ड्रग्स (फिफ्थ अमेंडमेंट) रूल्स, 2026 केवल कफ़ सिरप पर रोक या प्रिस्क्रिप्शन अनिवार्यता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की दवा सुरक्षा व्यवस्था को पुनर्गठित करने वाला एक व्यापक सुधार है
खांसी, जुकाम और श्वसन संबंधी सामान्य रोगों में प्रयुक्त कफ सिरप बिना प्रिस्क्रिप्शन बंदिश के बावजूद ग्रामीण शहरी क्षेत्रों में आसानी से उपलब्ध होंगी- ड्रग विभाग की तात्कालिक जबरदस्त छापेमारी ज़रूरी -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत में स्वास्थ्य सुरक्षा और दवा नियमन के क्षेत्र में वर्ष 2026 एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज किया जाएगा। केंद्र सरकार द्वारा 9 जून 2026 को अधिसूचित ड्रग्स (फिफ्थ अमेंडमेंट) रूल्स, 2026 केवल एक साधारण कानूनी संशोधन नहीं है, बल्कि यह देश की दवा वितरण प्रणाली,सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा और औषधीय उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की दिशा में एक व्यापक सुधारात्मक पहल है। लंबे समय से कफ सिरप और अन्य औषधीय सिरपों के दुरुपयोग, मिलावट,अनधिकृत बिक्री तथा इनके कारण उत्पन्न गंभीर स्वास्थ्य संकटों को देखते हुए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने औषधि नियम, 1945 में संशोधन कर एक ऐसा कदम उठाया है जिसका प्रभाव देश के प्रत्येक नागरिक, चिकित्सक, फार्मासिस्ट, दवा निर्माता तथा स्वास्थ्य प्रशासन पर पड़ेगा। मै एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि यह निर्णय विशेष रूप से उस पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण हो जाता है जब पिछले कुछ वर्षों में दुनियाँ के कई देशों में भारतीय मूल के कफ सिरपों में डाइएथिलीन ग्लाइकोल और एथिलीन ग्लाइकोल जैसे विषैले रसायनों की उपस्थिति के कारण बच्चों की मृत्यु के मामले सामने आए थे, जिससे भारत की फार्मास्युटिकल प्रतिष्ठा पर भी प्रश्नचिह्न लगे थे। भारत में औषधियों का नियमन ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 तथा उसके अंतर्गत बनाए गए ड्रग्स रूल्स, 1945 के माध्यम से किया जाता है।यह कानून औषधियों के निर्माण,परीक्षण, भंडारण, वितरण और बिक्री के लिए आधारभूत कानूनी ढांचा प्रदान करता है। समय के साथ बदलती तकनीक, नई स्वास्थ्य चुनौतियों और दवाबाजार के विस्तार को देखते हुए इन नियमों में अनेक संशोधन किए गए हैं।वर्ष 2026 का यह संशोधन भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा है,किंतु इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि यह सीधे तौर पर आम नागरिकों द्वारा व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली दवाओं से संबंधित है। खांसी, जुकाम और श्वसन संबंधी सामान्य रोगों में प्रयुक्त कफ सिरप लंबे समय से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में आसानी से उपलब्ध रहे हैं। कई स्थानों पर इन्हें बिना चिकित्सकीय परामर्श के खरीदा और बेचा जाता रहा है, जिससे दवा के दुरुपयोग, गलत उपचार तथा स्वास्थ्य जोखिमों की सटीकता से संभावना बनी रहती थी।

साथियों, इस संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकार ने ड्रग्स रूल्स, 1945 की अनुसूची के में मौजूद उस प्रावधान को बदल दिया है जिसके अंतर्गत कुछ परिस्थितियों में सिरपों को लाइसेंसिंग और वितरण संबंधी विशेष छूट प्राप्त थी। अनुसूची ‘के’ मूल रूप से ऐसी दवाओं की श्रेणियों को निर्दिष्ट करती है जिन्हें कुछ नियामकीय प्रावधानों से छूट दी जा सकती है। पहले 1,000 से कम आबादी वाले गांवों में कुछ प्रकार की खांसी की दवाओं और सिरपों की बिक्री बिना पूर्ण लाइसेंसिंग व्यवस्था के भी संभव थी। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना था। किंतु समय के साथ यह व्यवस्था कई समस्याओं का कारण बनने लगी। अनधिकृत विक्रेताओं द्वारा दवाओं का भंडारण, गलत दवाओं की बिक्री, गुणवत्ता नियंत्रण की कमी तथा दवा दुरुपयोग जैसी शिकायतें बढ़ने लगीं। इसी संदर्भ में सरकार ने अनुसूची ‘के’ की संबंधितप्रविष्टि से सिरप शब्द को हटाने का निर्णय लिया है।सिरप शब्द हटाए जाने का प्रभाव अत्यंत व्यापक है। अब खांसी की सिरप सहित अन्य औषधीय सिरपों को वह छूट प्राप्त नहीं होगी जो पहले उपलब्ध थी। इसका अर्थ है कि इन दवाओं की बिक्री और वितरण अब केवल विधिवत लाइसेंस प्राप्त फार्मेसियों और अधिकृत दवा विक्रेताओं के माध्यम से ही किया जा सकेगा। इससे दवा वितरण श्रृंखला पर नियामकीय नियंत्रण मजबूत होगा और अनधिकृत दुकानों अथवा गैर-लाइसेंसधारी विक्रेताओं द्वारा सिरप बेचने की प्रथा समाप्त होगी। व्यावहारिक रूप से इसका परिणाम यह होगा कि आम नागरिकों को ऐसी दवाएं प्राप्त करने के लिए चिकित्सकीय सलाह और वैध औषधीय व्यवस्था का सहारा लेना होगा।
साथियों, इस निर्णय के पीछे केवल प्रशासनिक कारण नहीं हैं, बल्कि गहरे सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी कारण भी हैं। पिछले वर्षों में दुनिया के विभिन्न देशों में कफ सिरप से जुड़ी दुखद घटनाओं ने वैश्विक स्तर पर चिंता पैदा की थी। कुछ मामलों में सिरप निर्माण के दौरान प्रयुक्त सॉल्वेंट्स में डाइएथिलीन ग्लाइकोल औरएथिलीन ग्लाइकोल जैसे विषैले तत्व पाए गए, जिनके सेवन से बच्चों की मृत्यु तक हुई। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि तरल दवाओं के निर्माण और वितरण पर अधिक कठोर निगरानी की आवश्यकता है। भारत, जो विश्व की प्रमुख जेनेरिक दवा उत्पादक शक्ति है, के लिए यह केवल स्वास्थ्य सुरक्षा का विषय नहीं था बल्किw वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रश्न भी था। इसलिए सरकार ने न केवल बिक्री संबंधी नियमों को कठोर किया बल्कि निर्माण प्रक्रिया और गुणवत्ता नियंत्रण मानकों को भी सुदृढ़ बनाने की दिशा में कदम उठाए।
साथियों, इसी संदर्भ में गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस तथा अनुसूची ‘एम’ में किए गए सुधार भी उल्लेखनीय हैं। संशोधित प्रावधानों के अनुसार दवा निर्माण इकाइयों को अधिक उन्नत गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली,जोखिम प्रबंधन प्रणाली और स्वच्छता मानकों का पालन करना होगा। फार्मास्युटिकल क्वालिटी सिस्टम तथा क्वालिटी रिस्क मैनेजमेंट जैसे वैश्विक मानकों को भारतीय औषधि उद्योग में अधिक प्रभावी रूप से लागू किया जा रहा है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि निर्माण प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में गुणवत्ता नियंत्रण किया जाए और संभावित जोखिमों की समय रहते सटीकता से पहचान हो सके।
साथियों,सरकार ने तरल दवाओं के लिए एथिलीन ग्लाइकोल और डाइएथिलीन ग्लाइकोल की अनिवार्य जांच को भी महत्वपूर्ण बनाया है। यह कदम विशेष रूप से बच्चों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक माना जा रहा है। किसी भी सिरप के बाजार में आने से पहले उसके रासायनिक परीक्षण और गुणवत्ता प्रमाणीकरण की प्रक्रिया अब और अधिक सख्त होगी। इससे नकली, मिलावटी या निम्न गुणवत्ता वाली दवाओं के बाजार में पहुंचने की संभावना कम होगी।हालांकि इस निर्णय के सकारात्मक पक्ष जितने महत्वपूर्ण हैं, उतनी ही गंभीर चुनौतियां भी इसके साथ जुड़ी हुई हैं। भारत की एक बड़ी आबादी आज भी ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में निवास करती है,जहां स्वास्थ्य अवसंरचना सीमित है। अनेक गांवों में न तो पर्याप्त चिकित्सक उपलब्ध हैं और न ही लाइसेंस प्राप्त फार्मेसियां। पहले जहां स्थानीय दुकानों पर कफ सिरप आसानी से उपलब्ध हो जाता था,अब वहां के लोगों को दवा प्राप्त करने के लिए नजदीकी कस्बों या शहरों का रुख करना पड़ सकता है।इससे समय,धन और संसाधनों की अतिरिक्त आवश्यकता होगी। विशेष रूप से बुजुर्गों, बच्चों और गरीब परिवारों के लिए यह एक व्यावहारिक चुनौती बन सकती है।

साथियों, फिर भी सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अल्पकालिक असुविधा की तुलना में दीर्घकालिक स्वास्थ्य सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण है। यदि अनधिकृत बिक्री के कारण घटिया या खतरनाक दवाएं लोगों तक पहुंचती हैं तो उसका नुकसान कहीं अधिक गंभीर हो सकता है।इसलिए सरकार का प्रयास यह प्रतीत होता है कि दवा उपलब्धता और दवा सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। आने वाले समय में यदि ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक लाइसेंस प्राप्त मेडिकल स्टोर और टेलीमेडिसिन सुविधाएं विकसित की जाती हैं, तो इस चुनौती को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
साथियों, इस संशोधन का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलूदवा दुरुपयोग की रोकथाम से जुड़ा हुआ है। कई प्रकार के कफ सिरप में ऐसे तत्व पाए जाते हैं जिनका अनुचित उपयोग नशे के लिए किया जा सकता है। युवाओं और किशोरों में कुछ सिरपों के दुरुपयोग की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। बिना चिकित्सकीय निगरानी के इन दवाओं की उपलब्धता स्वास्थ्य और सामाजिक दोनों दृष्टियों से चिंता का विषय रही है। नए नियमों के माध्यम से सरकार ने इस जोखिम को कम करने का प्रयास किया है ताकि दवाओं का उपयोग केवल चिकित्सकीय आवश्यकता के अनुरूप ही सटीकता से हो। यह भी उल्लेखनीय है कि यह निर्णय अचानक नहीं लिया गया। दिसंबर 2025 में केंद्र सरकार ने मसौदाअधिसूचना जारी कर सार्वजनिक सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की थीं। दवा उद्योग, चिकित्सा विशेषज्ञों, नियामक संस्थाओं और अन्य हितधारकों से प्राप्त सुझावों का अध्ययन करने के बाद अंतिम नियम अधिसूचित किए गए। इस पूरी प्रक्रिया में ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड से भी परामर्श लिया गया। इससे स्पष्ट होता है कि यह संशोधन व्यापक विचार-विमर्श और वैज्ञानिक मूल्यांकन के आधार पर सटीकता से
किया गया है।
साथियों, वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो भारत का यह कदम उन विकसित देशों की नीतियों के अनुरूप है जहां औषधीय सिरपों की बिक्री पर कठोर नियंत्रण रखा जाता है। अमेरिका, यूरोप, जापान और अन्य विकसित स्वास्थ्य प्रणालियों में दवा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दीजाती है। वहां निर्माण से लेकर वितरण तक प्रत्येक चरण पर कठोर नियामकीय निगरानी होती है। भारत भी अब उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिससे उसकी फार्मास्युटिकल प्रणाली अधिक विश्वसनीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बन सके।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि , ड्रग्स (फिफ्थ अमेंडमेंट) रूल्स, 2026 केवल कफ सिरप पर रोक या प्रिस्क्रिप्शन अनिवार्यता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की दवा सुरक्षा व्यवस्था को पुनर्गठित करने वाला एक व्यापक सुधार है। इसका उद्देश्य दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करना, मिलावट और दुरुपयोग को रोकना, ग्रामीण क्षेत्रों में भी सुरक्षित औषधि वितरण को बढ़ावा देना तथा भारतीय फार्मास्युटिकल उद्योग को वैश्विक गुणवत्ता मानकों के अनुरूप बनाना है।यद्यपि इसके क्रियान्वयन में कुछ व्यावहारिक चुनौतियां सामने आएंगी फिर भी जनस्वास्थ्य की दृष्टि से यह एक दूरदर्शी और आवश्यक कदम माना जा सकता है। आने वाले वर्षों में इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार, स्वास्थ्य संस्थाएं, दवा उद्योग और समाज मिलकर इसे कितनी प्रभावी ढंग से लागू करते हैं। भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में यह सुधार न केवल नागरिकों की सुरक्षा को मजबूत करेगा बल्कि विश्व मंच पर देश की औषधीय विश्वसनीयता को भी नई ऊंचाई प्रदान करेगा।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
