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सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’बिलासपुर। संस्कार शहर की जीवनदायिनी अरपा नदी आज विकास और पर्यावरण के बीच उलझी हुई दिखाई देती है। एक ओर करोड़ों रुपये की लागत से शिवघाट और पचरीघाट बैराज बनाकर नदी में वर्षभर पानी रोकने की व्यवस्था की गई है, वहीं दूसरी ओर उस पानी को स्वच्छ बनाए रखने के लिए प्रस्तावित लगभग 100 करोड़ रुपये की लागत वाले चार सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) वर्षों बाद भी अधूरे पड़े हैं। ऐसे में नदी में रुकने वाला पानी धीरे-धीरे प्रदूषित होकर जनस्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नदी में यदि बिना शुद्धिकरण के सीवेज युक्त पानी लगातार जमा होता रहे तो उसमें ऑक्सीजन का स्तर कम होने लगता है। इससे दुर्गंध, जलकुंभी, मच्छरों का प्रकोप और जलजनित बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। अरपा नदी भी अब इसी दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है।70 से अधिक नाले रोज़ उड़ेल रहे गंदगीबिलासपुर शहर के लगभग 70 बड़े-छोटे नाले प्रतिदिन हजारों लीटर घरेलू सीवेज, गंदा पानी, प्लास्टिक, कचरा और मलवा सीधे अरपा नदी में छोड़ रहे हैं। बारिश के दिनों में यह मात्रा और अधिक बढ़ जाती है।परिणामस्वरूप नदी का प्राकृतिक जल लगातार प्रदूषित हो रहा है। शहर का अधिकांश सीवेज बिना किसी उपचार के सीधे नदी में समा जाता है। यही कारण है कि कई स्थानों पर पानी का रंग बदल चुका है और दुर्गंध की समस्या लगातार बढ़ रही है।17 वर्षों से अधूरी सीवरेज परियोजनाबिलासपुर में सीवरेज परियोजना की शुरुआत वर्ष 2008 में बड़े उत्साह के साथ हुई थी। लक्ष्य था कि पूरे शहर का गंदा पानी पाइपलाइन के माध्यम से एसटीपी तक पहुंचाकर शुद्ध किया जाएगा और उसके बाद ही नदी में छोड़ा जाएगा। लेकिन लगभग 18 वर्ष बीत जाने के बावजूद परियोजना पूरी नहीं हो सकी। पाइपलाइन बिछाने, घरों को जोड़ने और एसटीपी निर्माण की गति लगातार धीमी रही। कई बार समय-सीमा बढ़ाई गई, लागत बढ़ी, लेकिन शहर को आज तक इसका पूरा लाभ नहीं मिल पाया।चार एसटीपी से बदल सकती थी तस्वीरशिवघाट और पचरीघाट क्षेत्र में प्रस्तावित चार आधुनिक एसटीपी बनने के बाद शहर का अधिकांश गंदा पानी उपचारित होकर ही अरपा में छोड़ा जाता। इससे नदी का जल अपेक्षाकृत स्वच्छ रहता और बैराजों में संचित पानी पेयजल, सिंचाई, पर्यटन तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए अधिक उपयोगी बन सकता था। लेकिन वर्तमान स्थिति में बैराजों में रुकने वाला वही पानी लगातार प्रदूषित होता जा रहा है।बैराज बने, लेकिन अधूरा रह गया उद्देश्यबैराजों का मूल उद्देश्य वर्षभर जल संरक्षण, भूजल स्तर में वृद्धि, शहर की सुंदरता बढ़ाना तथा पर्यटन को बढ़ावा देना था। किन्तु यदि उसी जल में लगातार गंदगी मिलती रहे तो बैराजों का उद्देश्य भी प्रभावित होगा। जल विशेषज्ञों का कहना है कि बहते पानी की तुलना में रुका हुआ प्रदूषित पानी अधिक तेजी से खराब होता है। इसलिए बैराजों के साथ-साथ सीवेज शोधन व्यवस्था का समय पर पूरा होना अत्यंत आवश्यक था।पर्यावरण पर भी गंभीर असरअरपा नदी केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि बिलासपुर की पारिस्थितिकी का आधार भी है। नदी के प्रदूषित होने से मछलियों और अन्य जलीय जीवों का अस्तित्व प्रभावित हो रहा है। नदी किनारे रहने वाले लोगों को दुर्गंध, मच्छरों और संक्रमण का सामना करना पड़ रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही तो भविष्य में नदी का जल केवल देखने भर का रह जाएगा और उसका उपयोग सीमित होता जाएगा।प्रशासन के सामने बड़ी चुनौतीविशेषज्ञों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि अब केवल निर्माण कार्य पूरा करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ ही सभी नालों को एसटीपी से जोड़ना, अवैध सीवेज डिस्चार्ज रोकना, नियमित जल गुणवत्ता परीक्षण करना तथा नदी संरक्षण के लिए जनभागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।अब जरूरी हैं ये कदम* चारों एसटीपी का निर्माण शीघ्र पूरा किया जाए।* सभी प्रमुख नालों को उपचार संयंत्रों से जोड़ा जाए।* बिना उपचार के सीवेज को नदी में गिरने से तत्काल रोका जाए।* नदी की नियमित जल गुणवत्ता की सार्वजनिक रिपोर्ट जारी हो।* अतिक्रमण और ठोस कचरा फेंकने वालों पर कठोर कार्रवाई हो।* जनजागरूकता अभियान चलाकर नागरिकों की सहभागिता सुनिश्चित की जाए।निष्कर्षअरपा केवल एक नदी नहीं, बल्कि बिलासपुर की सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक पहचान है। करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए बैराज तभी सार्थक होंगे, जब उनमें संचित जल स्वच्छ रहेगा। यदि सीवेज शोधन की व्यवस्था शीघ्र पूरी नहीं की गई, तो आज का जल संरक्षण कल प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बन सकता है। अब समय आ गया है कि अधूरी परियोजनाओं को शीघ्र पूरा कर अरपा को उसके प्राकृतिक स्वरूप में लौटाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ, निर्मल और जीवंत नदी मिल सके।
