– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
आज का युवा ऊर्जा है, उत्साह है, संभावनाओं का विशाल संसार है और राष्ट्र के भविष्य की सबसे बड़ी आशा भी। उसके हाथों में केवल उसका अपना भविष्य नहीं, बल्कि परिवार, समाज और देश के भविष्य की दिशा भी होती है। लेकिन चिंता की बात यह है कि आज युवाओं के एक वर्ग में बढ़ती निराशा, हताशा, अकेलापन, असफलता का भय और जीवन के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं।
प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हर युवा सफलता चाहता है। वह चाहता है कि उसे अच्छी शिक्षा मिले, रोजगार मिले, सम्मान मिले और वह अपने सपनों को शीघ्र पूरा करे। लेकिन जब अपेक्षाओं के अनुरूप परिणाम नहीं मिलते, तो कुछ युवा स्वयं को असफल मान बैठते हैं। यहीं से समस्या शुरू होती है। असफलता को जीवन का एक पड़ाव समझने के बजाय वे उसे जीवन का अंत समझ लेते हैं। लेकिन क्या एक परीक्षा में असफल होना जीवन में असफल होना है? क्या नौकरी न मिलना जीवन की हार है? क्या किसी रिश्ते का टूट जाना जीवन के समाप्त हो जाने का कारण हो सकता है? बिल्कुल नहीं।
जीवन किसी एक परीक्षा, एक नौकरी, एक रिश्ते, एक व्यवसाय या एक अवसर से कहीं बड़ा है। सफलता का रास्ता कभी सीधा नहीं होता। इतिहास उठाकर देखें तो जिन लोगों ने दुनिया में अपना स्थान बनाया, उनमें से अधिकांश ने असफलताओं, संघर्षों और अस्वीकृतियों का सामना किया। अंतर केवल इतना था कि उन्होंने असफलता के सामने घुटने नहीं टेके। उन्होंने अपनी गलतियों को समझा, स्वयं को बदला और फिर प्रयास किया।
असफलता मंजिल का अंत नहीं, मंजिल तक पहुंचने का मार्गदर्शक संकेत है। दुर्भाग्य से आज सोशल मीडिया ने भी युवाओं के सामने सफलता की एक कृत्रिम तस्वीर खड़ी कर दी है। किसी के पास महंगी कार है, कोई विदेश घूम रहा है, कोई करोड़ों कमाने की कहानी बता रहा है और कोई अपनी चमकदार जिंदगी प्रदर्शित कर रहा है। युवा इन तस्वीरों की तुलना अपने वास्तविक जीवन से करने लगता है। उसे लगता है कि दुनिया आगे निकल गई और वह पीछे रह गया। वास्तविकता यह है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली जिंदगी अक्सर पूरी जिंदगी नहीं होती। वहां उपलब्धियों का प्रदर्शन होता है, संघर्षों का नहीं; सफलता दिखाई जाती है, असफलता नहीं; मुस्कान दिखाई जाती है, आंसू नहीं।
इसलिए युवा को दूसरों की जिंदगी से अपनी जिंदगी की तुलना करना बंद करना होगा। हर व्यक्ति की यात्रा अलग होती है, हर मंजिल का समय अलग होता है। निराशा की इसी जमीन पर कई बार नशे की प्रवृत्ति पनपती है। शुरुआत अक्सर यह सोचकर होती है कि नशा तनाव कम करेगा, दुख भुला देगा या मित्रों के साथ केवल मनोरंजन का साधन है। लेकिन धीरे-धीरे वही आदत व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने लगती है। नशा केवल शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाता, वह निर्णय लेने की क्षमता, आत्मसम्मान, पारिवारिक संबंध और भविष्य, सबको प्रभावित करता है।
इसी तरह निराशा और गलत संगति कई बार युवाओं को अपराध की ओर भी धकेल देती है। तत्काल लाभ, बदला, दिखावा, शक्ति का भ्रम या आर्थिक लालच उन्हें ऐसे रास्ते पर ले जा सकता है जहां लौटना कठिन हो जाता है।इसलिए युवाओं को केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि “नशा मत करो” या “अपराध मत करो।” समाज को यह भी समझना होगा कि वह युवा निराश क्यों है? उसकी समस्याएं क्या हैं? वह किससे अपनी बात कह सकता है? उसकी असफलता के बाद उसका हाथ कौन पकड़ेगा?
युवाओं को उपदेश से अधिक संवाद की आवश्यकता है। परिवार की भूमिका यहां सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। माता-पिता अपने बच्चों से केवल उनकी पढ़ाई, अंक, नौकरी और भविष्य के बारे में न पूछें। उनसे यह भी पूछें- “तुम कैसा महसूस कर रहे हो?” “कोई परेशानी तो नहीं?” “हमसे कुछ कहना चाहते हो?” कई बार एक युवा को समाधान से पहले केवल किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है जो बिना निर्णय सुनाए उसकी बात सुन सके।
स्कूल और कॉलेजों को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री और रोजगार नहीं होना चाहिए। शिक्षा व्यक्ति को जीवन की चुनौतियों से जूझना भी सिखाए। विद्यार्थियों में मानसिक दृढ़ता, निर्णय क्षमता, असफलता को स्वीकार करने की क्षमता, समय प्रबंधन, नशामुक्ति और जीवन-मूल्यों के प्रति जागरूकता विकसित करना भी शिक्षा का हिस्सा होना चाहिए। समाज को भी सफलता की अपनी परिभाषा बदलनी होगी। केवल ऊंची तनख्वाह, बड़ा मकान, महंगी गाड़ी या प्रतिष्ठित पद ही सफलता के प्रमाण नहीं हैं। ईमानदारी से जीना, अपने परिवार का सहारा बनना, किसी जरूरतमंद की मदद करना, समाज के लिए उपयोगी होना और अपने भीतर की प्रतिभा को विकसित करना भी सफलता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि युवा अपने जीवन की कीमत समझे।
उसका जीवन केवल उसका अपना नहीं है। उसके जन्म के साथ माता-पिता की आशाएं जुड़ी हैं, परिवार के सपने जुड़े हैं, मित्रों का स्नेह जुड़ा है और समाज की अपेक्षाएं जुड़ी हैं। राष्ट्र भी अपने युवाओं में भविष्य देखता है। इसलिए क्षणिक निराशा में लिया गया कोई अपरिवर्तनीय निर्णय केवल एक व्यक्ति को नहीं, उससे जुड़े अनेक जीवनों को गहरे दुख में डाल सकता है। यदि कभी परिस्थितियां इतनी कठिन लगें कि जीवन समाप्त करने का विचार आने लगे, तो उस क्षण अकेले न रहें। किसी विश्वसनीय व्यक्ति माता-पिता, मित्र, शिक्षक, परिवारजन या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से तुरंत बात करें और जरूरत पड़ने पर स्थानीय आपातकालीन सहायता लें। मदद मांगना कमजोरी नहीं, साहस है।
हमें युवाओं के सामने एक नया संदेश रखना होगा- “गिरना अपराध नहीं है, गिरकर पड़े रहना भी आवश्यक नहीं है। हार जाना अंत नहीं है, हार मान लेना अंत की शुरुआत है। रास्ता कठिन है तो रास्ता बदलो, मंजिल नहीं। समय खराब है तो समय बदलने का प्रयास करो, जीवन नहीं।” युवा को यह समझना होगा कि सफलता का कोई निर्धारित समय नहीं होता। किसी को बीस वर्ष की उम्र में सफलता मिलती है, किसी को तीस में, किसी को चालीस में और किसी को उससे भी बाद में। जीवन कोई सौ मीटर की दौड़ नहीं, बल्कि लंबी यात्रा है। इसमें कभी धूप मिलेगी, कभी छांव; कभी सफलता मिलेगी, कभी असफलता; कभी प्रशंसा मिलेगी, कभी आलोचना। महत्वपूर्ण यह नहीं कि रास्ते में कितनी बार ठोकर लगी। महत्वपूर्ण यह है कि हर ठोकर के बाद हम कितनी बार उठे।
आवश्यकता युवाओं को डराने की नहीं, उन्हें विश्वास दिलाने की है। उन्हें यह बताने की है कि वे महत्वपूर्ण हैं, उनकी प्रतिभा महत्वपूर्ण है, उनका जीवन महत्वपूर्ण है और उनकी असफलताएं भी उनके भविष्य की कहानी का एक अध्याय मात्र हैं।परिवार को आश्रय देना होगा, विद्यालय को दिशा देनी होगी, समाज को संवेदनशील बनना होगा और शासन को नशे तथा अपराध के विरुद्ध कठोर कार्रवाई के साथ-साथ युवाओं के लिए अवसर, कौशल, रोजगार और परामर्श की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। क्योंकि युवा केवल आंकड़ा नहीं है। वह किसी मां-बाप का सपना है, किसी परिवार की उम्मीद है और राष्ट्र की संभावित शक्ति है।
इसलिए युवाओं से यही कहना होगा-
“थक जाओ तो विश्राम करो,
लेकिन रुक मत जाना।
गिर जाओ तो उठ जाना,
लेकिन टूट मत जाना।
असफलता मिले तो सीख लेना,
लेकिन स्वयं को असफल मत मान लेना।
क्योंकि तुम्हारे भीतर वह शक्ति है,
जो आज की असफलता को,
कल की सबसे बड़ी
सफलता में बदल सकती है।।
” जीवन अनमोल है। इसे नशे में मत खोइए, अपराध में मत गंवाइए और निराशा के एक क्षण में समाप्त मत कीजिए। संघर्ष कीजिए, सीखिए, फिर प्रयास कीजिए…क्योंकि मंजिल उनसे ही मिलती है जो रास्ते की कठिनाइयों से डरकर लौटते नहीं, बल्कि उन्हें पार करके आगे बढ़ते हैं।
– सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
– बिलासपुर, छत्तीसगढ़
