
दुनियाँ फिर दहशत में? -समग्र व्यापक विश्लेषणइस्लामाबाद एमओयू समझौता- विरोधाभासी स्थिति ने वैश्विक ऊर्जा बाजार, वित्तीय बाजारों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को अनिश्चितता के भंवर में धकेल दिया हैहोर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान ऊर्जा लागत बढ़ाकर मुद्रास्फीति को फिर से भड़का सकता है, एशिया के बड़े आयातक देशों-भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ सकता है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्रगोंदिया – वैश्विक स्तरपर पश्चिम एशिया में शांति की जो किरण 17-18 जून 2026 कोअमेरिका और ईरान के बीच हुए 14- सूत्रीय “इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू )” के बाद दिखाई दी थी,वह महज कुछ दिनों में ही गंभीर परीक्षा के दौर में पहुंच गई है। 21 जून 2026 को शाम 4 बजे तक की स्थिति यह संकेत दे रही है कि जिस समझौते को क्षेत्रीय युद्ध विराम, होर्मुज जलडमरूमध्य के पुनः खुलने और 60 दिनों के भीतर व्यापक शांति समझौते की दिशा में ऐतिहासिक पहल माना जा रहा था,वह अब गहरे संकट में है।ईरान नेआरोप लगाया है

कि अमेरिका और इज़राइल ने समझौते की मूल भावना तथा विशेष रूप से लेबनान मोर्चे पर युद्धविराम संबंधी प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं किया। इसके जवाब में तेहरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को पुनः बंद करने की घोषणा कर दी है,जबकि अमेरिकी पक्ष का कहना है कि समुद्री यातायात अभी भी जारी है और बड़ी संख्या में व्यापारिक जहाज इस मार्ग से गुजर रहे हैं।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि इसी विरोधाभासी स्थिति ने वैश्विक ऊर्जा बाजार,वित्तीय बाजारों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को एक बार फिर अनिश्चितता के भंवर में धकेल दिया है। अब पूरी दुनियाँ की निगाहें 23 से 25 जून के बीच स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित अमेरिका-ईरान वार्ता पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि यह समझौता बचाया जा सकता है या पश्चिम एशिया एक नए और अधिक गंभीर संकट की ओर बढ़ रहा है। साथियों, अमेरिका और ईरान के बीच जिस 14-सूत्रीय समझौते की घोषणा की गई थी,उसका मूल उद्देश्य केवल दोनों देशों के बीच तनाव कम करना नहीं था, बल्कि पूरे क्षेत्र में फैले संघर्ष को नियंत्रित करना था। समझौते के प्रमुख बिंदुओं में सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाइयों का अंत, लेबनान में युद्धविराम,होर्मुजजलडमरूमध्य का पुनः खुलना, ईरानी तेल निर्यात पर प्रतिबंधों में राहत, परमाणु कार्यक्रम पर आगे की वार्ता तथा 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते तक पहुंचने का रोडमैप शामिल था। समझौते को अंतरिम ढांचा माना गया था, न कि अंतिम शांति संधि। इसी कारण इसकी सफलता इस बात पर निर्भर थी कि संबंधित पक्ष जमीन पर हिंसा रोकने में कितने सफल रहते हैं।लेकिन समझौते के लागू होने के तुरंत बाद लेबनान मोर्चे पर तनाव फिर बढ़ गया। इज़राइल और हिजबुल्लाह के बीच नई झड़पों तथा इज़रायली सैन्य अभियानों ने तेहरान को यह कहने का अवसर दिया कि समझौते की पहली और सबसे महत्वपूर्ण शर्त का उल्लंघन हो चुका है। ईरान का तर्क है कि यदि युद्धविराम स्थायी और व्यापक होना था, तो अमेरिका को अपने सहयोगी इज़राइल को रोकना चाहिए था। तेहरान के अनुसार ऐसा नहीं हुआ और परिणाम स्वरूप समझौते की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया। साथियों, इसी पृष्ठभूमि में ईरान ने एक बार फिर होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की घोषणा की। ईरानी सैन्य प्रतिष्ठान और संबंधित अधिकारियों ने चेतावनी दी कि जब तक समझौते की शर्तों का वास्तविक अनुपालन नहीं होता, तब तक ऊर्जा आपूर्ति को सामान्य नहीं होने दिया जाएगा। ईरान का कहना है कि दक्षिणी लेबनान से इज़रायली सैन्य गतिविधियां समाप्त होनी चाहिए, अमेरिकी नौसैनिक दबाव पूरी तरह हटना चाहिए और क्षेत्र में सैन्य तनाव कम होना चाहिए। अन्यथा होर्मुज का प्रश्न केवल समुद्री मार्ग का नहीं बल्कि व्यापक सुरक्षा व्यवस्था का विषय रहेगा।हालांकि अमेरिकी पक्ष इस दावे से पूरी तरह सहमत नहीं है।अमेरिकी केंद्रीय कमान (सेंटकॉम) ने कहा है कि जलडमरूमध्य से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही जारी है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार 55 से अधिक व्यापारिक जहाज हाल ही में इस मार्ग से गुजरे और उन्होंने 17 मिलियन बैरल से अधिक तेल तथा अन्य माल का परिवहन

कियावाशिंगटन का तर्क है कि ईरान की घोषणाएं और वास्तविक समुद्री स्थिति में अंतर हो सकता है। यही कारण है कि अमेरिका इस संकट को वार्ता के माध्यम से हल करने की सटीकता से कोशिश कर रहा है। साथियों, यह विवाद केवलe क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की धुरी माना जाता है। विश्व के समुद्री मार्ग से होने वाले तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, इराक और कतर जैसे ऊर्जाs उत्पादक देशों का निर्यात बड़े पैमाने पर इसी मार्ग पर निर्भर है। इसलिए जब भी होर्मुज के बंद होने की खबर आती है, वैश्विक बाजारों में तुरंत चिंता बढ़ जाती है।ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थितिs लंबी चली तो कच्चे तेल की कीमतों में तीव्र उछाल आ सकता है। पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले ही महामारी, यूक्रेन संघर्ष और आपूर्ति श्रृंखला संकटों से जूझ चुकी है। ऐसे में होर्मुज में व्यवधान ऊर्जा लागत बढ़ाकर मुद्रास्फीति को फिर से भड़का सकता है। एशिया के बड़े आयातक देशों-भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ सकता है। साथियों, भारत के लिए यहe संकट विशेष महत्व रखता है। भारत अपनी तेल आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है और खाड़ी क्षेत्र उसका प्रमुख स्रोत है। यदि होर्मुज में वास्तविक अवरोध उत्पन्न होता है तो कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा प्रभाव पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, उर्वरकों और परिवहन लागत पर पड़ सकता है। इससे महंगाई बढ़ने की आशंका रहेगी और आर्थिक विकास की गति पर भी दबाव पड़ सकता है। हालांकि भारत ने हाल के वर्षों में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बढ़ाने और आयात स्रोतों में विविधता लाने के प्रयास किए हैं, फिर भी होर्मुज का महत्व कम नहीं हुआ है।वित्तीय बाजार भी इस पूरे घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रखे हुए हैं। यदि सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो शेयर बाजारों में अस्थिरता देखी जा सकती है। ऊर्जा कंपनियों के शेयरों में तेजी आ सकती है जबकि विमानन, परिवहन और ऊर्जा-गहन उद्योगों पर दबाव बढ़ सकता है। निवेशक आमतौर पर ऐसे समय में सोना, अमेरिकी डॉलर और सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर रुख करते हैं। इसलिए यह संकट केवल भू-राजनीतिक नहीं बल्कि वित्तीय और आर्थिक चुनौती भी बन चुका है। साथियों दिलचस्प बात यह है कि इसी दौरान अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज संकट की बजाय जहाजों पर संभावित टोल टैक्स लगाने की चर्चा करके राजनीतिक बहस को नया मोड़ दे दिया। ट्रंप का तर्क है कि क्षेत्रीय संघर्षों से हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए ऐसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।हालांकि आलोचकों का कहना है कि वर्तमान संकट का मुख्य प्रश्न जलमार्ग की सुरक्षा और शांति समझौते का भविष्य है, न कि टोल वसूली।अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या अमेरिका-ईरान समझौता वास्तव में टूट चुका है? उपलब्ध संकेत बताते हैं कि स्थिति गंभीर अवश्य है, लेकिन समझौता औपचारिक रूप से समाप्त नहीं हुआ है। दोनों पक्ष अभी भी स्विट्जरलैंड में वार्ता के लिए तैयार हैं और मध्यस्थ देशों—विशेषकर कतर तथा पाकिस्तान की भूमिका जारी है। इसलिए इसे पूर्ण विफलता कहना जल्दबाजी होगी। बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि समझौता अपने पहले बड़े परीक्षण से सटिकता से गुजर रहा है। साथियों, 23-25 जून 2026 की वार्ता इसलिएनिर्णायक मानी जा रही है क्योंकि वहीं यह स्पष्ट होगा कि क्या लेबनान मोर्चे पर निगरानी तंत्र बनाया जा सकता है, क्या होर्मुज को स्थायी रूप से खुला रखा जा सकता है, क्या प्रतिबंधों में राहत की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी और क्या 60-दिवसीय शांति प्रक्रिया को बचाया जा सकेगा। यदि वार्ता सफल रहती है तो यह पश्चिम एशिया में स्थिरता की दिशा में बड़ा कदम होगी। लेकिन यदि वार्ता विफल हुई तो तेल बाजारों, वैश्विक व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए नए संकट का दौर शुरू हो सकता है।अतः अगर हम उपयोग पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि 21 जून 2026 तक का निष्कर्ष यही है कि “इस्लामाबाद एमओयू” अभी औपचारिक रूप से समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो चुके हैं। होर्मुज का पुनः बंद होना, लेबनान में जारी संघर्ष, अमेरिका और ईरान के परस्पर आरोप तथा ऊर्जा बाजारों में बढ़ती बेचैनी यह दर्शाती है कि पश्चिम एशिया की शांति अभी भी बेहद नाजुक अवस्था में है। आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि यह समझौता इतिहास में शांति की शुरुआत के रूप में दर्ज होगा या फिर एक ऐसे असफल प्रयास के रूप में, जो केवल कुछ दिनों की उम्मीद देकर वैश्विक संकट की नई कहानी लिख गया। *-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318*
