अखबार में भोजन या खाद्य सामग्री परोसने का खतरा: एफएसएसएआई की चेतावनी, सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती और सुरक्षित खाद्य संस्कृति की आवश्यकता
खाद्य सुरक्षा और मानक (पैकेजिंग) नियम, 2018 के अंतर्गत अखबारों अथवा अन्य अनधिकृत सामग्रियों का उपयोग भोजन रखने,लपेटने या परोसने के लिए नहीं किया जा सकता -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर खाद्य सुरक्षा आज केवल एक स्वास्थ्य संबंधी विषय नहीं रह गई है,बल्कि यह मानव जीवन, आर्थिक विकास,सामाजिक स्थिरता और सतत विकास का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुकी है। जिस प्रकार स्वच्छ जल, स्वच्छ वायु और सुरक्षित आवास मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक हैं, उसी प्रकार सुरक्षित भोजन भी स्वस्थ जीवन की आधारशिला है। यदि भोजन ही दूषित हो जाए तो वह पोषण का स्रोत बनने के बजाय बीमारी का कारण बन जाता है। हाल ही में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) द्वारा जारी की गई चेतावनी ने खाद्य सुरक्षा के एक ऐसे पहलू को उजागर किया है जिसे आमतौर पर लोग सामान्य और हानिरहित मान लेते हैं। एफएसएसएआई ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अखबार में भोजन पैक करना या परोसना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया सिटी सहित भारत के हर शहर में यह देखते आ रहा हूं क़ि दशकों से भारत के अनेक हिस्सों में समोसा,पकौड़े, वड़ा- पाव, जलेबी, पराठा और अन्य खाद्य पदार्थों को अखबार में लपेटकर देने की परंपरा रही है। कई लोगों को यह सामान्य और सुविधाजनक लग सकता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह एक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम है। एफएसएसएआई की चेतावनी केवल एकप्रशासनिक निर्देश नहीं बल्कि जनस्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।यह सलाह उस समय जारी की गई जब मुंबई में एक वड़ा-पाव विक्रेता द्वारा भोजन को अखबार में पैक और परोसने का मामला सामने आया। घटना के बाद एफएसएसएआई के पश्चिमी क्षेत्रीय कार्यालय और ग्रेटर मुंबई नगर निगम ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए खाद्य विक्रेताओं को निर्देश जारी किए। यह घटना केवल मुंबई तक सीमित नहीं है। भारत के लगभग सभी राज्यों में छोटी- बड़ी खाद्य दुकानों पर आज भी अखबारों का उपयोग भोजन लपेटने के लिए किया जाता है। कई बार ग्राहक भी इसे सामान्य मानकर स्वीकार कर लेते हैं, जबकि इसके पीछे छिपे स्वास्थ्य जोखिमों से अनजान रहते हैं।यही कारण है कि हर वर्ष विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस मनाकर सरकारों, नियामक संस्थाओं, उद्योगों और नागरिकों को खाद्य सुरक्षा के प्रति जागरूक किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार दूषित भोजन के कारण दुनिया भर में करोड़ों लोग बीमार पड़ते हैं और लाखों लोगों की मृत्यु तक हो जाती है।बैक्टीरिया,
वायरस,परजीवी,रसायन और भारी धातुएं खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करके गंभीर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न कर सकती हैं। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जहां सड़क किनारे खाद्य विक्रेताओं से लेकर बड़े रेस्तरां और खाद्य उद्योग तक करोड़ों लोगों को प्रतिदिन भोजन उपलब्ध कराते हैं।

साथियों, वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो अखबारों में उपयोग की जाने वाली मुद्रण स्याही भोजन के संपर्क में आने के लिए नहीं बनाई जाती। समाचार पत्रों को छापने में विभिन्न प्रकार के रसायनों, पिगमेंट, सॉल्वेंट, बाइंडर और भारी धातुओं का उपयोग किया जाता है। इनमें सीसा (लेड), कैडमियम और अन्य रासायनिक तत्व शामिल हो सकते हैं। जब गर्म, तेलीय या नमी युक्त खाद्य पदार्थ सीधे अखबार के संपर्क में आते हैं, तो इन रसायनों के भोजन में स्थानांतरित होने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि खाद्य वैज्ञानिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से अखबार में भोजन परोसने का विरोध करते रहे हैं।सीसा जैसे भारी धातु मानव शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक माने जाते हैं। इनके लंबे समय तक सेवन से तंत्रिका तंत्र, मस्तिष्क, यकृत, गुर्दे और रक्त निर्माण प्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। बच्चों में सीसा विषाक्तता का प्रभाव और भी गंभीर होता है क्योंकि इससे उनकी मानसिक एवं शारीरिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है।गर्भवती महिलाओं में भी ऐसे रसायनों का प्रभाव भ्रूण के विकास पर पड़ सकता है। इसलिए खाद्य सुरक्षा केवल तत्काल बीमारी से बचाव का विषय नहीं है बल्कि दीर्घकालिक स्वास्थ्य संरक्षण का भी मुद्दा है।
साथियों, अखबार से जुड़ा दूसरा बड़ा खतरा स्वच्छता का है। अखबार छपाई के बाद विभिन्न स्थानों से होकर गुजरते हैं। उन्हें गोदामों में रखा जाता है, परिवहन के दौरान अनेक लोगों द्वारा छुआ जाता है और वितरण के दौरान विभिन्न प्रकार की धूल, गंदगी तथा रोगाणुओं के संपर्क में आते हैं। कई बार अखबार जमीन पर रखे जाते हैं या अस्वच्छ वातावरण में संग्रहित होते हैं। ऐसे में उन पर बैक्टीरिया, वायरस और अन्य सूक्ष्मजीव मौजूद हो सकते हैं। यदि इन्हीं अखबारों में भोजन लपेटा जाता है तो रोगाणु भोजन तक पहुंच सकते हैं और उपभोक्ताओं को बीमार कर सकते हैं।
साथियों, विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि खाद्य जनित रोग विश्व स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हैं।साल्मोनेला, ई- कोलाई, लिस्टेरिया और नोरोवायरस जैसे रोगजनक सूक्ष्मजीव दूषित भोजन के माध्यम से फैल सकते हैं। इनके कारण दस्त, उल्टी, पेट दर्द, बुखार और गंभीर मामलों में अस्पताल में भर्ती होने तक की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों, बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह खतरा और अधिक बढ़ जाता है। इसलिए भोजन की तैयारी, भंडारण, परिवहन और परोसने की प्रत्येक प्रक्रिया में सुरक्षा मानकों का पालन आवश्यक है।एफएसएसएआई ने अपनी चेतावनी में यह भी स्पष्ट किया है कि खाद्य सुरक्षा और मानक (पैकेजिंग) नियम, 2018 के अंतर्गत अखबार या अन्य गैर- अनुमोदित सामग्री में भोजन रखने,लपेटने या परोसने की अनुमति नहीं है। यह नियम केवल औपचारिकता नहीं बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान और स्वास्थ्य सुरक्षा के सिद्धांतों पर आधारित है। पैकेजिंग सामग्री को खाद्य-ग्रेड होना चाहिए ताकि वह भोजन के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया न करे और उसमें कोई हानिकारक तत्व न छोड़े। यही कारण है कि विकसित देशों में खाद्य पैकेजिंग के लिए अत्यंत कठोर मानक लागू किए जाते हैं।

साथियों, भारत में खाद्य व्यवसायों का दायरा अत्यंत व्यापक है। इसमें सड़क किनारे के विक्रेता, छोटे रेस्तरां, होटल, कैटरिंग सेवाएं, क्लाउड किचन, क्विक सर्विस रेस्तरां, हॉकर और मोबाइल फूड वेंडर शामिल हैं। एफएसएसएआई की सलाह इन सभी पर समान रूप से लागू होती है। यह संदेश स्पष्ट है कि चाहे व्यवसाय छोटा हो या बड़ा, उपभोक्ताओं को सुरक्षित भोजन उपलब्ध कराना उसकी जिम्मेदारी है। आर्थिक सुविधा या पारंपरिक आदतों के नाम पर स्वास्थ्य से समझौता नहीं किया जा सकता।खाद्य सुरक्षा का विषय केवल नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है उपभोक्ताओं की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि ग्राहक स्वयं अखबार में पैक भोजन लेने से इंकार करें और सुरक्षित पैकेजिंग की मांग करें, तो बाजार में सकारात्मक परिवर्तन तेजी से आ सकता है। उपभोक्ता जागरूकता अक्सर कानूनों से अधिक प्रभावी साबित होती है क्योंकि बाजार अंततः उपभोक्ता की मांग के अनुसार स्वयं को ढालता है।बता दें,आज विश्व भर में टिकाऊ और सुरक्षित पैकेजिंगसमाधानों पर विशेष जोर दिया जा रहा है। प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या को देखते हुए जैव-अवक्रमणीय पर्यावरण-अनुकूल और खाद्य- ग्रेड पैकेजिंग सामग्री विकसित की जा रही है। भारत भी इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। बायो-बेस्ड पैकेजिंग, खाद्य- ग्रेड पेपर,बांस आधारित सामग्री और अन्य नवीन विकल्प खाद्य उद्योग में लोकप्रिय हो रहे हैं। इनका उद्देश्य केवल पर्यावरण संरक्षण ही नहीं बल्कि उपभोक्ताओं की स्वास्थ्य सुरक्षा भी है।
साथियों, हाल के वर्षों में खाद्य सुरक्षा के प्रति भारत का दृष्टिकोण अधिक सख्त और वैज्ञानिक हुआ है।एफएसएसएआई नियमित रूप से निरीक्षण, परीक्षण और जागरूकता कार्यक्रम संचालित कर रहा है। मई महीने में एक वायरल वीडियो के बाद ट्रेन संख्या 12223 लोकमान्य तिलक टर्मिनस-एर्नाकुलम दुरंतो एक्सप्रेस में बर्तनों की अस्वच्छ हैंडलिंग के आरोपों पर आईआरसीटीसी को कानूनी नोटिस जारी किया जाना इसी दिशा में उठाया गया कदम था। यह दर्शाता है कि नियामक संस्थाएं अब खाद्य सुरक्षा संबंधी शिकायतों को गंभीरता से ले रही हैं और जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही हैं।रेलवे, हवाई अड्डों, स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक आयोजनों में भोजन की सुरक्षा विशेष महत्व रखती है क्योंकि यहां बड़ी संख्या में लोगों को भोजन परोसा जाता है। यदि किसी एक स्थान पर स्वच्छता मानकों की अनदेखी होती है तो उसका प्रभाव हजारों लोगों पर पड़ सकता है। इसलिए खाद्य सुरक्षा का सिद्धांत फार्म टू फोर्क अर्थात खेत से थाली तक प्रत्येक चरण में लागू होना चाहिए।
साथियों, वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में भी सुरक्षित और पौष्टिक भोजन को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। खाद्य सुरक्षा का संबंध केवल बीमारी रोकने से नहीं बल्कि गरीबी उन्मूलन, बेहतर स्वास्थ्य, गुणवत्तापूर्ण जीवन और आर्थिक उत्पादकता से भी है। बीमारियों के कारण स्वास्थ्य व्यय बढ़ता है, कार्य क्षमता घटती है और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। इसलिए सुरक्षित भोजन में निवेश वास्तव में मानव पूंजी में निवेश है।भारत जैसे देश में जहां स्ट्रीट फूड संस्कृति अत्यंत लोकप्रिय है, वहां संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है। स्ट्रीट फूड भारतीय खानपान की पहचान है और लाखों लोगों की आजीविका का स्रोत भी है। उद्देश्य इसे समाप्त करना नहीं बल्कि इसे अधिक सुरक्षित और स्वच्छ बनाना है। प्रशिक्षण, जागरूकता, सस्ती खाद्य-ग्रेड पैकेजिंग की उपलब्धता और नियमित निगरानी के माध्यम से इस क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि एफएसएसएआई की अखबार में भोजन न परोसने संबंधी चेतावनी हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि खाद्य सुरक्षा छोटे-छोटे व्यवहारों से शुरू होती है। जो चीजें वर्षों से सामान्य लगती रही हों, वे वैज्ञानिक परीक्षणों में असुरक्षित सिद्ध हो सकती हैं। इसलिए परंपरा से अधिक महत्व विज्ञान और स्वास्थ्य को दिया जाना चाहिए। सुरक्षित भोजन प्रत्येक नागरिक का अधिकार और प्रत्येक खाद्य व्यवसाय की जिम्मेदारी है। यदि सरकार, उद्योग, विक्रेता और उपभोक्ता मिलकर खाद्य सुरक्षा के सिद्धांतों का पालन करें, तो न केवल बीमारियों को रोका जा सकता है बल्कि एक स्वस्थ, उत्पादक और सुरक्षित समाज का निर्माण भी किया जा सकता है। विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस का वास्तविक उद्देश्य भी यही है कि भोजन केवल पेट भरने का माध्यम न रहे, बल्कि स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानव गरिमा का आधार बने।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425
