
– सुरेश सिंह बैसबिलासपुर। पिछले पांच दिनों से हो रही लगातार झमाझम बारिश ने जहां पूरे जिले को राहत दी है, वहीं बिलासपुर की जीवनदायिनी अरपा नदी भी एक बार फिर पूरे वेग से बहने लगी है। इस वर्ष मानसून लगभग एक माह की देरी से पहुंचा, लेकिन लगातार हो रही वर्षा ने नदी को नया जीवन दे दिया है। अरपा पाटोपाट पानी से लबालब भर गयी है। किसानों के चेहरों पर भी खुशी लौट आई है और खेतों में जुताई, बुवाई तथा धान की रोपाई का कार्य तेज हो गया है। यह वर्षा आमजन, किसानों और अरपा नदी तीनों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।जलदायिनी अरपा की दुर्दशा बरकरार, प्रशासन की सुस्ती लेकिन विडंबना यह है कि बारिश से भरपूर हुई अरपा की प्राकृतिक सुंदरता लौट आई है, पर उसकी स्थायी दुर्दशा अब भी जस की तस बनी हुई है।चुनावी वादों में सिमटा अरपा संरक्षणशहर के मध्य से बहने वाली जलदायिनी अरपा वर्षों से राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणापत्रों का प्रमुख मुद्दा रही है। हर चुनाव में नदी के संरक्षण, सौंदर्यीकरण और प्रदूषणमुक्त बनाने के बड़े-बड़े वादे किए गए, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही वे घोषणाएं फाइलों में सिमटकर रह गईं। भाजपा और कांग्रेस दोनों सरकारों ने अलग-अलग समय पर अरपा के उद्गम स्थल के संरक्षण, बैराज निर्माण तथा नदी पुनर्जीवन की घोषणाएं कीं, किंतु अधिकांश योजनाएं आज भी अधूरी हैं।हाईकोर्ट की सख्ती से बढ़ी कार्रवाईलगभग पांच वर्ष पूर्व अरपा नदी की बदहाल स्थिति को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। इसके बाद न्यायालय लगातार नदी संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और जल प्रवाह बनाए रखने से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहा है। हाईकोर्ट ने अरपा से संबंधित सभी याचिकाओं की सुनवाई अब मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष करने का निर्णय लिया है। न्यायालय ने कई अवसरों पर प्रशासन की धीमी कार्यप्रणाली पर नाराजगी भी जताई है। यदि न्यायालय लगातार हस्तक्षेप नहीं करता, तो संभवतः संरक्षण संबंधी अनेक योजनाएं आज भी प्रारंभ नहीं हो पातीं।अब भी अधूरी हैं कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं अरपा नदी के संरक्षण के लिए घोषित अनेक परियोजनाएं वर्षों बाद भी अधूरी हैं। शिवघाट और पचरीघाट बैराज व शिव घाट बैराज निर्माण जो अब लगभग पूर्ण हो चुका है। इन बैराजों पर बने पुल का निर्माण पूरा होने के बावजूद उसका उद्घाटन नहीं हुआ है। इसके चालू होने से अरपा रपटा पर लगने वाले ट्रैफिक जाम से लोगों को बड़ी राहत मिलेगी। पेंड्रा के अमरपुर स्थित अरपा के उद्गम स्थल के संरक्षण तथा जलकुंड निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया लंबे समय से लंबित है। शहर के लगभग 70 नालों और नालियों का गंदा पानी आज भी बिना उपचार के नदी में पहुंच रहा है। नदी तट पर मलबा और कचरा डंपिंग की समस्या भी लगातार बनी हुई है।एसटीपी निर्माण जारी, लेकिन लक्ष्य अभी दूरनगर निगम के अनुसार चिल्हाटी और दोमुंहानी स्थित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) के माध्यम से गंदे पानी के उपचार का कार्य किया जा रहा है। दोनों संयंत्रों की कुल क्षमता 71 एमएलडी है। स्मार्ट सिटी परियोजना के अंतर्गत लगभग 30 करोड़ रुपये की लागत से मंगला में दो तथा कोनी और जवाली नाला पर एक-एक नए एसटीपी का निर्माण कराया जा रहा है। इनके माध्यम से अतिरिक्त 25 एमएलडी गंदे पानी का उपचार किया जाएगा। इससे नगर निगम क्षेत्र के लगभग 70 से 80 प्रतिशत गंदे पानी के उपचार का लक्ष्य पूरा होने की उम्मीद है। हालांकि शत-प्रतिशत उपचार की व्यवस्था अभी भी दूर की बात है।एनटीपीसी से एमओयू भी अटकाप्रशासन का कहना है कि उपचारित पानी को एनटीपीसी को बेचने की योजना एमओयू के अभाव में अटकी हुई है। साथ ही शत-प्रतिशत गंदे पानी के उपचार के लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) तैयार कराया जा रहा है, जिसमें लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचई) को भी शामिल किया गया है।18 वर्षों में भी अधूरा सीवरेज प्रोजेक्टअरपा नदी में गंदे पानी की निकासी रोकने के उद्देश्य से वर्ष 2007-08 में शुरू हुई सीवरेज परियोजना आज भी अपने लक्ष्य से काफी दूर है। करीब 40 हजार घरों को सीवरेज नेटवर्क से जोड़ने की योजना बनाई गई थी, लेकिन 18 वर्षों में केवल 9,993 घरों को ही इससे जोड़ा जा सका है। यानी अभी तक लगभग 30 प्रतिशत लक्ष्य ही पूरा हो पाया है। वर्तमान में चिल्हाटी स्थित 17 एमएलडी क्षमता के एसटीपी में लगभग 15.50 एमएलडी तथा दोमुंहानी स्थित 54 एमएलडी क्षमता के प्लांट में लगभग 24 एमएलडी जल-मल का उपचार किया जा रहा है।परिणामस्वरूप करोड़ों लीटर गंदा पानी प्रतिदिन नालों के माध्यम से सीधे अरपा नदी में पहुंचकर उसे प्रदूषित कर रहा है।अब केवल घोषणाएं नहीं, परिणाम चाहिएअरपा केवल एक नदी नहीं, बल्कि बिलासपुर की सांस्कृतिक पहचान, आस्था और जीवनरेखा है। बारिश ने फिलहाल नदी को जल से भर दिया है, लेकिन उसका वास्तविक पुनर्जीवन तभी संभव होगा जब अधूरी परियोजनाएं समयबद्ध तरीके से पूरी हों, प्रदूषण पर प्रभावी रोक लगे और प्रशासन कागजी दावों के बजाय धरातल पर परिणाम दिखाए। हाईकोर्ट की लगातार निगरानी ने निश्चित रूप से प्रशासन को सक्रिय किया है, लेकिन अब समय आ गया है कि अरपा संरक्षण केवल सरकारी फाइलों और चुनावी मंचों तक सीमित न रहकर धरातल पर दिखाई दे। जलदायिनी अरपा को उसका खोया हुआ स्वाभिमान लौटाना अब प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और समाज ,सभी की साझा जिम्मेदारी है।
