ईरान नें होर्मुज जलडमरूमध्य बंद से ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार मुद्रास्फीति और आर्थिक स्थिरता को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं
होर्मुज जलडमरूमध्य बंद से केवल क्षेत्रीय नहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका की संभावना?, इस जलमार्ग में व्यवधान का असर सीधे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर दिखाई देता है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल का केंद्र बन गया है। 11 जून 2026 को स्थिति तब और गंभीर हो गई जब ईरान ने अमेरिका के साथ बढ़ते सैन्य टकराव के बीच दुनियाँ के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक, होर्मुज जलडमरूमध्य, को सभी वाणिज्यिक जहाजों और तेल टैंकरों के लिए बंद करने की घोषणा कर दी। ईरानी सैन्य नेतृत्व ने चेतावनी दी है कि जलडमरूमध्य से गुजरने की कोशिश करने वाले किसी भी जहाज को निशाना बनाया जाएगा। यह कदम कथित रूप से अमेरिका और ईरान के बीच समुद्री टकराव तथा अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों के बाद उठाया गया है। इसके साथ ही वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भारी बेचैनी फैल गई है। ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 95.40 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी डब्ल्यूटीआई लगभग 92.6 डॉलर प्रतिबैरल तक पहुंच गया है। दुनियाँ की लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस आपूर्ति इसी मार्ग से गुजरती है, इसलिए इस घटनाक्रम ने ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार, मुद्रास्फीति और आर्थिक स्थिरता को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत ने भी खाड़ी क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों पर बढ़ते हमलों और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताव्यक्त की है। वर्तमान घटनाक्रम केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यह बिल्कुल सही है क़ि होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा व्यवस्था की धुरी माना जाता है। फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री मार्ग सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर, इराक और ईरान जैसे प्रमुख ऊर्जा उत्पादक देशों के निर्यात का मुख्य रास्ता है। सामान्य परिस्थितियों में प्रतिदिन करोड़ों बैरल तेल और विशाल मात्रा में एलएनजी इसी मार्ग से दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचती है। यही कारण है कि जब भी इस जलमार्ग में व्यवधान आता है, उसका असर सीधे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर दिखाई देता है। वर्तमान संकट में भी निवेशकों और ऊर्जा कंपनियों ने आपूर्ति बाधित होने की आशंका को देखते हुए तेल खरीदना शुरू कर दिया,जिसके परिणामस्वरूप कच्चे तेल की कीमतों में तत्काल उछाल देखने को मिला।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय बाजारों की पहली प्रतिक्रिया तेल कीमतों में तेजी के रूप में सामने आई है। ब्रेंट क्रूड लगभग 95 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया है जबकि डब्ल्यूटीआई भी 92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि यदि जलडमरूमध्य लंबे समय तक बंद रहता है या सैन्य संघर्ष और बढ़ता है तो तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर भी जा सकती हैं। वैश्विक वित्तीय बाजारों में भी अस्थिरता बढ़ने की आशंका है क्योंकि ऊर्जा लागत लगभग हर आर्थिक गतिविधि को प्रभावित करती है।

साथियों, भारत के लिए यह संकट विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी आवश्यकता का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से पूरा होता है और उसका एक बड़ा भाग होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है। इसलिए इस मार्ग में किसी भी प्रकार की रुकावट का सीधा असर भारतीय ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है। यदि तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है तो भारत का आयात बिल बढ़ेगा,चालू खाता घाटा बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव पड़ सकता है। ऊर्जा आयात पर बढ़ती लागत अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचती है और महंगाई को बढ़ावा देती है।सबसे पहला प्रभाव पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दिखाई दे सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने से भारतीय तेल विपणन कंपनियों की लागत बढ़ जाती है। यदि मौजूदा तनाव कुछ और दिनों या सप्ताहों तक बना रहता है तो पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों का अनुमान है कि लंबी अवधि तक ऊंचे तेल मूल्य बने रहने पर ईंधन की कीमतों में कई रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हो सकती है। इसका सीधा असर आम नागरिकों, किसानों, उद्योगों और परिवहन क्षेत्र पर पड़ेगा।पेट्रोल और डीजल केवल वाहन चलाने का साधन नहीं हैं बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा हैं। डीजल की कीमत बढ़ने का अर्थ है कि ट्रकों, बसों और मालवाहक वाहनों की परिचालन लागत बढ़ जाएगी। जब परिवहन महंगा होता है तो फल, सब्जियां, दूध, अनाज, दवाइयां और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ने लगती हैं। यही कारण है कि तेल कीमतों में वृद्धि को अक्सर ‘महंगाई की जननी’ कहा जाता है। एक बार यदि ईंधन लागत बढ़ती है तो उसका असर अर्थव्यवस्था के लगभग हर क्षेत्र में सटीकता से दिखाई देता है।
साथियों, 7 जून 2026 से मृग लग गया है व खेती के कार्य शुरू हो चुके हैं,कृषि क्षेत्र भी इस संकट से अछूता नहीं रहेगा। भारत में सिंचाई, कृषि मशीनरी और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला का बड़ा हिस्सा डीजल पर निर्भर है। डीजल महंगा होने से किसानों की लागत बढ़ेगी और इसका असर खाद्यान्न कीमतों पर पड़ सकता है। इसके अलावा उर्वरक उद्योग प्राकृतिक गैस और पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर निर्भर है। यदि ऊर्जा लागत बढ़ती है तो उर्वरकों का उत्पादन भी महंगा हो सकता है।विमानन क्षेत्र पर भी दबाव बढ़ सकता है। विमान ईंधन की लागत एयरलाइंस के कुल खर्च का बड़ा हिस्सा होती है। यदि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं तो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय हवाई किराए में वृद्धि संभव है। इससे पर्यटन उद्योग, व्यापारिक यात्राओं और विमानन क्षेत्र की मांग पर असर पड़ सकता है।
साथियों, भारत के लिए चिंता का एक और बड़ा विषय एलएनजी यानी तरल प्राकृतिक गैस की आपूर्ति है। भारत कतर सहित खाड़ी देशों से बड़ी मात्रा में एलएनजी आयात करता है और उसका महत्वपूर्ण हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। यदि इस मार्ग में लंबे समय तक व्यवधान रहता है तो सीएनजी और पीएनजी की उपलब्धता तथा कीमतों पर असर पड़ सकता है। इससे घरेलू उपभोक्ताओं के साथ- साथ बिजली उत्पादन, उर्वरक निर्माण और औद्योगिक इकाइयों की लागत भी बढ़ सकती है।हालांकि स्थिति गंभीर है, लेकिन भारत पूरी तरह असहाय नहीं है। पिछले वर्षों में भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। देश के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार मौजूद हैं जिनका उपयोग आपातकालीन परिस्थितियों में किया जा सकता है।विशाखापट्टनम मैंगलोर और पादुर जैसेस्थानों पर स्थापित भूमिगत भंडारण सुविधाएं सीमित अवधि के लिए देश को राहत प्रदान कर सकती हैं। ये भंडार किसी भी अचानक आपूर्ति संकट के दौरान महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच साबित हो सकते हैं।इसके अतिरिक्त भारत नेऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति अपनाई है। रूस से बढ़ते तेल आयात ने भारत को एक वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत उपलब्ध कराया है। रूस से आने वाला तेल सामान्यतः अन्य समुद्री मार्गों से आता है, इसलिए होर्मुज संकट की स्थिति में यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है। यदि आवश्यकता हुई तो भारत रूस तथा अन्य गैर-खाड़ी आपूर्ति कर्ताओं से आयात बढ़ाने की दिशा में सटिका से कदम उठा सकता है।

साथियों, सऊदी अरब,यूएई और अन्य खाड़ी देशों के पास भी कुछ वैकल्पिक पाइपलाइन मार्ग उपलब्ध हैं जिनके माध्यम से सीमित मात्रा में तेल निर्यात किया जा सकता है। हालांकि ये मार्ग होर्मुज के पूर्ण विकल्प नहीं हैं, फिर भी वे वैश्विक बाजार में आपूर्ति के पूर्ण ठहराव को रोकने में मदद कर सकते हैं। इसी कारण ऊर्जा बाजारों में अभी भी आशा बनी हुई है कि राजनयिक प्रयासों के माध्यम से स्थिति को नियंत्रित किया जा सकेगा।भू-राजनीतिक दृष्टि से यह संकट केवल तेल या गैस तक सीमित नहीं है। होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व समुद्री व्यापार के सबसे संवेदनशील मार्गों में से एक है। इसके बंद होने से बीमा लागत, माल ढुलाई शुल्क और शिपिंग समय में वृद्धि होती है। अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक कंपनियों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ते हैं, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। कोविड-19 महामारी और यूक्रेन संकट के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले ही आपूर्ति व्यवधानों का अनुभव कर चुकी है; ऐसे में होर्मुज संकट नई चुनौतियां पैदा कर सकता है।
साथियों, भारत ने संयुक्त राष्ट्र में स्पष्ट रूप से कहा है कि क्षेत्र में बढ़ते हमले और समुद्री असुरक्षा वैश्विक व्यापार तथा भारतीय नागरिकों दोनों के लिए चिंता का विषय हैं। भारत की प्राथमिकता अपने नागरिकों, व्यापारिक जहाजों और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसलिए नई दिल्ली स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक समाधान का समर्थन कर रही है।वर्तमान परिस्थितियों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यह संकट कितने समय तक चलता है। यदि राजनयिक प्रयास सफल होते हैं और जलडमरूमध्य जल्द खुल जाता है तो तेल बाजारों में स्थिरता लौट सकती है। लेकिन यदि सैन्य टकराव बढ़ता है या मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को गंभीर झटका लग सकता है। तेल की कीमतें तीन अंकों तक पहुंच सकती हैं, महंगाई बढ़ सकती है और कई आयात- निर्भर देशों को आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना केवल पश्चिम एशिया का संकट नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है। ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार, महंगाई, समुद्री सुरक्षा और भू-राजनीतिक स्थिरता,सभी इस एक समुद्री मार्ग से जुड़े हुए हैं। भारत के लिए यह समय ऊर्जा स्रोतों में विविधता, रणनीतिक भंडारों के विस्तार और दीर्घकालिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयासों को और तेज करने का है।आने वाले दिनों में दुनिया की नजरें पश्चिम एशिया पर टिकी रहेंगी, क्योंकि होर्मुज की स्थिति केवल तेल की कीमतों का नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता का भी निर्धारण करेगी।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425
