
नारी तुम श्रद्धा सुमन,
विश्वास जीवन पग स्वर्ण चरण।
पुष्प चमन में सुवास बनकर,
गंगा सी पवित्र पावन अमृतांजन।।१
भानु उदित कल्पना तरंग
अशोक युक्त किरण उमंग
प्रकाश बिखेरती नमो वंदना,
विजय बनाती ज्योति अंतर्मन।।२
देवों की जय, पराजय निशाचर
संघर्ष जीवन मन का प्रतिबिंब।
नित प्रतिदिन जूझती तुम
स्वयं का स्वयं से अंतर्द्वंद्व।।३
आंचल भीगा अश्रु से ,
पर मन पावन निर्मल।
नारी जीवन रेखा से,
मनु जीवन की हलचल।।४
कोमल वरदान प्रकृति का,
सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति तुम।
अनंत अभिलाषा सृष्टि की,
स्वप्न हकीकत करती तुम।।५
देवी सृष्टि की चितचोर,
शालीनता की आकृति तुम।
चंचल किशोरी आकर्षण घनघोर
जीवन की आलोकमयी रेखा तुम।।६
डॉ. विजय पाटिल
शिक्षक सह साहित्यकार
सेंधवा जिला बड़वानी मप्र