राजेन्द्र सिंह जादौन
हम हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष का उत्सव मना रहे हैं। उत्सवों का भी अपना लोकतंत्र होता है। कोई 100 वर्ष पूरे होने का समारोह मनाता है, कोई 75 वर्ष का अमृत महोत्सव, कोई 12 वर्ष की उपलब्धियों का डंका बजाता है। ऐसे समय में मुझे लगता है कि भारत में उत्सव मनाने की कला पत्रकारिता से कहीं अधिक विकसित हो चुकी है। खबर बाद में बनती है, उसका उत्सव पहले तय हो जाता है।
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पर देशभर में अनेक विद्वानों, चिंतकों, संपादकों और स्वयंभू मीडिया विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे। किसी ने घोषणा कर दी कि पत्रकारिता मर चुकी है। किसी ने कहा कि पत्रकारिता अब विचारधारा की बंधक हो गई है। किसी ने पूछा कि आप किस पार्टी के पत्रकार हैं? कोई यह जानने में अधिक उत्सुक दिखा कि आपकी वैचारिक निष्ठा कहाँ है, बजाय इसके कि आपकी खबर कितनी सच्ची है। कुछ लोगों ने तो पत्रकारिता की ऐसी अर्थी निकाली कि लगा मानो शोकसभा में आए हों, जबकि मंच पर “200 वर्ष का गौरव” लिखा हुआ था।
मैं अपने तीन दशक के पत्रकारिता जीवन में आज भी स्वयं को पत्रकारिता का विद्यार्थी ही मानता हूँ। फर्क सिर्फ इतना है कि मैंने किसी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता नहीं पढ़ी। वैसे इतिहास उठाकर देखिए तो महात्मा गांधी ने भी पत्रकारिता की कोई डिग्री नहीं ली थी। भगत सिंह ने भी मीडिया स्टडीज़ का कोई कोर्स नहीं किया था। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी भी किसी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के उत्पाद नहीं थे। क्योंकि वे पत्रकार कम और पत्रकर्मी अधिक थे।
आज स्थिति थोड़ी बदल गई है। पत्रकार विश्वविद्यालयों से निकलते हैं, डिग्रियाँ लेकर आते हैं, इंटर्नशिप करते हैं, मीडिया एथिक्स पर शोधपत्र लिखते हैं और फिर किसी राजनीतिक दल, कॉरपोरेट कार्यालय या सत्ता के गलियारों में अपनी जगह तलाश लेते हैं। जबकि पत्रकर्मी आज भी किसी जंगल में आदिवासियों की समस्या खोज रहा होता है, किसी गाँव में सूखे कुएँ की तस्वीर ले रहा होता है या किसी किसान की आत्महत्या के पीछे की कहानी समझने की कोशिश कर रहा होता है।
पत्रकार आपको बड़े-बड़े बंगलों में मिलेंगे, नेताओं के कार्यालयों में मिलेंगे, सत्ता और विपक्ष दोनों के दरबारों में मिलेंगे। अधिकारियों के केबिन में चाय पर चर्चा करते मिलेंगे। यह उनका अधिकार भी है और पेशे का हिस्सा भी। लेकिन पत्रकर्मी आपको जल, जंगल और जमीन के बीच मिलेगा। वह धूल फाँकते हुए खबर खोजेगा, नेटवर्क न होने पर भी तथ्य जुटाएगा और शायद उसी खबर के कारण किसी दिन नौकरी भी खो देगा।
आज देश में अखबारों की संख्या हजारों में है, चैनलों की संख्या सैकड़ों में है, डिजिटल पोर्टलों की बाढ़ आई हुई है। देखने में लगता है कि विचारों की विविधता अपने चरम पर है। लेकिन कभी-कभी टीवी की स्क्रीन देखकर भ्रम टूट जाता है। रात नौ बजे लगभग हर चैनल पर एक जैसा शोर, एक जैसे चेहरे और एक जैसी बहस दिखाई देती है। फर्क सिर्फ इतना होता है कि किसी चैनल पर मुर्गों की लड़ाई लाल रंग की पृष्ठभूमि में होती है और किसी पर नीले रंग की।
ऐसा प्रतीत होता है मानो देश में संपादकों की संख्या कम होकर दो रह गई हो। एक दिल्ली में बैठा है, दूसरा नागपुर में। स्थानीय संपादक अब समाचार कक्षों में कम और राजनीतिक कार्यालयों में अधिक दिखाई देते हैं। वहीं तय होता है कि आज का राष्ट्रीय मुद्दा क्या होगा, किसे देशभक्त घोषित करना है, किसे राष्ट्रविरोधी साबित करना है, किस विषय पर जनता का ध्यान लगाना है और किस विषय से हटाना है।
शाम को टीवी चैनलों पर बहस शुरू होती है। एंकर पहले से जानता है कि कौन चिल्लाएगा, कौन नाराज़ होगा, कौन टेबल थपथपाएगा और कौन बीच में उठकर चला जाएगा। यह वैसा ही है जैसे कुश्ती का आयोजन हो और पहलवानों को पहले से परिणाम बता दिया जाए। फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ घायल होने की अनुमति है, लेकिन मरने की नहीं। क्योंकि अगर सभी योद्धा खत्म हो गए तो अगली बहस में लड़ेगा कौन?
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने पर शायद सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हम खबरों के युग में हैं या नैरेटिव के? क्या हम संवाद कर रहे हैं या सिर्फ प्रसारण? क्या हम सवाल पूछ रहे हैं या सिर्फ पक्ष चुन रहे हैं? क्या पत्रकारिता जनता के लिए है या दर्शकों की टीआरपी और राजनीतिक रणनीतियों के लिए?
फिर भी उम्मीद बची हुई है। क्योंकि हर दौर में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो बिना शोर किए काम करते हैं। जो प्रेस कॉन्फ्रेंस से अधिक गाँव की चौपाल को महत्व देते हैं। जो सत्ता से प्रश्न पूछने को देशद्रोह नहीं मानते और विपक्ष से सवाल करने को पक्षपात नहीं समझते। जो खबर को खबर की तरह लिखते हैं, विज्ञापन की तरह नहीं।
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने पर शायद हमें भाषणों से ज्यादा आत्ममंथन की जरूरत है। यह तय करने की जरूरत है कि हम पत्रकार बनना चाहते हैं या पत्रकर्मी। क्योंकि पत्रकारिता का भविष्य किसी विश्वविद्यालय की डिग्री, किसी चैनल की टीआरपी या किसी नेता की कृपा से तय नहीं होगा। उसका भविष्य उस रिपोर्टर से तय होगा जो आज भी किसी दूर-दराज़ गाँव में खड़ा होकर सच लिखने की जिद कर रहा है।
और जब तक वह जिद जिंदा है, तब तक पत्रकारिता की अर्थी नहीं निकल सकती। बाकी उत्सव तो चलते रहेंगे, डंके बजते रहेंगे, घोषणाएँ होती रहेंगी और हम 200 वर्ष पूरे होने पर भी पत्रकारिता से वही पुराना सवाल पूछते रहेंगे”तुम आखिर हो किसके लिए?”।
