भारत की जनगणना 2027 डिजिटल इंडिया और डेटा- आधारित गवर्नेंस के सबसे बड़े प्रशासनिक अभियानों में से एक माना जा रहा है
सुप्रीम कोर्ट का 20 मई 2026 क़ा यह फैसला केवल एक याचिका खारिज करने तक सीमित नहीं है।बल्कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, सामाजिक न्याय की अवधारणा और डेटा- आधारित शासन प्रणाली के भविष्य को दिशा देने वाला निर्णय -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत में वर्षों से चल रही जातिगत जनगणना की बहस को बुधवार 20 मई 2026 को एक निर्णायक मोड़ तब मिला, जब भारतीय सुप्रीमकोर्ट ने जातिगत जनगणना के खिलाफ दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया। इस फैसले ने केवल एक कानूनी विवाद का अंत नहीं किया,बल्कि यह स्पष्ट संदेश भी दे दिया कि भारत में होने वाली जनगणना 2027 पूरी तरह संवैधानिक,कानूनी और नीतिगत अधिकारों केदायरे में संचालित की जा रही है। बता दें इसके पूर्व भी सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (11 अप्रैल, 2026) को केंद्र को जाति जनगणना रोकने का निर्देश देने वाली याचिका को खारिज कर दियाथा और जनहित याचिका में इस्तेमाल की गई भाषा के लिए याचिकाकर्ता की कड़ी आलोचना की। पिछले कुछ महीनों से जातिगत जनगणना को लेकर राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक स्तर पर तीखी बहस चल रही थी। कुछ वर्ग इसे सामाजिक न्याय का आधार बता रहे थे, जबकि विरोधी पक्ष इसे सामाजिक विभाजन बढ़ाने वाला कदम कह रहा था। किंतु सर्वोच्च अदालत के ताजा निर्णय ने यह स्थापित कर दिया कि किसी भी लोकतांत्रिक सरकार को यह अधिकार है कि वह देश की सामाजिक संरचना, विशेषकर पिछड़े वर्गों की वास्तविक संख्या और स्थिति को समझने के लिए डेटा एकत्र करे, ताकि उसके आधार पर कल्याणकारी योजनाएं बनाई जा सकें। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि भारत की जनगणना 2027 केवल एक पारंपरिक जनगणना नहीं मानी जा रही,बल्कि इसे डिजिटल इंडिया और डेटा-आधारित गवर्नेंस के सबसे बड़े प्रशासनिक अभियानों में से एक माना जा रहा है। लगभग डेढ़ सौ वर्षों से चली आ रही जनगणना व्यवस्था अब तकनीकी रूप से आधुनिक स्वरूप में प्रवेश कर चुकी है।
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साथियों इस बार की जनगणना दो बड़े चरणों में आयोजित की जा रही है।पहला चरण 1 अप्रैल 2026 से प्रारंभ हुआ,जिसमें हाउस लिस्टिंग और आवासीय गणना की प्रक्रिया अपनाई गई। 16 अप्रैल से 15 मई 2026 तक चले इस चरण में देशभर के घरों,संपत्तियों,भवनों, आवासीय सुविधाओं, जल स्रोतों, बिजली, इंटरनेट, शौचालय, रसोई, वाहन और सामाजिक- आर्थिक आधारभूत संरचनाओं से संबंधित डेटा संकलित किया गया।यह चरण केवल जनसंख्या गिनने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह देश की जीवन- स्थितियों का व्यापक सामाजिक -आर्थिक सर्वेक्षण भी बन गया।जनगणना का दूसरा चरण वर्ष 2027 में प्रारंभ होगा, जिसमें प्रत्येक परिवार और उसके सदस्यों की विस्तृत व्यक्तिगत जानकारी दर्ज की जाएगी। इसमें आयु, शिक्षा, रोजगार, भाषा, वैवाहिक स्थिति, प्रवासन, सामाजिक श्रेणी और विशेष रूप से जातिगत विवरण शामिल होंगे। पहली बार इतनी व्यापक डिजिटल प्रणाली अपनाई जा रही है जिसमें मोबाइल ऐप, टैबलेट आधारित डेटा एंट्री, ऑनलाइन सत्यापन और केंद्रीकृत डेटा मॉनिटरिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है।सरकार का उद्देश्य केवल आंकड़े जुटाना नहीं, बल्कि डेटा आधारित नीति निर्माण को मजबूत करना है। यही कारण है कि जातिगत आंकड़ों को अब सामाजिक न्याय और संसाधन वितरण के दृष्टिकोण से सटीक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
साथियों, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि जातिगत जनगणना करना या न करना सरकार का नीतिगत अधिकार है।अदालत ने कहाकि जब तक कोई नीति संविधान या कानून का उल्लंघन नहीं करती, तब तक न्यायपालिका उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। अदालत की यह टिप्पणी भारतीय लोकतंत्र में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को भी मजबूती देती है, जहां नीति निर्माण कार्यपालिका का क्षेत्र माना जाता है और न्यायपालिका केवल वैधानिकता की समीक्षा करती है। मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार के लिए यह जानना जरूरी है कि देश में अन्य पिछड़ा वर्ग और सामाजिक रूप से वंचित समूहों की वास्तविक संख्या कितनी है,ताकिउनके लिए उपयुक्त कल्याणकारी योजनाएं बनाई जा सकें।अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जाति आधारित गणना अपने आप में असंवैधानिक नहीं है।यदि सरकार सामाजिक और आर्थिक नीतियों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए आंकड़े जुटाना चाहती है, तो यह उसका वैध प्रशासनिक अधिकार है। अदालत ने यह भी कहा कि किसी नीति के संभावित दुरुपयोग की आशंका मात्र से उसे रोका नहीं जा सकता। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यही था कि जातिगत आंकड़ों का राजनीतिक और सामाजिक दुरुपयोग हो सकता है। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि सरकार के पास पहले से ही पर्याप्त सामाजिक डेटा उपलब्ध है, इसलिए अलग से जातिगत गणना की आवश्यकता नहीं है। किंतु अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि सरकार को समकालीन और प्रमाणिक आंकड़ों की आवश्यकता होती है, क्योंकि पुराने डेटा के आधार पर प्रभावी नीति निर्माण सटीक रूप से संभव नहीं है।
साथियों, यह फैसला सामाजिक न्याय की राजनीति और प्रशासनिक नीति दोनों के लिए ऐतिहासिक माना जा रहा है। भारत में लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि आरक्षण, कल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक प्रतिनिधित्व का वास्तविक आधार क्या होना चाहिए। अनेक विशेषज्ञों का मानना रहा है कि बिना अद्यतन जातिगत आंकड़ों के सामाजिक न्याय की नीतियां अधूरी रहती हैं। स्वतंत्र भारत में 1931 के बाद व्यापक स्तर पर जातिगत आंकड़े उपलब्ध नहीं रहे, जिसके कारण पिछड़े वर्गों की वास्तविक संख्या और उनकी सामाजिक- आर्थिक स्थिति को लेकर लगातार विवाद बना रहा। ऐसे में जनगणना 2027 को एक ऐतिहासिक अवसर के रूप में देखा जा रहा है, जो देश की सामाजिक संरचना का वास्तविक चित्र सामने ला सकती है।

साथियों, राजनीतिक दृष्टि से भी यह मुद्दा अत्यंत महत्वपूर्ण बन चुका है। कई राज्यों में जातिगत सर्वेक्षण और सामाजिक गणना पहले ही राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन चुके हैं। बिहार, कर्नाटक और अन्य राज्यों में किए गए जातीय सर्वेक्षणों ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस को और तेज किया। केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना की दिशा में आगे बढ़ना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि भविष्य की नीतियां अधिक डेटा-आधारित और लक्ष्य केंद्रित होंगी। इससे यह भी संभावना बढ़ेगी कि सामाजिक योजनाओं में संसाधनों का वितरण वास्तविक जनसंख्या अनुपात और जरूरतों के आधार पर किया जा सके।
साथियों, सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 11 अप्रैल 2026 को भी ऐसी ही एक याचिका को खारिज किया था, जिसमें केंद्र सरकार को जातिगत जनगणना रोकने का निर्देश देने की मांग की गई थी। उस समय अदालत ने याचिका में प्रयुक्त भाषा पर भी कड़ी टिप्पणी की थी। अदालत का यह लगातार रुख स्पष्ट करता है कि वह जनगणना जैसे प्रशासनिक और नीतिगत विषयों में अनावश्यक न्यायिक हस्तक्षेप से बचना चाहती है। इससे यह संदेश भी गया है कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में नीति निर्माण की प्राथमिक जिम्मेदारी निर्वाचित सरकारों की होती है।जातिगत जनगणना के समर्थकों का तर्क है कि भारत जैसे बहुस्तरीय सामाजिक ढांचे वाले देश में समान अवसर और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए वास्तविक आंकड़े अत्यंत आवश्यक हैं। यदि सरकार को यह ज्ञात ही नहीं होगा कि किस समुदाय की आबादी कितनी है, उनकी शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति कैसी है, तो योजनाओं का सही लक्ष्य निर्धारण संभव नहीं होगा। यही कारण है कि अदालत ने भी सरकार की इस आवश्यकता को स्वीकार किया कि पिछड़े वर्गों की संख्या और स्थिति जानना शासन व्यवस्था के लिए आवश्यक है।दूसरी ओर, विरोधियों की आशंका यह रही है कि जातिगत पहचान को फिर से केंद्र में लाने से सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है। उनका मानना है कि आधुनिक भारत को जाति से ऊपर उठकर आर्थिक और मानव विकास के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए। हालांकि सरकार और अदालत दोनों ने यह स्पष्ट किया कि आंकड़े जुटाना और उनका दुरुपयोग करना दो अलग बातें हैं। यदि किसी नीति का उद्देश्य सामाजिक कल्याण और प्रशासनिक सुधार है, तो केवल संभावित राजनीतिक उपयोग के आधार पर उसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।
साथियों, जनगणना 2027 की डिजिटल प्रकृति भी इसे ऐतिहासिक बना रही है। पहली बार इतनी व्यापक स्तर पर तकनीकी साधनों का उपयोग किया जा रहा है। डेटा संग्रहण की प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और त्रुटिहीन बनाने के लिए मोबाइल एप्लीकेशन, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और डिजिटल सत्यापन की व्यवस्था की गई है। इससे फर्जी या दोहराव वाले आंकड़ों को कम करने में मदद मिलेगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह भारत की प्रशासनिक क्षमता और डिजिटल गवर्नेंस मॉडल की बड़ी परीक्षा भी होगी।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की यह पहल ध्यान आकर्षित कर रही है। दुनिया के कई देशों में जनसांख्यिकीय आंकड़ों के आधार पर सामाजिक नीतियां बनाई जाती हैं। अमेरिका, ब्रिटेन और ब्राजील जैसे देशों में नस्ल, जातीयता और सामाजिक पृष्ठभूमि से जुड़े आंकड़े नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत में जातिगत जनगणना को उसी व्यापक वैश्विक संदर्भ में देखा जा रहा है, जहां डेटा आधारित सामाजिक नीति को लोकतांत्रिक शासन का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक याचिका खारिज करने तक सीमित नहीं है। यह भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, सामाजिक न्याय की अवधारणा और डेटा-आधारित शासन प्रणाली के भविष्य को दिशा देने वाला निर्णय माना जाएगा। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि जनगणना 2027 अब कानूनी और संवैधानिक रूप से मजबूत आधार पर आगे बढ़ेगी। सरकार को न केवल प्रशासनिक समर्थन मिला है, बल्कि न्यायपालिका की ओर से भी यह संकेत मिला है कि सामाजिक कल्याण के लिए आवश्यक आंकड़े जुटाना लोकतांत्रिक शासन का वैध हिस्सा है। आने वाले वर्षों में यह जनगणना भारत की सामाजिक संरचना, राजनीतिक विमर्श और आर्थिक नीतियों को गहराई से प्रभावित कर सकती है।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425
