमंद के घर जलाना, किसी बुजुर्ग का सम्मान करना, किसी गरीब परिवार की मदद करना, स्थानीय कारीगर से मिट्टी के दीये खरीदना और परिवार के साथ प्रेम से समय बिताना भी दीपावली है। त्योहारों में स्थानीय व्यापार को बढ़ावा देना भी हमारी जिम्मेदारी है। बिलासपुर के छोटे दुकानदार, कुम्हार, हस्तशिल्पी, फूल विक्रेता, मिठाई व्यवसायी और छोटे उद्यमी भी इसी त्योहारी अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। इसलिए खरीदारी करें, लेकिन जरूरत के अनुसार करें; स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दें; गुणवत्ता और कीमत की तुलना करें और केवल विज्ञापन देखकर निर्णय न लें। व्यापारियों की भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी है। ग्राहक को आकर्षित करना व्यापार का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन भ्रम पैदा करने वाले विज्ञापन, अनावश्यक खरीद के लिए दबाव, छिपी हुई शर्तें और कृत्रिम आकर्षण से बचना चाहिए। त्योहार व्यापार बढ़ाने का अवसर अवश्य है, लेकिन व्यापार में विश्वास सबसे बड़ी पूंजी है। और आम नागरिकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। हमें खरीदारी से पहले तीन प्रश्न स्वयं से पूछने चाहिए..?क्या यह वस्तु आवश्यक है? क्या इसे खरीदना हमारी आर्थिक क्षमता में है? क्या इसके बिना हमारा जीवन वास्तव में अधूरा है? यदि तीनों का उत्तर संतोषजनक नहीं है तो केवल दिखावे के लिए खरीदारी टाल देना ही समझदारी है। त्योहार का सबसे सुंदर रूप वह है जिसमें हमारी खुशी किसी दूसरे के दुख का कारण न बने। हम पटाखे चलाएं तो पर्यावरण और बुजुर्गों का ध्यान रखें, मिठाई बांटें तो जरूरतमंद को भी याद रखें, पूजा करें तो आचरण में भी शुचिता लाएं, खरीदारी करें तो फिजूलखर्ची से बचें और उत्सव मनाएं तो पड़ोसी की शांति तथा समाज की सुविधा का भी ध्यान रखें। बिलासपुर जैसे तेजी से विकसित होते शहर में बाजार की चमक और आर्थिक गतिविधियां आवश्यक हैं। लेकिन विकास का अर्थ केवल बढ़ती बिक्री नहीं, बल्कि बढ़ती सामाजिक संवेदना भी है। जिस शहर में एक परिवार लाखों रुपये केवल दिखावे पर खर्च करे और उसी शहर में कोई परिवार इलाज, शिक्षा या भोजन के लिए संघर्ष करे, वहां उत्सव की सार्थकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।आइए, इस बार त्योहार पर एक छोटा-सा संकल्प लें , खरीदेंगे जरूर, लेकिन सोच-समझकर; खर्च करेंगे, लेकिन आवश्यकता के अनुसार; लक्ष्मी की पूजा करेंगे, लेकिन जुआ और नशे से दूर रहेंगे; सबके साथ अपनी खुशियां मिल बैठकर त्योहार मनाए संकरण विचारों को त्याग दें क्या हिंदू क्या सिख मुस्लिम सिख ईसाई हम हैं भाई भाई.. बस इसी प्रेम भाव से सामंजस्यपूर्ण भाव के साथ पूरी पूरी सहिष्णुता के साथ पर्वों की खुशियां मनाएंगे, लेकिन किसी दूसरे को कष्ट देकर नहीं। यही मानव और मानवता धर्म का सार है। वही फिजुलखर्ची से बचते हुए मितव्ययिता में त्यौहार मनाएं क्योंकि असली समृद्धि घर में रखे सामान की मात्रा से नहीं, घर में बसे सुख, शांति, संतोष और प्रेम से मापी जाती है। दीपावली का सबसे बड़ा दीप वही है जो हमारे भीतर के लोभ, दिखावे और स्वार्थ का अंधेरा मिटाकर मानवता का प्रकाश जला दे।- सुरेश सिंह बैस शाश्वत- वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, अधिवक्ता – बिलासपुर छत्तीसगढ़
