बिलासपुर,
‘रामायण का आध्यात्मिक महत्व एवं जीवन प्रबंधन’ श्रृंखला के तीसरे दिन का मुख्य केंद्र भरत के आदर्श चरित्र पर रहा, जिसे निस्वार्थ प्रेम, त्याग और उच्च संस्कारों की सर्वोत्तम मिसाल बताया गया।
वक्ता मंजू दीदी ने रामायण के अयोध्या कांड का उल्लेख करते हुए बताया कि जब भरत को राज्य मिलने का अवसर मिला, तब उन्होंने इसे स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। उनके लिए राज्य से अधिक महत्वपूर्ण थे उनके बड़े भाई राम, जिनमें वे धर्म, मर्यादा और सत्य का साक्षात स्वरूप देखते थे।

राम – विवेक, सीता – पवित्रता व लक्ष्मण त्याग के प्रतीक
दीदी ने बताया कि भरत का प्रेम केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक था। उन्होंने उस राज्य को अस्वीकार कर दिया जहाँ विवेक (राम), पवित्रता (सीता) और त्याग (लक्ष्मण) उपस्थित न हों। यह त्याग ही भरत को सामान्य व्यक्ति से महान बनाता है।
सत्र में राम-भरत मिलाप का प्रसंग विशेष रूप से भावुक वातावरण में प्रस्तुत किया गया। दीदी ने बताया कि श्रीराम ने स्वयं भरत को संसार का सबसे श्रेष्ठ भाई कहा। वहीं भरत ने भी अपने कर्तव्य को समझते हुए सिंहासन पर बैठने के बजाय राम की चरण पादुकाओं को राजगद्दी पर स्थापित किया और स्वयं को केवल एक सेवक और प्रतिनिधि के रूप में रखा।
इसके साथ ही आज के सत्र में स्वभाव प्रबंधन पर विशेष मंथन करते हुए दीदी ने कहा कि भरत का महान चरित्र उनके उत्कृष्ट स्वभाव का परिणाम था। उनका विनम्र, शांत, कृतज्ञ और निस्वार्थ स्वभाव ही उन्हें सबके हृदय के निकट लाता है। ‘नो कंप्लेन, नो पेन’, कृतज्ञता, धैर्य, प्रेम और वफादारी जैसे गुणों को अपनाकर ही व्यक्ति अपने जीवन में भरत जैसा आदर्श स्थापित कर सकता है।
इस प्रसंग के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि सच्चा नेतृत्व अधिकार में नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और समर्पण में होता है। भरत का चरित्र सिखाता है कि जीवन में अहंकार त्यागकर यदि हम संबंधों और मूल्यों को प्राथमिकता दें, तो हर परिस्थिति में संतुलन और शांति बनाए रख सकते हैं।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित श्रद्धालुओं से आह्वान किया गया कि वे भरत के आदर्शों—निस्वार्थ प्रेम, त्याग, वफादारी और समर्पण—को अपने जीवन में अपनाकर परिवार और समाज में सौहार्द का वातावरण स्थापित करें।
कार्यक्रम के अंत में प्रतिदिन श्रद्धालुओं को दीदी के द्वारा भोग प्राप्त करने का सौभाग्य मिलता है।