– सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
छत्तीसगढ़ की पहचान केवल उसके घने जंगलों, पहाड़ों, नदियों और आदिवासी संस्कृति से नहीं है, बल्कि यहां की धरती पर बिखरी उन लोक स्मृतियों से भी है, जिनमें हजारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना का प्रतिबिंब दिखाई देता है। सूरजपुर जिले का कुदरगढ़–सीता लेखनी–लक्ष्मण पांव क्षेत्र इसी दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। यहां रामायणकालीन वन गमन से जुड़ी लोकमान्यताएं, प्राकृतिक भू-दृश्य, शैल चित्र और प्राचीन सांस्कृतिक अवशेष एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं। लेकिन इस क्षेत्र को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है – लोक विश्वास को लोकविश्वास के रूप में और पुरातात्विक प्रमाण को प्रमाण के रूप में ही देखा जाना चाहिए। यही दृष्टिकोण इस पूरे क्षेत्र को और अधिक रोचक बनाता है।
रामायण और दंडकारण्य की स्मृति – वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के दंडकारण्य में विचरण, विभिन्न आश्रमों में जाने और लंबे समय तक वन में रहने का वर्णन मिलता है। अरण्यकांड में राम के साथ सीता और लक्ष्मण के वनगमन का उल्लेख स्पष्ट रूप से मिलता है। यही कारण है कि मध्य भारत, विशेषकर वर्तमान छत्तीसगढ़ और सरगुजा अंचल के अनेक वन-पहाड़ी क्षेत्रों को स्थानीय परंपराओं ने रामायण के वनगमन से जोड़कर देखा है। परंतु वाल्मीकि रामायण में आधुनिक सूरजपुर जिले के ‘लक्ष्मण पांव’ या ‘सीता लेखनी’ का नाम सीधे नहीं मिलता। इसलिए इन स्थलों को रामायण की घटनाओं का प्रत्यक्ष पुरातात्विक प्रमाण कहना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। इसके बावजूद लोकपरंपरा की अपनी एक ऐतिहासिक शक्ति होती है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी किसी स्थान से जुड़ी कथा, पूजा, नामकरण और अनुष्ठान उस स्थान की सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखते हैं।
लक्ष्मण पांव आखिर है क्या? सूरजपुर,सरगुजा अंचल में ‘लक्ष्मण पांव’, ‘लक्ष्मण पंजा’ अथवा मिलते-जुलते नामों से कई स्थलों का उल्लेख मिलता है। सूरजपुर जिले में स्थित सीता लेखनी व लक्ष्मण पांव जिला मुख्यालय से लगभग 75 किलोमीटर दूर जेल्हा ग्राम के पास स्थित है और इसे लगभग 9वीं–10वीं शताब्दी के आसपास का माना जाता है। दूसरी ओर, लक्ष्मण पायन नामक स्थल को प्रतापपुर विकासखंड के मरहटा ग्राम से संबद्ध क्षेत्र है तथा उसे श्रीराम के वनवास से जुड़ा स्थल कहा गया है। यह तथ्य अपने आप में शोध का विषय है कि एक ही व्यापक सांस्कृतिक भूभाग में लक्ष्मण पांव नाम से अनेक स्थल क्यों विकसित हुए? संभवतः इसका संबंध केवल किसी एक स्थान से नहीं, बल्कि पूरे सरगुजा क्षेत्र की रामकथा-आधारित लोकस्मृति से है।
सीता लेखनी : केवल धार्मिक स्थल नहीं, शैलकला का क्षेत्र भी है। सीता लेखनी का महत्व यहां और बढ़ जाता है। छत्तीसगढ़ के शैलाश्रयों पर प्रकाशित शोधपरक सामग्री में सूरजपुर के ओड़गी क्षेत्र की सीता लेखनी और लक्ष्मण पंजा को चित्रित शैलाश्रयों की सूची में शामिल किया गया है। यहां लाल और सफेद रंगों से बनाए गए पशु, मानव तथा अन्य आकृतियों का उल्लेख मिलता है।
यहां एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात सामने आती है। यदि किसी चट्टान पर मानव आकृति, पशु आकृति, हथेली, ज्यामितीय चिह्न अथवा अन्य शैलचित्र दिखाई देते हैं तो उनका अस्तित्व अपने आप में महत्वपूर्ण पुरातात्विक तथ्य है। लेकिन उस चित्र को सीधे राम, सीता या लक्ष्मण से जोड़ देना अलग प्रकार का दावा है, जिसके लिए स्वतंत्र प्रमाण आवश्यक होगा। अर्थात – शैलचित्र = पुरातात्विक तथ्य। उसे सीता या लक्ष्मण से जोड़ना = लोकमान्यता है। यही अंतर इस स्थल के वास्तविक शोध-मूल्य को समझने में मदद करता है।
क्या ये शैलचित्र रामायणकालीन हैं? यह सबसे स्वाभाविक और सबसे कठिन प्रश्न है। किसी शैलचित्र की उम्र निर्धारित करने के लिए केवल उसके स्वरूप या उससे जुड़ी कथा पर्याप्त नहीं होती। पुरातत्व में चित्र की शैली, रंगद्रव्य, चट्टान की सतह, उसके ऊपर-नीचे बने चित्र, आसपास मिले पुरावशेष और वैज्ञानिक परीक्षण जैसे अनेक आधार देखे जाते हैं। छत्तीसगढ़ में शैलचित्रों का अध्ययन लंबे समय से हो रहा है। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में चित्रित शैलाश्रयों का व्यापक दस्तावेजीकरण किया गया है। शाहापिडिया में प्रकाशित शोधपरक सामग्री के अनुसार प्रदेश के उत्तर से दक्षिण तक अनेक शैलाश्रय दर्ज किए गए हैं और सरगुजा क्षेत्र में भी इनके महत्वपूर्ण समूह पाए जाते हैं।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र भी शैलकला के वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण को महत्वपूर्ण मानता है और इसके अंतर्गत शैलचित्रों के साथ उनके प्राकृतिक परिवेश, लोककथाओं और सांस्कृतिक संदर्भों का भी दस्तावेजीकरण किया जाता है। इसलिए सीता लेखनी का वास्तविक शोध-मूल्य केवल इस प्रश्न में नहीं है कि “क्या यहां राम आए थे?”, बल्कि यह भी है कि- यहां रहने वाले प्राचीन मानव ने चट्टानों पर क्या बनाया, क्यों बनाया और उस परंपरा की स्मृति आज तक कैसे बची रही? किसी क्षेत्र की लोककथा को केवल इसलिए अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह पुरातात्विक प्रमाण नहीं है। लोककथा स्वयं अमूर्त सांस्कृतिक विरासत है। उदाहरण के लिए, सूरजपुर के सारसोर में राम – सीता- लक्ष्मण से जुड़ी स्थानीय मान्यता है और वहां राम-सीता-लक्ष्मण का मंदिर भी है। जिला प्रशासन स्वयं इसे धार्मिक आस्था के साथ पर्यटन स्थल के रूप में प्रस्तुत करता है।
इसी प्रकार रक्सगंडा जलप्रपात प्राकृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल है। यह ओड़गी ब्लॉक के नवगई क्षेत्र में रिहंद नदी पर स्थित है और लगभग 50 फीट की ऊंचाई से जल गिरता है। इस प्रकार एक ही यात्रा में श्रद्धालु को – कुदरगढ़ की धार्मिक परंपरा → सीता लेखनी की शैलकला → लक्ष्मण पांव की लोकस्मृति → सारासोर की रामकथा → रक्सगंडा की प्राकृतिक भव्यता का अनुभव हो सकता है। यही इस पूरे भूभाग की विशेषता है।
कुदरगढ़ को सूरजपुर जिले की प्रमुख धार्मिक पहचान माना जाता है। यहां कुदरगढ़ी देवी का मंदिर है, पहाड़ के ऊपर स्थित यह देवी मंदिर बड़े ही आस्था व श्रद्धा का केंद्र है । पहाड़ के आसपास छोटी-बड़ी अनेक गुफाएं हैं, जिनमें पुराने लेखन और चित्रों के अवशेष बताए गए हैं। क्षेत्र में कपिलधारा जलप्रपात भी स्थित है। इसका अर्थ यह है कि कुदरगढ़ क्षेत्र को केवल धार्मिक स्थल मानकर देखना उसके व्यापक सांस्कृतिक महत्व को सीमित कर देना होगा। यहां तीन अलग-अलग परतें दिखाई देती हैं – प्रकृति → मानव की प्राचीन अभिव्यक्ति → धार्मिक लोकविश्वास। इन तीनों का अध्ययन साथ किया जाए तो कुदरगढ़ और सीता लेखनी जैसे स्थल छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक इतिहास-पुस्तक के महत्वपूर्ण अध्याय बन सकते हैं।
भारत के अनेक धार्मिक स्थलों पर किसी चट्टान या पत्थर पर दिखाई देने वाली प्राकृतिक अथवा मानव निर्मित आकृति को किसी देवता या महापुरुष के चरणचिह्न के रूप में पूजा जाता है। यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि स्थान को पवित्र बनाने की सांस्कृतिक प्रक्रिया भी है। जब किसी प्राकृतिक चट्टान पर पैर जैसी आकृति दिखाई देती है और उसके साथ रामायण की कथा जुड़ जाती है, तो वह आकृति स्थानीय समुदाय के लिए केवल पत्थर नहीं रह जाती – वह स्मृति का प्रतीक बन जाती है। यही कारण है कि ‘लक्ष्मण पांव’ जैसे नाम किसी वैज्ञानिक निष्कर्ष से अधिक सांस्कृतिक पहचान का प्रतिनिधित्व करते हैं।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य : यहां केवल रामायण नहीं, प्रागैतिहासिक मानव भी दिखाई देता है। सीता लेखनी और आसपास के शैलाश्रयों के संदर्भ में उपलब्ध अध्ययन यह संकेत देते हैं कि इस भूभाग की सांस्कृतिक कहानी रामायण की लोकमान्यता से कहीं पुरानी परतों तक जाती है। शैलचित्रों में मानव, पशु और विभिन्न आकृतियों का मिलना इस क्षेत्र में प्राचीन मानव गतिविधियों की ओर संकेत करता है। इस दृष्टि से इस क्षेत्र का अध्ययन तीन कालखंडों को जोड़ सकता है – प्रागैतिहासिक मानव → ऐतिहासिक काल → रामायण आधारित लोकस्मृति और वर्तमान धार्मिक संस्कृति। यही वह बिंदु है जहां सूरजपुर का यह भूभाग सामान्य पर्यटन स्थल से आगे बढ़कर ‘सांस्कृतिक लैंडस्केप’ बन जाता है। छत्तीसगढ़ में राम से जुड़े स्थलों को लेकर धार्मिक पर्यटन की अवधारणा पहले से मौजूद है। सूरजपुर जिले की आधिकारिक पर्यटन सामग्री भी कुदरगढ़, सारासोर और रक्सगंडा जैसे धार्मिक एवं प्राकृतिक स्थलों को प्रमुख आकर्षणों में शामिल करती है।
यदि भविष्य में इस पूरे क्षेत्र का वैज्ञानिक और व्यवस्थित विकास किया जाए तो यहां एक ऐसा रामायण– शैलकला – प्रकृति पर्यटन सर्किट विकसित हो सकता है जिसमें धार्मिक श्रद्धा के साथ इतिहास, पुरातत्व, जनजातीय संस्कृति, वनस्पति, भूगोल और पर्यावरण को भी समान महत्व मिले। इसके लिए प्रत्येक स्थल पर तीन तरह की जानकारी दी जा सकती है-1. लोकमान्यता क्या कहती है? 2. पुरातत्व और इतिहास में क्या प्रमाण उपलब्ध हैं? 3. वैज्ञानिक अध्ययन अभी क्या कहता है और क्या शोध बाकी है? ऐसा मॉडल श्रद्धालु को आस्था देगा, पर्यटक को अनुभव देगा और शोधकर्ता को प्रश्न देगा। लक्ष्मण पांव और सीता लेखनी जैसे स्थलों के लिए अब केवल कथाएं लिखना पर्याप्त नहीं होगा। वहां उपलब्ध प्रत्येक शैलचित्र, चट्टानी आकृति, लेख, गुफा, जलस्रोत और स्थानीय कथा का डिजिटल मानचित्रण, उच्च-रिजॉल्यूशन फोटोग्राफी, 3-D स्कैनिंग और वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए। क्योंकि शैलचित्र प्राकृतिक क्षरण और मानवीय हस्तक्षेप दोनों से प्रभावित हो सकते हैं।IGNCA ने भी शैलकला के संरक्षण के संदर्भ में दस्तावेजीकरण को महत्वपूर्ण बताया है। पत्थरों में केवल पदचिह्न नहीं, एक सभ्यता की स्मृति है,सूरजपुर का लक्ष्मण पांव केवल इस प्रश्न से महत्वपूर्ण नहीं हो जाता कि वह वास्तव में लक्ष्मण जी के चरणचिह्न हैं या नहीं। उसका महत्व इससे कहीं बड़ा है।
यह स्थल हमें बताता है कि मनुष्य अपने भूगोल को अपनी स्मृतियों से कैसे जोड़ता है। एक पहाड़ कथा बन जाता है, एक चट्टान आस्था बन जाती है, एक शैलचित्र इतिहास का प्रश्न बन जाता है और एक नदी लोकजीवन की धारा। सीता लेखनी की चट्टानों पर बने प्राचीन चित्र हमें उस मानव तक ले जाते हैं जो लिखित इतिहास से पहले अपनी कहानी पत्थरों पर छोड़ रहा था। दूसरी ओर लक्ष्मण पांव की लोकमान्यता हमें उस सांस्कृतिक स्मृति तक ले जाती है जिसमें रामायण आज भी जीवित है। इसलिए इस क्षेत्र को न तो केवल “रामायण का प्रमाण” कहकर सीमित करना चाहिए और न ही केवल “लोककथा” कहकर समाप्त कर देना चाहिए।
सही दृष्टिकोण यह है कि आस्था को सम्मान मिले, लोकस्मृति का दस्तावेजीकरण हो और पुरातत्व को वैज्ञानिक कसौटी पर परखा जाए। तभी लक्ष्मण पांव की असली कहानी सामने आएगी – एक ऐसे भूभाग की कहानी, जहां पहाड़ बोलते हैं, चट्टानें चित्र बनाती हैं, नदियां स्मृतियां बहाती हैं और लोकमानस सदियों पुरानी कथाओं को आज भी अपने भीतर जीवित रखता है।यही सूरजपुर के लक्ष्मण पांव और सीता लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता है, यहां रामायण केवल पढ़ी नहीं जाती, बल्कि प्रकृति, लोकविश्वास और शैलकला के बीच आज भी महसूस की जाती है।
– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
– पत्रकार/ लेखक/ समाजसेवी /अधिवक्ता
