तंबाकू निषेध दिवस 31 मई 2026 मनाने क़े साथ शासन प्रशासन विद्यालयों, महाविद्यालयों, पंचायतों,नगर निकायों,सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, चिकित्सक समुदाय,मीडिया और राजनीतिक दलों को साथ मिलकर सशक्त राष्ट्रव्यापी उग्र तंबाकू निषेध आंदोलन चलाने की जरूरत?
तंबाकू निषेध नशा मुक्त भारत- अगर भ्रष्टाचार,आरक्षण, नागरिकता, कृषि कानून, क्षेत्रीय पहचान या सामाजिक न्याय के प्रश्न राष्ट्रीय बहस और जनआंदोलन का विषय बन सकते हैं, तो नशा मुक्त संपूर्ण क्रांति आंदोलन क्यों नहीं बना? एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर हर वर्ष 31 मई को पूरी दुनियाँ में वर्ल्ड नों टोबैक्को अर्थात विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाया जाता है। हर वर्ष इस अवसर पर भाषण होते हैं, शपथ ली जाती है, पोस्टर लगाए जाते हैं और तंबाकू के दुष्परिणामों पर चर्चा होती है।लेकिन एक कड़वा प्रश्न आज हमारे सामने खड़ा है,क्या केवल एक दिन का यह प्रतीकात्मक आयोजन उस भयावह महामारी को रोक सकता है जो प्रतिदिन लाखों लोगों के शरीर में कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक और फेफड़ों की घातक बीमारियों का जहर घोल रही है? भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में नागरिकता कानून,आरक्षण,भ्रष्टाचार,किसानों की समस्याएं,भाषा विवाद, जल-जंगल-जमीन के प्रश्न, मंडल -कमंडल की राजनीति, जनलोकपाल आंदोलन, महिला सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, महंगाई, बेरोजगारी और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दे बड़े जनांदोलनों का रूप ले चुके हैं।सड़कों पर लाखों लोग उतरते हैं,संसद और विधान सभाओं में बहस होती है, सरकारें झुकती हैं और नीतियां बदलती हैं।परंतु मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र इस आर्टिकल का माध्यम से शासन प्रशासन व समाज से पूछना चाहता हूं कि तंबाकू, जो हर वर्ष लाखों परिवारों को उजाड़ देता है, आज भी उतना बड़ा राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन क्यों नहीं बन पाया? जब किसी परिवार का कमाने वाला सदस्य तंबाकूजनित कैंसर से मरता है, जब किसी बच्चे का पिता गुटखा या सिगरेट के कारण असमय दुनियाँ छोड़ देता है, जब किसी मां की आंखों के सामने उसका जवान बेटा निकोटीन की लत का शिकार होकर जीवन हार जाता है, तब यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रह जाती,बल्कि यह राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाती है। मेरे अपने एक निकट संबंधी की मृत्यु भी तंबाकूजनित कैंसर के कारण हुई। ऐसे हजारों-लाखों परिवारों का दर्द यह संकेत देता है कि अब तंबाकू निषेध को केवल स्वास्थ्य अभियान नहीं बल्कि एक व्यापक सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आंदोलन का रूप देने की आवश्यकता है।
साथियों बात अगर हम तंबाकू व नशीली चीजों के खिलाफ़ बहुत बड़े आंदोलन की करें तो तंबाकू निषेध आंदोलन को इस तरह के आंदोलन समक़क्ष बनाने की जरूरत है जैसे भारतीय लोकतंत्र का इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि जब किसी मुद्दे को जनआंदोलन का रूप मिला, तब उसने सरकारों की नीतियों,कानूनों और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित किया। वर्ष 1974 का जेपी आंदोलन (संपूर्ण क्रांति आंदोलन), वर्ष 1990 का मंडल आयोग आरक्षण आंदोलन 1980 और 1990 के दशक का राम जन्मभूमि आंदोलन,वर्ष 2011 का अन्ना हजारे के नेतृत्व वाला भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल आंदोलन, वर्ष 2019- 20 का नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) विरोधी आंदोलन, वर्ष 2020-21 का कृषि कानूनों के विरुद्ध किसान आंदोलन, वर्ष 2015 और उसके बाद विभिन्न राज्यों में हुए पटीदार आरक्षण आंदोलन,जाट आरक्षण आंदोलन, मराठा आरक्षण आंदोलन, गुर्जर आरक्षण आंदोलन तथा हाल के वर्षों में विभिन्न राज्यों में जातीय, सामाजिक और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े आंदोलनों ने यह सिद्ध किया है कि संगठित जनदबाव लोकतांत्रिक व्यवस्था में परिवर्तन का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।इन आंदोलनों ने न केवल राजनीतिक विमर्श को प्रभावित किया बल्कि सरकारों को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए भी बाध्य किया। आज 30 मई 2026 से महाराष्ट्र में शुरू हुआ मनोहर जराँगे का मराठा आरक्षण आंदोलन सहित देश के अनेक हिस्सों में सामाजिक, जातीय और आरक्षण से जुड़े आंदोलन लगातार सुर्खियों में हैं, जो यह दर्शाते हैं कि जनता जब किसी विषय को अपने अस्तित्व, अधिकार या भविष्य से जोड़ लेती है तो वह एक विशाल जनशक्ति का रूप धारण कर लेता है। तो फिर तंबाकू व नशीली चीजों के विरुद्ध ऐसा आंदोलन किसी राजनीतिक सामाजिक या व्यक्तिगत संगठन में क्यों नहीं उठाया है यह विचारणीय प्रश्न है?
साथियों, पिछले एक दशक में नशे का स्वरूप तेजी से बदला है। कभी बीड़ी, सिगरेट और तंबाकू की पुड़िया तक सीमित रहने वाला यह कारोबार अब अत्याधुनिक तकनीक के आवरण में युवाओं के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है। ई- सिगरेट, वेप्स, निकोटीन पॉड्स, फ्लेवर्ड हुक्के, निकोटीन पाउच और विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक धूम्रपान उपकरण आधुनिक जीवनशैली के प्रतीक के रूप में प्रचारित किए जा रहे हैं। तंबाकू उद्योग ने समझ लिया है कि यदि उसे नई पीढ़ी को अपने जाल में फंसाना है तो उत्पाद का स्वरूप बदलना होगा। इसलिए आज कई वेपिंग उपकरण पेन ड्राइव, स्मार्ट गैजेट, इलेक्ट्रॉनिक पेन या स्टाइलिश एक्सेसरी जैसे दिखाई देते हैं। किशोर और युवा इन्हें आधुनिकता, स्वतंत्रता और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक समझने लगते हैं। चॉकलेट, स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी, वनीला, मिंट और अन्य आकर्षक फ्लेवर के माध्यम से निकोटीन को मीठे जहर के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।यह रणनीति केवल व्यापारिकनहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है,क्योंकि स्वाद और आकर्षण के माध्यम से लत को आसान बनाया जाता है।

साथियों, सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन आधुनिक उत्पादों को अक्सर पारंपरिक सिगरेट से कम हानिकारक बताने का भ्रम फैलाया जाता है।अनेक युवा यह मान लेते हैं कि वेपिंग सुरक्षित है,जबकि वैज्ञानिक अध्ययनों ने संकेत दिया है कि ई-सिगरेट से निकलने वाला एयरोसोल निकोटीन सहित अनेक हानिकारक रसायनों से भरा होता है। निकोटीन स्वयं अत्यधिक नशे की लत पैदा करने वाला पदार्थ है। इसके अतिरिक्त कई उपकरणों में प्रयुक्त धातुओं, रसायनों और अन्य तत्वों के दीर्घकालिक प्रभाव अभी भी शोध का विषय हैं। इसलिए यह कहना कि आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक धूम्रपान पूरी तरह सुरक्षित है, वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।वास्तव में यह नशे का नया मुखौटा है,जिसका उद्देश्य युवाओं को आकर्षित करना और बाजार का विस्तार करना है।तंबाकू और निकोटीन की इस महामारी का सबसे भयावह पक्ष यह है कि इसका शिकार केवल सेवन करने वाला व्यक्ति ही नहीं होता।पैसिव स्मोकिंग या अप्रत्यक्ष धूम्रपान उन लाखों निर्दोष लोगों की जान ले रहा है जिन्होंने कभी सिगरेट या तंबाकू को हाथ तक नहीं लगाया। घरों, कार्यालयों, रेस्तरां, सार्वजनिक स्थलों और वाहनों में छोड़ा गया धुआं आसपास मौजूद लोगों के शरीर में प्रवेश करता है।बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और कमजोर स्वास्थ्य वाले व्यक्तियों पर इसका प्रभाव और भी गंभीर होता है। जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान करता है तो वह केवल अपने स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि दूसरों के स्वास्थ्य अधिकारों का भी उल्लंघन करता है। यही कारण है कि पैसिव स्मोकिंग को केवल व्यक्तिगत व्यवहार का प्रश्न नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक उत्तरदायित्व का विषय माना जाता है।
साथियों, कई विशेषज्ञों का मानना है कि पैसिव स्मोकिंग के कारण होने वाली मौतों को केवल दुर्घटना याव्यक्तिगत दुर्भाग्य नहीं कहा जा सकता। यह ऐसी स्थिति है जिसमें निर्दोष लोग दूसरों की आदतों के कारण बीमारी औरमृत्यु का शिकार बनते हैं। धुएं में हजारों प्रकार के रसायन पाए जाते हैं, जिनमें अनेक कैंसरकारी तत्व भी शामिल हैं। यही कारण है कि विश्वभर में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान प्रतिबंध संबंधी कानून बनाए गए हैं। लेकिन कानून तभी प्रभावी होते हैं जब उनका कठोर और ईमानदार क्रियान्वयन हो। भारत में भी कई स्थानों पर धूम्रपान निषेध के नियम हैं, परंतु उनका पालन अभी भी चुनौती बना हुआ है।
साथियों, यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है कि तंबाकू विरोधी संघर्ष आज तक एक बड़े जनांदोलन का रूप क्यों नहीं ले पाया। इसका पहला कारण यह है कि तंबाकू तत्काल मृत्यु नहीं देता। सड़क दुर्घटना,हिंसा या प्राकृतिक आपदा की तरह इसका प्रभाव अचानक दिखाई नहीं देता। यह धीरे-धीरे शरीर को भीतर से नष्ट करता है। कैंसर, हृदय रोग और फेफड़ों की बीमारियां वर्षों में विकसित होती हैं। इसलिए जनता का आक्रोश कभी एक साथ विस्फोटक रूप में सामने नहीं आता। दूसरा कारण तंबाकू उद्योग का विशाल आर्थिक ढांचा है। खेती, उत्पादन, वितरण और कर राजस्व से जुड़े अनेक हित इसमें शामिल रहते हैं। तीसरा कारण सामाजिक स्वीकृति है। कई लोग तंबाकू सेवन को व्यक्तिगत पसंद का विषय मानते हैं, जबकि इसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। चौथा कारण जागरूकता और क्रियान्वयन के बीच की दूरी है। कानून मौजूद हैं, चेतावनियां मौजूद हैं, लेकिन व्यवहार परिवर्तन अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पाया है।
साथियों, भारत में तंबाकू और अन्य नशे के नियंत्रण की जिम्मेदारी केवल स्वास्थ्य विभाग की नहीं है।इसमेंपुलिस विभाग, राज्य आबकारी विभाग,स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग,शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग, नारकोटिक्स नियंत्रण एजेंसियां, स्थानीय निकाय, जिला प्रशासन और विभिन्न नियामक संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। जिस प्रकार अवैध शराब से मौतों के मामलों में कई राज्यों में संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाती रही है, उसी प्रकार तंबाकू नियंत्रण कानूनों के प्रभावी पालन को लेकर भी जवाबदेही तय करने की आवश्यकता महसूस की जाती है। जब किसी क्षेत्र में खुलेआम प्रतिबंधित उत्पाद बिकते हैं,जब स्कूलों के आसपास तंबाकू की बिक्री होती है या जब सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान रोकने के नियम लागू नहीं होते, तब केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। प्रभावी निगरानी, नियमित निरीक्षण, जनभागीदारी और उत्तरदायित्व की स्पष्ट व्यवस्था आवश्यक है।
साथियों, आज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि नई पीढ़ी नशे को आधुनिकता और स्टेटस सिंबल के रूप में देखने लगी है। सोशल मीडिया,फिल्मों, डिजिटल संस्कृति और समूह दबाव के कारण कई किशोर यह मान बैठते हैं कि वेपिंग या धूम्रपान उन्हें अधिक आकर्षक, परिपक्व या आधुनिक बनाता है।वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। चिकित्सा विज्ञान यह संकेत देता है कि निकोटीन की लत मस्तिष्क के विकास को प्रभावित कर सकती है, विशेषकर किशोरावस्था में। कुछ मामलों में ई-सिगरेट से जुड़ी गंभीर फेफड़ों की बीमारियों की भी रिपोर्ट सामने आई हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष चिकित्सीय श्रेणियों में अध्ययन किया गया है। यह स्पष्ट है कि आधुनिक नशे का आकर्षक आवरण उसके भीतर छिपे जोखिमों को समाप्त नहीं करता।इसलिए अब आवश्यकता केवल जागरूकता की नहीं बल्कि सामाजिक चेतना के व्यापक पुनर्जागरण की है। स्कूलों और कॉलेजों में नशा विरोधी शिक्षा को अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए। अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ खुलकर संवाद करना होगा। मीडिया को तंबाकू उद्योग के भ्रामक प्रचार का पर्दाफाश करना होगा। चिकित्सकों, शिक्षकों, धार्मिक नेताओं, सामाजिक संगठनों और

जनप्रतिनिधियों को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें तंबाकू सेवन सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं बल्कि स्वास्थ्य जोखिम के रूप में देखा जाए। जिस प्रकार स्वच्छता, बेटी बचाओ, पोलियो उन्मूलन और सड़क सुरक्षा जैसे अभियानों को जनभागीदारी के माध्यम से व्यापक सफलता मिली, उसी प्रकार तंबाकू निषेध को भी राष्ट्रीय जनअभियान का रूप दिया जा सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि विश्व तंबाकू निषेध दिवस का वास्तविक उद्देश्य केवल एक दिन जागरूकता फैलाना नहीं बल्कि पूरे वर्ष चलने वाली सामाजिक प्रतिबद्धता को मजबूत करना है। यदि हम तंबाकू और निकोटीन की बदलती रणनीतियों को नहीं समझेंगे,यदि हम आधुनिक नशे के मुखौटों को नहीं पहचानेंगे और यदि हम युवाओं को इसके जाल से बचाने के लिएसामूहिक प्रयास नहीं करेंगे,तो आने वाली पीढ़ियां इसकी भारी कीमत चुकाएंगी। तंबाकू विरोधी संघर्ष केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, बल्कि मानव गरिमा, सामाजिक न्याय, आर्थिक सुरक्षा और भविष्य की पीढ़ियों के संरक्षण का प्रश्न है। समय आ गया है कि इसे केवल एक स्मृति दिवस या सरकारी कार्यक्रम तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे एक सशक्त राष्ट्रीय जनचेतना आंदोलन बनाया जाए। क्योंकि नशा कभी शान नहीं हो सकता; यह व्यक्ति, परिवार और समाज की चेतना का क्षरण है। तंबाकू को ना कहना केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि एक स्वस्थ और जिम्मेदार समाज के निर्माण की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425
