भारत अब कूटनीति के माध्यम से विश्व राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्र में तेजी से अपनी जगह बना रहा है।
भारत क़ा विश्व राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्र में तेजी से अपनी जगह बनाने का सकारात्मक प्रभाव,अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के विश्वास,विदेशी पूंजी प्रवाह, रणनीतिक उद्योगों और शेयर बाजारों की दीर्घकालिक दिशा पर पड़ेगा -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर मई 2026 के तीसरे सप्ताह में भारत की विदेश नीति और वैश्विक कूटनीतिक सक्रियता ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ भारतीय तथा वैश्विक वित्तीय बाजारों तथा अर्थव्यवस्थाओं का भी ध्यान आकर्षित किया। एक ओर भारत के पीएम की 15 से 20 मई 2026 संयुक्त अरब अमीरात नीदरलैंड, स्वीडन,नॉर्वे और इटली की बहु-देशीय यात्रा ने ऊर्जा सुरक्षा,आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस,हरित प्रौद्योगिकी, रक्षा सहयोग और रणनीतिक आर्थिक साझेदारी को नई गति दी, वहीं दूसरी ओर साइप्रस के राष्ट्रपति निकोसक्रिस्चिदोलिडेस की 20 से 23 मई 2026 भारत यात्रा ने यूरोप और भूमध्य सागरीय क्षेत्र में भारत की आर्थिक उपस्थिति को मजबूत करने के संकेत दिए। इसी क्रम में अमेरिकी विदेश मंत्री मारको रूबीओ का शनिवार 23 मई 2026 शाम को भारत आगमन और क्वाड देशों की बैठक ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति को और मजबूत बनाया। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि इन तीनों घटनाओं का संयुक्त प्रभाव केवल कूटनीतिक व भारतीय अर्थव्यवस्था पर ही नहीं बल्कि वैश्विक निवेश प्रवाह, विदेशी संस्थागत निवेश,भारतीय शेयर बाजार, ऊर्जा कंपनियों, रक्षा उद्योग, टेक्नोलॉजी सेक्टर और अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजारों पर भी सटीकता वह गहराई से पड़ने वाला है।

साथियों, सबसे पहले यदि भारतीय पीएम की पांच देशों की यात्रा को आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि भारत अब केवल विकासशील अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, डिजिटलअर्थव्यवस्था और रणनीतिक भू-राजनीतिक संतुलन का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है। संयुक्त अरब अमीरात के साथ भारत के संबंध पहले से ही ऊर्जा, निवेश और व्यापार के आधार पर मजबूत रहे हैं, लेकिन इस यात्रा में ऊर्जा सुरक्षा और भविष्य की प्रौद्योगिकियों पर जो जोर दिया गया, उसने निवेशकों के बीच भारत के प्रति भरोसा और बढ़ाया है। यूएई पहले से भारत के सबसे बड़े निवेश साझेदारों में से एक है। यदि ऊर्जा, पेट्रोकेमिकल्स, ग्रीन हाइड्रोजन और इंफ्रास्ट्रक्चर में संयुक्त निवेश तेजी पकड़ता है तो भारतीय शेयर बाजार में रिलायंस, ओएनजीसी, इंडियन ऑयल, अदाणी समूह और ग्रीन एनर्जी कंपनियों के शेयरों में दीर्घकालिक सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए यह संकेत है कि भारत भविष्य की ऊर्जा अर्थव्यवस्था में केंद्रीय भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है।ऊर्जा सुरक्षा का प्रश्न वैश्विक निवेशकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि तेल और गैस की कीमतें सीधे मुद्रास्फीति, औद्योगिक लागत और कॉरपोरेट मुनाफे को प्रभावित करती हैं। पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच यदि भारत यूएई जैसे स्थिर साझेदारों के साथ दीर्घकालिक ऊर्जा आपूर्ति समझौते करता है तो इससे भारतीय अर्थव्यवस्था की ऊर्जा लागत स्थिर रह सकती है। इसका असर भारतीय शेयर बाजार पर सकारात्मक होगा क्योंकि ऊर्जा आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं में स्थिर आपूर्ति निवेशकों का भरोसा बढ़ाती है। विदेशी संस्थागत निवेशक ऐसे देशों में पूंजी लगाना पसंद करते हैं जहाँ ऊर्जा संकट की संभावना कम हो। इसलिए यह यात्रा भारतीय बाजारों के लिए स्थिरता का संकेत बन सकती है।नीदरलैंड और स्वीडन की यात्रा का महत्व तकनीकी और नवाचार आधारित निवेशों के संदर्भ में और भी बड़ा माना जा रहा है। नीदरलैंड सेमीकंडक्टर, लॉजिस्टिक्स और स्मार्ट पोर्ट टेक्नोलॉजी का वैश्विक केंद्र है। यदि भारत इस क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग बढ़ाता है तो इसका सीधा प्रभाव भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षमता पर पड़ेगा। वर्तमान समय में दुनिया चीन पर निर्भर सप्लाई चेन को विविध बनाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में भारत यदि यूरोपीय तकनीकी सहयोग के साथ सेमीकंडक्टर और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग में आगे बढ़ता है तो इससे भारतीय टेक और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों में विदेशी निवेश बढ़ सकता है। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, डिक्सन टेक्नोलॉजीज और सेमीकंडक्टर से जुड़ी नई भारतीय कंपनियों के प्रति निवेशकों का आकर्षण बढ़ सकता है।स्वीडन के साथ सहयोग का एक बड़ा आयाम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हरित उद्योग और स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग है। वर्तमान वैश्विक शेयर बाजार में एआई आधारित कंपनियां निवेशकों की पहली पसंद बनी हुई हैं। अमेरिका में एनवीडिया जैसी कंपनियों की तेज वृद्धि ने दुनिया को यह दिखा दिया है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था एआई आधारित होगी।

साथियों, यदि भारत यूरोपीय देशों के साथ एआई अनुसंधान, डेटा सेंटर, क्लाउड टेक्नोलॉजी और साइबर सुरक्षा में सहयोग बढ़ाता है तो भारतीय आईटी कंपनियों के लिए नए अवसर खुल सकते हैं।इससे इनफ़ोसिस टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज , विप्रो और एचसीएलटेक जैसी कंपनियों में दीर्घकालिक तेजी देखी जा सकती है। विदेशी निवेशक उन बाजारों की ओर आकर्षित होते हैं जहाँ भविष्य की तकनीकों में सरकारी और कूटनीतिक समर्थन दिखाई देता है।नॉर्वे की यात्रा का प्रभाव हरित ऊर्जा और समुद्री अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ माना जा रहा है। नॉर्वे दुनिया में ग्रीन शिपिंग, स्वच्छ ऊर्जा और संप्रभु संपत्ति कोष के लिए प्रसिद्ध है। नॉर्वे का सरकारी निवेश कोष दुनिया का सबसे बड़ा सॉवरेन वेल्थ फंड माना जाता है। यदि भारत और नॉर्वे के बीच हरित ऊर्जा, अपतटीय पवन ऊर्जा और समुद्री अवसंरचना में सहयोग बढ़ता है तो भारत के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में बड़े विदेशी निवेश आने कीसंभावना बन सकती है। इससे भारतीय ग्रीन एनर्जी कंपनियों और ईएसज़ी आधारित निवेशों को मजबूती मिलेगी। आज दुनिया के बड़े निवेशक केवल लाभ नहीं बल्कि पर्यावरणीय स्थिरता को भी महत्व दे रहे हैं।
साथियों, भारत की ग्रीन डिप्लोमेसी शेयर बाजार के लिए नया सकारात्मक संकेत बन सकती है।इटली यात्रा का सबसे बड़ा महत्व यूरोप के साथ भारत की रणनीतिक आर्थिक साझेदारी में दिखाई देता है। इटली यूरोप की प्रमुख औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और प्रधानमंत्री जिओर्जिया मेलोनी के साथ भारत की बढ़ती निकटता यूरोपीय संघ में भारत की स्थिति को मजबूत कर सकती है। इससे रक्षा विनिर्माण, ऑटोमोबाइल, मशीनरी और फैशन उद्योगों में निवेश सहयोग बढ़ सकता है। यूरोप की कंपनियां चीन से उत्पादन हटाकर वैकल्पिक बाजार खोज रही हैं और भारत इसके लिए सबसे बड़ाउम्मीदवार बनकर उभर रहा है। यदि यह प्रवृत्ति मजबूत होती है तो भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में तेज पूंजी प्रवाह संभव है। इससे “मेक इन इंडिया” अभियान को भी बल मिलेगा और भारतीय शेयर बाजार में औद्योगिक तथा पूंजीगत वस्तु कंपनियों में तेजी आ सकती है।
साथियों अब यदि साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टो डौलाइड्स की भारत यात्रा को निवेश और वित्तीय दृष्टि से समझें तो इसका महत्व काफी गहरा है। साइप्रस लंबे समय से भारत में विदेशी निवेश के मार्ग के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। कई अंतरराष्ट्रीय निवेश फंड और कंपनियां साइप्रस के माध्यम से भारत में निवेश करती रही हैं। ऐसे में भारत और साइप्रस के बीच रणनीतिक साझेदारी बढ़ने का अर्थ है कि वित्तीय सहयोग, निवेश संरक्षण और पूंजी प्रवाह को नई मजबूती मिल सकती है। यह भारतीय शेयर बाजार के लिए सकारात्मक संकेत है क्योंकि विदेशी निवेशक ऐसे देशों में निवेश बढ़ाते हैं जहाँ द्विपक्षीय समझौते स्थिरता और कानूनी सुरक्षा प्रदान करते हैं।साइप्रस यात्रा के दौरान व्यापार, रक्षा, साइबर सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी सहयोग पर हुए समझौते अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए भरोसे का वातावरण तैयार करते हैं। साइबर सुरक्षा आज वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण विषय बन चुकी है। डिजिटल बैंकिंग, ऑनलाइन भुगतान,ए आई और डेटा आधारित अर्थव्यवस्था के दौर में साइबर सुरक्षा में सहयोग से भारतीय टेक कंपनियों और फिनटेक सेक्टर को मजबूती मिल सकती है। इससे भारतीय डिजिटल अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेश का मार्ग और खुल सकता है।मुंबई में साइप्रस प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी और बॉलीवुड फिल्म शूटिंग से जुड़ी घोषणाएं यह भी दर्शाती हैं कि भारत अब केवल औद्योगिक निवेश का केंद्र नहीं बल्कि सांस्कृतिक और मनोरंजन आधारितअर्थव्यवस्था का भी वैश्विक केंद्र बन रहा है। मनोरंजन उद्योग में विदेशी निवेश बढ़ने से मीडिया, ओटीटी प्लेटफॉर्म और पर्यटन क्षेत्र को लाभ मिल सकता है। इसका असर संबंधित सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों पर भी दिखाई दे सकता है।
साथियों, अब यदि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की भारत यात्रा और क्वाड बैठक के प्रभाव को समझें तो इसका असर सबसे व्यापक माना जा सकता है। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे बड़ा पूंजी बाजार है। भारत-अमेरिका संबंधों में सुधार का सीधा प्रभाव विदेशी संस्थागत निवेशकों की धारणा पर पड़ता है। हाल के वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक मतभेद, वीजा मुद्दे और रणनीतिक चिंताओं को लेकर कुछ तनाव दिखाई दिए थे। ऐसे में यह यात्रा संकेत देती है कि दोनों देश संबंधों को पुनः मजबूत करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। यह संदेश वैश्विक बाजारों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।क्वाड बैठक हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के संतुलन के रूप में देखी जाती है। निवेशकों की दृष्टि से स्थिर और सुरक्षित हिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक व्यापार के लिए आवश्यक है क्योंकि दुनिया का बड़ा समुद्री व्यापार इसी क्षेत्र से गुजरता है। यदि क्वाड सहयोग मजबूत होता है तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षा मिल सकती है। इसका लाभ भारत को एक वैकल्पिक विनिर्माण और व्यापारिक केंद्र के रूप में मिलेगा। इससे भारतीय बाजारों में दीर्घकालिक विदेशी निवेश बढ़ सकता है।रक्षा सहयोग पर बातचीत का सीधा प्रभाव भारतीय रक्षा कंपनियों पर पड़ सकता है। भारत लगातार रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अमेरिका के साथ रक्षा तकनीक, ड्रोन, मिसाइल सिस्टम, साइबर रक्षा और सेमीकंडक्टर तकनीक में सहयोग भारतीय रक्षा उद्योग को नई ऊंचाई दे सकता है। इससे हिंदुस्तान ऐरोनाटिक्स लिमिटेड ,भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और निजी रक्षा कंपनियों के शेयरों में तेजी देखने को मिल सकती है। वैश्विक निवेशक रक्षा क्षेत्र को अब केवल युद्ध उद्योग नहीं बल्कि उच्च प्रौद्योगिकी और रणनीतिक स्थिरता के क्षेत्र के रूप में देख रहे हैं।महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला पर चर्चा भी निवेशकों के लिए बड़ा संकेत है। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर और रक्षा तकनीक के लिए लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थमिनरल्स की आवश्यकता तेजी से बढ़ रही है। यदि भारत अमेरिका और अन्य साझेदार देशों के साथ इस क्षेत्र में दीर्घकालिक समझौते करता है तो भारत भविष्य की हरित औद्योगिक क्रांति में बड़ी भूमिका निभा सकता है। इससे इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी क्षेत्र की भारतीय कंपनियों को भारी लाभ हो सकता है।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों पर भी इन यात्राओं का प्रभाव दिखाई देगा। यदि भारत पश्चिमी देशों और मध्य-पूर्व के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी बनाता है तो उभरते बाजारों में भारत का वज़न बढ़ेगा। वैश्विक फंड मैनेजर चीन के विकल्प के रूप में भारत में निवेश बढ़ा सकते हैं। इससे एमएससीआई और अन्य वैश्विक सूचकांकों में भारतीय शेयरों की हिस्सेदारी बढ़ सकती है। लंबे समय में यह भारतीय बाजारों में लगातार विदेशी पूंजी प्रवाह सुनिश्चित कर सकता है।हालांकि, इसके साथ कुछ जोखिम भी मौजूद हैं। यदि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, तेल कीमतें अचानक बढ़ती हैं या अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता अधिक तीव्र होती है तो वैश्विक बाजारों में अस्थिरता आ सकती है। विदेशी निवेशक जोखिम बढ़ने पर उभरते बाजारों से पूंजी निकालने लगते हैं। इसलिए भारत को अपनी कूटनीतिक संतुलन नीति को सावधानी से बनाए रखना होगा। भारत की विशेषता यही रही है कि उसने अमेरिका, यूरोप, रूस और मध्य-पूर्व सभी के साथ संतुलित संबंध बनाए हैं। यही संतुलन भविष्य में भारतीय बाजारों की स्थिरता का आधार बन सकता है।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425
