पूज्य गुरूजी (गोलवलकर) की जीप के आगे आगे मोटरसाइकिल पर पायलट बना आज का “भारतरत्न”, देश विभाजन के समय का बीस वर्ष का वह लड़का, लाल कृष्ण आडवानी, जिसने कराची में दस सहस्त्र स्वयंसेवकों को संगठित कर लाखों हिंदुओं कै प्राण बचा लिए, सहस्त्रों हिंदू महिलाओं और बच्चियों की इज्ज़त लुटने से बचा ली।
किसी को किंचित भी संदेह नहीं होना चाहिए कि आज भारतीय जनता पार्टी का विश्व के सबसे बड़े राजनैतिक दल के रूप में जो स्थान है उसका सर्वाधिक श्रेय यदि किसी को दिया जाना चाहिए तो वह हैं, लालकृष्ण आडवानी जिनके प्रयासों विशेषकर “सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा” ने भाजपा को लोकसभा में “दो से दो सौ” की छलांग लगवाई थी। आज उन्हें “भारत-रत्न” से सम्मानित किया जाना उचित कदम है, उन्हें एक कुशल संगठनकर्ता, राजनेता, उप-प्रधानमंत्री, गृहमंत्री के रूप में सरदार पटेल के पश्चात एक और लौह-पुरुष मानने वाले हम जैसे प्रशंसक न केवल प्रसन्न हैं अपितु स्वयं को सम्मानित अनुभव कर रहे हैं।
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देश को कांग्रेसी-वामपंथी इतिहास के छद्म पन्नों में छुपाई एक लोमहर्षक कथा जानना अत्यावश्यक है जिसमें कराची और सिंध के हिंदुओं को नेहरु-गांधी ने दंगों की लपटों के बीच जब भगवान भरोसे छोड़ दिया था तब ५ अगस्त १९४७ को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक प्रातः स्मरणीय गुरु गोलवलकर (गुरूजी) अपने प्राणो की बाजी लगाकर कराची पहुंचे और वहाँ की मुख्य सड़कों पर पथ संचलन निकालकर हिंदुओं को सुरक्षा का भरोसा दिया।
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सिंध का संपूर्ण क्षेत्र १८४३ में ब्रिटिश आधीन में आने के पश्चात “बॉम्बे प्रेसीडेंसी” में जोड़ दिया गया | १९४७ के पूर्व सिंध की लगभग ५४ लाख की जनसंख्या में दो तिहाई मुसलमान और एक तिहाई हिंदू थे। जहाँ मुसलमान ग्रामीण क्षेत्र में बहुसंख्यक किसान थे वहीं हिंदुओं का व्यापारिक वर्चस्व था और उनकी बड़ी जनसंख्या नगरीय क्षेत्र में निवास करती थी । पाकिस्तान के सबसे बड़े नगर कराची में हिंदू और मुसलमानों में प्रत्येक की जनसंख्या एकदम बराबर बराबर ४८-४८% थी, शेष ४% जनसंख्या पारसियों एवं ईसाइयों की थी।
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दूसरे सबसे बड़े नगर हैदराबाद में ७०% जनसंख्या हिंदुओं की थी| अन्य तीन बड़े नगरों में भी हिंदू ही बहुसंख्यक थे। सिंध के दक्षिण पूर्व में राजस्थान और गुजरात से सटे उमरकोट, नगर परकर, मिठी और चाचड़ो जिलों की कुल जनसंख्या में से ५७% हिंदुओं की थी। इससे पूर्ण स्पष्ट है कि यदि कांग्रेस और इसके नेतागण अड़ जाते तो दक्षिण और पूर्वी सिंध के कराची, हैदराबाद, उमरकोट, नगर परकर, मिठी और चाचड़ो जिलों को भारत का सिंध प्रांत बनाया जा सकता था। इन स्थानों के मुस्लिम पाकिस्तानी सिंध में चले जाते और पाकिस्तानी सिंध से हिंदू आकर इन क्षेत्रों में बस जाते और इस प्रकार सांस्कृतिक अलगाव तो बच जाता।
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भारत–पाक विभाजन के समय चालीस लाख हिंदुओं का सिंध से पलायन हुआ| अगस्त १९४७ आते आते लूटपाट, मारकाट सिंध और कराची में चरमसीमा पर पहुँच गयी। ऐसे में जब किसी का साहस कराची में जाकर हिंदुओं को प्रेरित करने का नहीं था तब एक महापुरुष अपनी प्राणों की बाजी लगाकर वहाँ पहुँच गए । ५ अगस्त १९४७ दोपहर बारह बजे का समय था। अशांत कराची हवाईअड्डे के बाहर एक अलग प्रकार की ही हड़बड़ी दिखाई पड़ रही थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरूजी) टाटा एयरसर्विस के विमान से बंबई से कराची आने वाले थे।
इस बहुत अशांत और दंगाई वातावरण में भी संघ के स्वयंसेवकों का मनोबल अपने चरम पर था | पुलिस पर भरोसा न करते हुए गुरूजी की सुरक्षा की पूरा उत्तरदायित्व स्वयंसेवकों ने ही उठा रखा था। जब यह जानकारी आई कि गुरूजी कराची आने वाले हैं, स्वयंसेवकों में एक उत्साह की लहर दौड़ गयी। *सहस्त्रों हिंदुओं के घरों में जाकर उन्हें निजी रूप से ढाढस बंधाने और दस सहस्त्र युवा स्वयंसेवकों को संगठित करने का बीड़ा उठा रखा था एक बीस वर्ष के नवयुवक ने, जिसे हम लालकृष्ण आडवानी के नाम से जानते हैं।
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ठीक एक बजे गुरूजी का विमान कराची हवाईअड्डे पर उतरा, स्वयंसेवक पूर्ण रुप से जागरूक और चौकन्ने थे। अनेक स्वयंसेवक तो बुर्का पहने छद्मवेश में हवाईअड्डे के चारों ओर फैले हुए थे। हवाईअड्डे पर ही भारत माता की जय के नारे लगने लगे। लालकृष्ण के नेतृत्व में सैकड़ों अनुशासित स्वयंसेवकों के कड़े पहरे के बीच गुरूजी का काफिला खुली जीप में कराची नगर की ओर चल पड़ा। जीप के आगे पीछे मोटरसाइकिलों पर भगवाझंडे लहराते स्वयंसेवकों की कतारें चल रही थीं। तीन बजे कराची की हर प्रमुख गली, हर सड़क पर स्वयंसेवकों ने पूर्ण गणवेश पहनकर पथ संचलन किया। लाठियों से लैस दस सहस्त्र स्वयंसेवकों का यह पथ संचलन “भारत माता की जय” के नारे लगाता हुआ पांच बजे कराची के मुख्य चौराहे पर पहुँच गया जहाँ गुरूजी ने एक विशाल आमसभा को संबोधित करते हुए सभी हिंदुओं को आश्वस्त एवं आह्वान किया कि वे निर्भय होकर हिंदुस्थान की ओर प्रस्थान करें| संघ के स्वयंसेवकों को निर्देश दिया कि वे बस अड्डों, रेल स्टेशनों और हवाईअड्डे की न केवल निगरानी करें अपितु विस्थापितों की सुरक्षा का दायित्व भी उठायें | बंबई, दिल्ली,अहमदाबाद जैसे बड़े नगरों में संघ की निगरानी में शिविरों को लगा दिया गया। भोजन आवास की व्यवस्था में लाखों स्वयंसेवकों ने तन, मन और धन से योगदान किया।
भारत माता की जय और वंदेमातरम् के उद्घोषों से कराची ही नहीं सिंध के सभी नगर गुंजायमान होने लगे। पूज्य गुरूजी के विभाजन या स्वतंत्रता के मात्र दस दिन पूर्व हुए इस साहसिक दौरे ने न केवल स्वयंसेवकों को दिशा दिखाई अपितु हिंदुओं में जैसे नवीन प्राणों का संचार कर दिया। भारत के सबसे बड़े नगरों में से एक कराची और हैदराबाद जैसे अन्य नगर कलकत्ता और नोआखाली बनने से बच गये। लाखों हिंदू सुरक्षित भारत आ सके सहस्त्रों हिन्दुओं के प्राण, सहस्त्रों महिलाओं की इज्जत लुटने से बच गयी। आदरणीय आडवानी जी को भारत-रत्न से सम्मानित किये जाने पर हार्दिक बधाई| भगवान उन्हें स्वस्थ और सुखी रखें|