रायपुर :- आज़ कभी खेती-किसानी के अविभाज्य अंग रहे बैलों के पूजन का दिवस है। उस मूक अन्नदाता के कष्ट, समर्पण, त्याग के स्मरण का दिन है।
पोला त्योहार की मूल पहचान
पोला छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और विदर्भ में खासकर किसानों का त्योहार है। यह बैलों और खेतिहर पशुओं को समर्पित होता है।
बैलों से किसानों का गहरा नाता है और पोला पर्व एक तरह से खेती कार्य में सहयोग के लिए इन बैलों के प्रति आभार व्यक्त करने का दिन है। इसे कृषि और पशुधन का आभार दिवस भी कहा जाता है। इसीलिए पोला त्यौहार में बैलों की पूजा की जाती है।
छत्तीसगढ़ के किसानों का लोकप्रिय त्यौहार पोला भी है। इस त्यौहार में मिट्टी से बने नांदिया बैल का खास महत्व होता है। किसान बैल के साथ-साथ अपने ईष्ट देवी-देवता की पूजा-अर्चना कर अच्छी फसल की कामना करते हैं। छोटे-छोटे बच्चे मिट्टी से बने बैल तथा लड़़कियां मिट्टी के बर्तनों से खेलती हैं।
भारत एक कृषि प्रधान देश है और कुछ वर्षों पूर्व तक हमारा कृषि कार्य पूर्ण रुपेण बैल, मवेशी इत्यादि पशुधनों पर निर्भर था। बैलों का यातायात व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। हमारे किसान भाई तो हज़ारों सालों से बैलों को हाँक कर सो जाते है और नींद खुलने पर बैलगाड़ी को अपने गंतव्य स्थान पर खड़ी पाते है। पोला त्यौहार को भगवान भोलेनाथ की सवारी नंदी बैल से भी जोड़़कर देखा जाता है। पुरातन काल से बैल को भगवान भोलेनाथ की सवारी माना जाता है।
मेरा भोला है भंडारी, करे नंदी की सवारी
वर्तमान बदलते आधुनिक युग में संसाधनों के मशीनीकरण से मानव जीवन में बहुत सारे बदलाव हुए है और कृषि क्षेत्र भी इससे अछूता नही रहा है। वर्तमान बदलते परिवेश में जब खेती किसानी के कार्य में मशीनों का प्रयोग बहुतायत में होने लगा है, पर तब भी हम कृषि कार्य में बैलों के महत्व को नकार नही सकते है। यह मूक प्राणी बैल किसान के कंधे से कंधा मिलाकर सदियों से जुतता रहा है।
पोला मूलत: खेती-किसानी से जुड़ा त्योहार है। पोला त्योहार भादो माह की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। इस दिन बैलों का श्रृंगार कर उनकी पूजा की जाती है। बच्चे मिट्टी के बने बैल चलाते है। रंग-बिरंगे बैलों (नान्दिया बैल) की पूजा होती है। सुस्वादु ठेठरी (नमकीन तला बेसन), खुर्मी (गुड) पकवान बनता है। शाम को रंगों से पुते बैलों का दौड़ प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाता है। और इस दिन बैलों से कोई काम भी नहीं कराया जाता है। और घरों में महिलाएं व्यंजन बनाती हैं।
हमारा छत्तीसगढ़ कृषि प्रधान प्रदेश है, इसीलिए यहां के किसान खेत से जुड़े सभी कृषि यंत्रों और जीव-जन्तुओं का सम्मान कर उसकी पूजा करते है। हरेली में जहां कृषि यंत्रों की पूजा की जाती है वहीं पोला में बैलों की पूजा की जाती है। बैल खेतों में सबसे अधिक मेहनत करने वाला प्राणी है इसलिए पोला के दिन किसान इनकी पूजा करते है।
छत्तीसगढ़ की संस्कृति में खान-पान की विशिष्ट़ और दुर्लभ परंपराएं है, जो मौसम और तीज-त्यौहार के मुताबिक सामने आती है। छत्तीसगढ़ के सभी पर्व में अलग-अलग पकवान बनाने की परंपरा है। हरेली में जहां गुड़ का चीला बनाने की परंपरा है तो पोला में विशेष तौर पर खुरमी और ठेठरी बनाने का रिवाज है। “खुरमी” गेहूं तथा चावल के आटे के मिश्रण से निर्मित मीठी प्रकृति का लोकप्रिय पकवान है, जबकि “ठेठरी” लम्बी या गोल आकृति वाला यह नमकीन व्यंजन बेसन से बना एक पकवान है। इसमें अजवाइन मिला देने से स्वाद दोगुना बढ़ जाता है और सुपाच्य भी हो जाता है। जब भाई, बहन के घर उसे तीजा लेने जाता है तो वह भेंट स्वरुप में इसी ठेठरी-खुरमी को ले जाता है।
सावन के महिना पवन करे शोर,
ठेठरी खुरमी लेके भैया आवत हो ही मोर।
खेती में सबसे ज्यादा योगदान देने वाले जानवर बैल को सम्मान देने के लिए उनकी पूजा करने के लिए इस दिन को मानते हैं। साल भर खेतों में काम करने वाले बैलों को स्नान करवाकर, सजाकर, उनकी तिलक लगाकर पूजा करके और पूरन पोली खिलाकर इसका जश्न मनाया जाता है।
पोला तिहार किसानों का खेती किसानी से जुड़ा सबसे बड़ा त्योहार है। यह हमारे जीवन में खेती-किसानी और पशुधन का महत्व बताता है। इस दिन घरों में उत्साह से बैल और जाता-पोरा की पूजा कर अच्छी फसल और घर को धन-धान्य से परिपूर्ण होनेे के लिए प्रार्थना की जाती है। यह छत्तीसगढ़ की परम्परा, संस्कृति और लोक जीवन की गहराइयों से जुड़ा पर्व है। पोला का त्यौहार हमारी संस्कृति और परम्पराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाता हैं। पोला के दिन मिट्टी के बर्तन और बैलों से खेलकर बच्चे अनजाने ही अपनी मिट्टी और उसके संस्कारों से जुड़ जाते हैं। अगली पीढ़ियों तक अपनी समृद्ध संस्कृति को पहुंचाने और उन्हें जमीन से जोड़े रखने के लिए पारंपरिक त्योहारों का संरक्षण और संवर्धन अवश्यक है।
यह त्यौहार मवेशियों, खास तौर पर बैलों को कृषि में उनके योगदान के लिए सम्मानित करता है। अनुष्ठानों में बैलों को नहलाना और उन्हें अनाज, दाल और गुड़ से सजाना शामिल है।
छत्तीसगढ़ में पारंपरिक पर्व ‘पोला’ तिहार बैलों की पूजा करके खेती-किसानी में योगदान के लिए सम्पूर्ण गौ-वंश के प्रति सम्मान और आभार प्रकट करने का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है।
आज़ पोला पर्व उस मूक अन्नदाता के कष्ट, समर्पण और त्याग के स्मरण का दिन है, हम आपकी थाली में आज आया भोजन भी सुदूर देहात में किसी मूक प्राणी की मेहनत से आया है। उसके कष्टों को याद रखें। आपके जीवन में भी कोई पशुधन होगा जिसने आपका जीवन सुखद बना रखा है। संसार के ऐसे सभी बैलों को याद रखने का दिन आप सभी को पोला महोत्सव की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
संकलन एवँ साभार प्रस्तुति:-
इन्दू गोधवानी..रायपुर..✍️ 9425514255