जब भगवान ने सृष्टि की रचना की तो सर्वप्रथम पांच मूलभूत तत्वों *पृथ्वी - जल - अग्नि - वायु - आकाश* से सुंदर प्रकृति का निर्माण किया । सुंदर नदियां - झरने - तालाब - विशाल महासागर - ऊंचे पहाड़ - नज़ारो - रेगिस्तान - हरे भरे जंगली पेड़ पौधे रंग - बिरंगे फूल न जाने कितने रंग रूपों से इस पृथ्वी को सुसज्जित किया । अनेक सुंदर कृतियों के माध्यम से सृष्टि को विविधता प्रदान की ।
कहते हैं ” इंसान ” भगवान की बनाई हुई ,सबसे सुंदर कृति है । पूर्व जन्मों के कर्म फलों से प्रारब्ध अनुसार इंसान की भूमिकाएं ईश्वरीय विधान से तय की हुई है ।
हमारे धर्मपुराणो में अनेका – अनेक पर्व , उत्सव – त्यौहार आदि बड़े हर्षोल्लाह के साथ मनाए जाते हैं । प्रत्येक उत्सव के पीछे इतिहास होता है , जिसके अंतर्गत उसे पर्व उत्सव को मनाया जाता है । प्रत्येक कौम – जाति अपने धर्म के अनुसार स्वयं का पर्व बड़े श्रद्धा – आस्था उत्साह – उमंग के साथ मनाती है , उसी प्रकार सिंधी समुदाय का भी एक मुख्य महापर्व है ” चेटीचंड्र ” जो कि पूरे विश्व भर में बड़ेआनंद ,उत्साह ,श्रध्दा भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है ।
जल और जोति की पूजा प्रकृति की पूजा है।
झूलेलाल जयंती कैसे मनाते हैं ?
चेटीचण्ड विक्रम संवत का पवित्र शुभारंभ दिवस है । चेटीचण्ड में चैत्र मास अर्थात नव संवत्सर का आरंभ होता है । चण्डतिथि इस दिन सिंधी समाज के लोग अपने इष्ट देव ज्योति स्वरूप भगवान श्री झूलेलाल की आराधना पूजा अर्चना श्रद्धा भाव के साथ करते हैं और अपनी आस्था का अधर्य चढ़ाकर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं । इस दिन सिंधी समाज के लोग प्रसन्नचित होकर आयो लाल झूलेलाल का घोष कर एक दूसरे को भगवान झूलेलाल के जन्म व नववर्ष की बधाइयां देते हैं । साथ ही ज्योति जलाकर बहिराणे साहिब के रूप में उसकी पूजा अर्चना आराधना करके सिंधी लोक नृत्य , डांडिया वह मटका नृत्य करके भगवान झूलेलाल जयंती का महोत्सव बड़े ही भक्ति भाव से मनाते हैं ।
हमारा देश ऋषि मुनियों का देश है ।
मौन की कितनी भारी महिमा है , इस को हम सूक्ष्म रूप से जानेंगे ।
हमारे सिंधी समाज में चालिया मतलब 40 दिन तक व्रत पूजा उपवास और मौन रख कर , अपनी आत्मा की शक्ति को बढ़ाकर अंतर्मुख होकर अपने अंदर परमात्मा की शक्तियो को भरना ।
40 दिन तक अखंड ज्योति जलाई जाती है ।
जोत हमें यह संदेश देती है कि आत्मा ज्योति स्वरूप है , शरीर मरता है लेकिन आत्मा अमर रहती है ।
कहां जाता है ” न बोलने में 9 गुण ” होते हैं।
चेटीचंड के पीछे पौराणिक कहानी =
इतिहास
जब – जब धर्म का हास होने लगता है । अधर्म और पाप बढ़ जाता है । तब – तब ईश्वर किसी ने किसी रूप में पापियों का नाश करके धर्म की रक्षा करते हैं ।
इसी प्रकार जब सिंध प्रदेश के ठट्टा नामक नगर में एक अत्याचारी , मिरखशाह बादशाह नामक शासक का राज्य था । वह हिंदुओं के प्रति अति क्रूर था वह हिंदुओं को मुसलमान बनाना चाहता था । उसने अपने राज्य में घोषणा करवा दी , कि यदि हिंदू लोग मुसलमान नहीं बनेंगे तो उन्हें सख्त सजा दी जाएगी । इस दृष्टिकोण से हिंदुओं पर कई प्रकार के अत्याचार किए जाने लगे । यहां तक की हिंदू धर्म के निशानी शिखा काटकर जनेऊं उतरवाए जाने लगे । हिंदू धर्म की प्रजाति को नष्ट कर स्वयं के धर्म में मिलाने का प्रयास किया जाने लगा । किंतु सभी अत्याचार सहते रहे , वे अपने धर्म से विमुख नहीं हुए । अंत में विवश होकर उन्होंने क्रूर शासन से एक सप्ताह का समय मांगा।
वरुण देव का प्रकट होना
सिंध की प्रजा जल देवता वरुण देव की उपासक थी । बूढ़े – जवान और बच्चे सभी सिंधु के तट पर पहुंचे और तथा अन्न , जल त्याग कर संकट हरने हेतु वरुण देव का श्रद्धा के साथ स्मरण किया । भक्तों को संकट में देखकर वरुण भगवान का ह्रदय द्रवित हो उठा । तब अचानक सिंधु नदी की लहरें आसमान को छूने लगी और लहरों पर विशाल मछली पर विराजमान एक ब्रह्म स्वरूप दिव्य पुरुष दृष्टिगोचर हुए और वह पलक झपकते ही अंतर ध्यान हो गए ।
तत्पश्चात बादलों के गरजने के साथ एक आकाशवाणी गूंज उठी । मेरे प्रिय भक्तजनों दुष्ट मिरखशाह के पापों का घड़ा भर चुका है , मैं आज से 7 दिनों के पश्चात नसरपुर नगर के भक्त रतन राय की धर्मपत्नी माता देवकी के गर्भ से जन्म लेकर तुम्हारे कष्ट हरूंगा । आकाशवाणी गूंज उठी प्रिय भक्त जैन दुष्ट निरीक्षा के पापों का घड़ा भर चुका है । मैं आज से 7 दिन पश्चात नसरपुर नगर के भक्त रतन राय की धर्म पत्नी माता देवकी के घर गर्भ से जन्म लेकर तुम्हारे सभी कष्ट करूंगा ।
“श्री झूलेलाल जी का अवतरण“
विक्रम संवत 1007 के चैत्र शुक्ल द्वितीया को शुक्रवार के दिन श्री रतन राय के घर में एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ । जिसका नाम उदय चंद्र रखा गया , किंतु स्नेह से उन्हें उॾेरोलाल के नाम से पुकारा गया । उसके पश्चात उन्हें झूलेलाल अमरलाल साईं , दरियाशाह ,
जल ज्योति नाम से संबोधित किया गया । दिव्य बालक शीघ्र जवान हो गया और चमत्कारी शूरवीर और सर्वगुण सम्पन्न सिद्ध हुआ । उसकी ख्याति चारों दिशाओं में फैल गई । बाल्यावस्था से ही भगवान श्री झूलेलाल के अलौकिक लीलाओं की घटनाएं होने लगी । जिनको देखकर – सुनकर मिरखशाह भी भयभीत हो गया और हार मानकर स्वयं झूलेलाल साईं की शरण में आ गया ।
झूलेलाल साईं ने उपदेश दिया
भगवान झूलेलाल जी ने बादशाह को समझाया कि सारी सृष्टि प्रभु ने उत्पन्न की है , हिंदू मुसलमान एक ही हैं , मुसलमान जिसे खुदा कहते हैं हिंदु उसे ईश्वर कहते हैं , अर्थात मंजिल सभी की एक ही है , अब बादशाह के समझ में सब कुछ आ गया । इस प्रकार अधर्म समाप्त होकर धर्म की जय हुईं । जिस स्थान पर झूलेलाल भगवान अंतर ध्यान हो गए । उस पवित्र स्थान पर मंदिर बनवाया गया । इस प्रकार अधर्म पर धर्म की विजय हुई ।
मौन की महिमा
मौन की शक्ति से वाणी के आवेग पर नियंत्रण रहता है । अपेक्षा कम होने पर ही मौन के आवेग को दृढ़ कर पाते हैं । निहिश संकल्प रहना सर्वोपरि स्थित है । आत्मा का वैभव जागृत होता है । प्रत्येक प्राणी की पहचान वाणी होती है , आत्मा की पहचान मौन है शांति । मौन से संकल्प शक्ति बढ़ती है । मौन की महिमा अनंत है ।
मौन से मानसिक और शारीरिक
रूप से स्वस्थ रहते हैं । जितनी भी लड़ाइयां होती हैं , कठोर शब्दों से ही होती है । मौन सिर्फ वाणी का नहीं होता । वाणी तो सिर्फ आरंभ है ।
बाहर संरक्षण छोड़ अंदर संरक्षण करना ।
वाणी रजत है तो मौन स्वर्ण है ।
मौन से हम कई बुराइयों से बच जाते हैं । इस प्रकार के अध्यात्मिक संदेश मिलते हैं झूलेलाल साईं द्वारा ।
झूलेलाल जयंती समारोह
सिंधी समुदाय झूलेलाल साईं की पावन जयंती पर विशाल ” शोभा यात्रा ” निकालते हैं , जिसमें महान विभूतियों – शहीदों तथा इस युग की बुराइयों और ज्वलंत समस्याओं पर , रंगारंग एवं आकर्षक झाकिया निकाली जाती हैं । सिंधी लोक नृत्य और संगीत का प्रदर्शन होता है ।
आयोलाल – झूलेलाल के गगन भेदी नारों से वातावरण गूंज उठता है । वृद्ध एवं युवक – अधिकारी एवं कर्मचारी – व्यापारी एवं मजदूर – आध्यात्मिक विद्यार्थी मौज मस्ती और शोभा उसके साथ नाचते गाते हैं । जगह-जगह इस शोभा यात्रा का हार्दिक स्वागत किया जाता है । अंत में किसी नदी किनारे तालाब में श्री झूलेलाल की अखंड ज्योति को विसर्जन करके पूजा स्तुति की जाती है । इस पर्व पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं , जिसमें प्रसिद्ध कलाकार संगीत की लहर से सबको आनंदित करते हैं , विश्व की प्राचीनतम सिंधु संस्कृति का गुणगान करके देश की एकता एवं अखंडता को मजबूत करती हैं । और भगवान झूलेलाल से यही प्रार्थना करते हैं कि सभी का कल्याण हो । विश्व में शांति हो , आपस में प्रेम एकता कायम रहे ।
आयोलाल झूलेलाल – झूलेलाल ॿेड़ा ई पार ।
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मुस्कान बच्चानी _ ✍️
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)