विजय की कलम
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कुछ समय पहले एक फिल्म आई थी अनिल कपूर और अमरीश पुरी की अनिल कपूर एक ईमानदार पत्रकार थे और अमरीश पुरी एक राज्य के मुख्यमंत्री थे कहते हैं कि यह फिल्म महाराष्ट्र के राजनीतिक किसी के जीवन पर बनी है पर हकीकत क्या है हमें नहीं पता पर उस फिल्म में जिस तरह एक पत्रकार एक दिन का मुख्यमंत्री बनता है एक वर्तमान मुख्यमंत्री से इंटरव्यू लेते हुए चैलेंज करता है मुख्यमंत्री पत्रकार की चैलेंज को स्वीकार करके वह एक दिन का मुख्यमंत्री बनता है और एक दिन में ही इतने कार्य कर लेता है कि वह जनता का नायक बन जाता है और बाद में ऐसी घटनाएं घटती हैं कि वह सच में 5 साल का मुख्यमंत्री बन जाता है और प्रदेश का चौमुखी विकास करता है जनता खुश होती है और उसे अपना नायक घोषित करती है यह तो फिल्मी कहानी थी पर छत्तीसगढ़ में होने वाले नगर निगम चुनाव में भी कई सारी
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कहानियां धीरे-धीरे सामने आ रही हैं और धीरे-धीरे किरदार व कई घटनाएं घट रही हैं ऐसी ही घटना बिलासपुर में हल्ला मचा रही है दोनों राष्ट्रीय पार्टियों ने अपने-अपने महापौर के नाम की घोषणा कर ली है बिलासपुर से प्रमोद नायक को कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बनाया है पर विगत कई सालों से कांग्रेस पार्टी के निष्ठावान, ईमानदार व जुझारू और जमीनी स्तर से, जनता से जुड़ा हुआ व्यक्ति एक कार्यकर्ता त्रिलोक श्रीवास जो आज किसी नाम का मोहताज नहीं है बच्चे से बच्चा उन्हें अच्छी तरह जानता है पहचानता है क्योंकि वह नेता नहीं बल्कि एक सच्चा ईमानदार कार्यकर्ता है अपने ईमानदारी के बल पर ही वह आगे बढ़ा है व सेवा कार्य करते रहता है सत्ता पार्टी की हो या ना हो जनता का वह सेवक हमेशा बना रहता है पर हर बार की तरह जब भी समय आता है टिकट का चाहे वह विधायक की हो अथवा महापौर की हो उसका पत्ता क्यों काटा जाता है ?
यह सोचने वाली बात है क्या पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को यह दिखाई नहीं देता है ? यह समझ नहीं है कि इतना पुराना और ईमानदार लोकप्रिय जनता से जुड़ा हुआ पार्टी का कार्यकर्ता को हम टिकट दें ताकि इसे अनेक कार्यकर्ताओं में भी जोश आएगा ? वह सीट तो पार्टी जीतेगी जीतेगी साथ में एक अच्छा संदेश भी जाएगा जो जनता सोचे या हम सोचे वही हो जाए तो फिर राजनीति का मतलब ही नहीं रह जाएगा,
इसे ही तो राजनीति कहते हैं जो हर किसी को समझ में नहीं आती है सुबह को कुछ होती है, तो रात को कुछ होती है, दिन को कुछ होती है, तो शाम को कुछ होती है. पल-पल में राजनीति होती है यही वह लड़ाई है जिसमें अपना कोई भाई-भाई नहीं है
(कांग्रेस ने तो अपने नायक को चुन लिया असली नायक तो जनता का त्रिलोक श्रीवास है,)
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जनता के भरोसे को साथ में लेकर कसम खाई है कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर नामांकन जमा करने जाना है अभी तो यह अंगड़ाई है आगे और बहुत लड़ाई है अब देखना यह है कि आगे क्या होता है क्या त्रिलोक को पार्टी बी फार्म देती है या त्रिलोक निर्दलीय चुनाव लड़ते हैं ? यह तो समय ही बताएगा पर इस बार का चुनाव बड़ा ही दिलचस्प होगा,
जो भी होगा इसमें ही बिलासपुर का भला होगा
(संपादकीय)